2027 की तैयारी में औरों से आगे दिखना चाहती है बसपा: प्रत्याशियों को पर्याप्त समय देने की रणनीति, आज एत्मादपुर में प्रत्याशी की घोषणा के संकेत

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए बसपा ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। मायावती ने आकाश आनंद को फिर नेशनल कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी सौंपकर चुनावी गतिविधियों में सक्रिय किया है। पार्टी प्रत्याशियों के चयन के साथ बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने और विभिन्न सामाजिक वर्गों से संपर्क बढ़ाने में भी जुटी है। आगरा के एत्मादपुर में आज (22 नवंबर को) आकाश आनंद की प्रस्तावित जनसभा में सर्वेश बघेल को प्रत्याशी घोषित किए जाने की चर्चा है। इससे पहले खेरागढ़ सीट से नीरज रावत का नाम सामने आ चुका है।

Oct 22, 2026 - 07:57
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2027 की तैयारी में औरों से आगे दिखना चाहती है बसपा: प्रत्याशियों को पर्याप्त समय देने की रणनीति, आज एत्मादपुर में प्रत्याशी की घोषणा के संकेत

पहले प्रत्याशी घोषित करने के पीछे क्या है रणनीति?

बसपा यदि चुनाव से कई महीने पहले प्रत्याशियों के नाम घोषित करती है तो इसके पीछे उम्मीदवारों को पर्याप्त समय देने की रणनीति हो सकती है। प्रत्याशी क्षेत्र में जनसंपर्क बढ़ाने, पुराने समर्थकों को सक्रिय करने और नए लोगों को पार्टी से जोड़ने का प्रयास कर सकेंगे। साथ ही, उन्हें बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की टीम तैयार करने और स्थानीय समस्याओं को समझने का अवसर मिलेगा।

इस रणनीति का एक और पहलू है। चुनाव से ठीक पहले प्रत्याशी घोषित करने पर संगठन को सक्रिय करने और स्थानीय समीकरण साधने के लिए सीमित समय मिलता है। पहले घोषणा होने से पार्टी को यह परखने का भी मौका मिल सकता है कि प्रत्याशी अपने क्षेत्र में कितना काम कर रहा है और संगठन उसके साथ कितना तालमेल बना पा रहा है।

हालांकि, जल्दी टिकट देने के साथ जोखिम भी जुड़े हैं। दूसरे दावेदारों की नाराजगी, स्थानीय विरोध और बदलते राजनीतिक समीकरणों को संभालना पार्टी के लिए चुनौती हो सकता है।

आकाश आनंद की भूमिका और संगठन की परीक्षा

आकाश आनंद को दोबारा सक्रिय करने का उद्देश्य युवा नेतृत्व को सामने लाने के साथ पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाना भी हो सकता है। उनकी सभाओं के जरिए बसपा अपने राजनीतिक संदेश को नए मतदाताओं तक पहुंचाने का प्रयास कर सकती है। लेकिन इसका प्रभाव केवल सभाओं में जुटने वाली भीड़ से नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाली संगठनात्मक गतिविधियों से आंका जाएगा।

बसपा बूथ और सेक्टर स्तर पर कमेटियों को सक्रिय करने पर भी जोर दे रही है। पार्टी की योजना में दस बूथों को मिलाकर एक सेक्टर बनाने और संगठनात्मक जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने की बात सामने आई है। बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता चुनाव के दौरान मतदाताओं से संपर्क और मतदान संबंधी समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सवाल यह है कि क्या पार्टी इन कमेटियों को चुनाव तक नियमित रूप से सक्रिय रख पाएगी।

भाईचारा समितियों से सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश

बसपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विभिन्न सामाजिक वर्गों से संवाद बढ़ाना भी है। आगरा में मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग भाईचारा समितियों के संयोजकों की नियुक्ति इसी प्रयास के रूप में देखी जा सकती है। पार्टी अपने परंपरागत समर्थकों को सक्रिय करने के साथ दूसरे सामाजिक समूहों तक भी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है।

2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा ने उस समय विभिन्न सामाजिक वर्गों को साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई थी। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए पुराने सामाजिक समीकरणों को दोहराने के बजाय उन्हें नए सिरे से साधना पार्टी के सामने चुनौती होगी।

उम्मीदवार चयन में स्थानीय समीकरण अहम

एत्मादपुर में सर्वेश बघेल के नाम की चर्चा और खेरागढ़ में नीरज रावत की उम्मीदवारी से संकेत मिलता है कि बसपा स्थानीय स्तर पर प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। प्रत्याशियों की घोषणा जल्दी होने से उन्हें अपनी पहचान बनाने और कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल स्थापित करने का समय मिल सकता है।

यदि एत्मादपुर से सर्वेश बघेल को प्रत्याशी घोषित किया जाता है, तो इसे बसपा की पुरानी सोशल इंजीनियरिंग को नए सिरे से साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। एत्मादपुर क्षेत्र में बघेल मतदाताओं की उल्लेखनीय संख्या को देखते हुए पार्टी की नजर इस सामाजिक आधार पर है। इसी तरह, खेरागढ़ से नीरज रावत को प्रत्याशी बनाकर बसपा ब्राह्मण समाज के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने और व्यापक सामाजिक समीकरण बनाने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। दोनों सीटों पर संभावित प्रत्याशियों के चयन को अलग-अलग सामाजिक वर्गों को जोड़ने की इसी कोशिश के संदर्भ में देखा जा जा रहा है।

बसपा के सामने केवल उम्मीदवार तय करने की चुनौती नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ एक सीट मिली थी। लोकसभा चुनाव में पार्टी का सूपड़ासाफ हो गया था। इन दोनों चुनावों में वोट प्रतिशत में भी बहुत गिरावट आ गई थी। ऐसे में उसे अपने संगठन को फिर सक्रिय करने, मतदाताओं से संपर्क बढ़ाने की जरूरत होगी।

बसपा 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अंदरूनी तौर पर तैयारियों में जुटी है, लेकिन क्या वह अपना पुराना जनाधार वापस हासिल कर पाएगी, इसका पता चुनाव के समय ही चलेगा। वर्ष 2007 में जिस सोशल इंजीनियरिंग के दम पर पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, उसी रणनीति को नए सिरे से साधने की कोशिश हो रही है। हालांकि, इस बार परिस्थितियां और चुनौतियां अलग हैं।

बसपा के सामने एक ओर अपने दलित वोट बैंक को बिखरने से बचाने की चुनौती है, जिस पर सपा और भाजपा की भी नजर है, तो दूसरी ओर दलित मतदाताओं के बीच यह भरोसा कायम करने की जरूरत है कि पार्टी का संगठन और उसका राजनीतिक आधार अब भी मजबूत है। इस चुनाव में मायावती की रणनीति के साथ आकाश आनंद के नेतृत्व और राजनीतिक कौशल की भी परीक्षा होगी। युवा नेतृत्व के मोर्चे पर उनके सामने सांसद चंद्रशेखर आजाद की चुनौती भी रहेगी।

हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि बसपा सभी सीटों पर बहुत पहले प्रत्याशी घोषित करने जा रही है। इसकी तस्वीर आगामी घोषणाओं से स्पष्ट होगी। फिलहाल पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रत्याशी चयन, आकाश आनंद की सक्रियता और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने के प्रयासों को वह वास्तविक जनसमर्थन में कितना बदल पाती है।

SP_Singh AURGURU Editor