पर्यावरण के रक्षक या विकास के दुश्मन? नर्मदा से टिहरी और मथुरा रिफाइनरी तक विरोध की राजनीति पर तीन बड़े सवाल
नर्मदा बांध, टिहरी बांध और मथुरा रिफाइनरी के उदाहरण बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन जरूरी है। विस्थापन, प्रदूषण और सुरक्षा संबंधी चिंताओं की अनदेखी नहीं होनी चाहिए, लेकिन ठोस प्रमाणों के बिना हर परियोजना का विरोध और लंबी मुकदमेबाजी भी उचित नहीं है। बांध पानी, बिजली और सिंचाई की जरूरतें पूरी करते हैं, जबकि उद्योग रोजगार और ईंधन आपूर्ति में योगदान देते हैं। जरूरी है कि विकास परियोजनाओं की निष्पक्ष जांच हो, पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए और सुरक्षा की निरंतर निगरानी हो। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर विकास रोकने के बजाय तथ्य, जवाबदेही और प्रभावी नियमों के आधार पर निर्णय लिए जाने चाहिए।
-बृज खंडेलवाल-
"हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जिसका इन कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया हो... हर मामले को अदालत में घसीट लिया जाता है... इस देश में ऐसी याचिकाएं सिर्फ़ विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दाखिल की जाती हैं।"
ये तीखी टिप्पणियां 11 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ ने कीं, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे। मामला गुजरात के पीपावाव बंदरगाह के विस्तार और आधुनिकीकरण की पर्यावरण मंज़ूरी को चुनौती देने वाली याचिका का था।
इन टिप्पणियों ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है। क्या कुछ स्वयंभू पर्यावरण रक्षक सचमुच प्रकृति बचा रहे हैं, या पर्यावरण की चिंताओं को आर्थिक तरक्की रोकने का हथियार बना रहे हैं?
भारत को साफ़ हवा, बहती नदियां और सुरक्षित जंगल चाहिए। लेकिन देश को बांध, बिजलीघर, बंदरगाह, सड़कें और उद्योग भी चाहिए। समस्या तब शुरू होती है, जब बिना ठोस जांच के हर परियोजना को पर्यावरण के लिए खतरा बता दिया जाता है। नर्मदा बांध, टिहरी बांध और मथुरा रिफाइनरी की कहानियां बताती हैं कि पर्यावरण की हिफ़ाज़त और आर्थिक विकास के बीच संतुलन कितना ज़रूरी है।
पर्यावरण के नाम पर आंदोलन करना गलत नहीं है। लेकिन कुछ अभियानों में खतरे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं। विशेषज्ञों की जांच पूरी होने से पहले ही विनाश की भविष्यवाणियां होने लगती हैं, और फिर प्रचार, प्रदर्शन और मुकदमों का सिलसिला चल पड़ता है।
एक जाना-पहचाना चक्र बन गया है: खतरे की घंटी बजाओ, सुर्खियां बटोरो, अदालत पहुंचो, RTI लगाओ और परियोजना को लटका दो। फिर अगली परियोजना के खिलाफ मोर्चा खोल दो।
क्या कुछ अभियानों के पीछे निहित स्वार्थ भी काम करते हैं? इसकी जांच होनी चाहिए। राजनीतिक विरोधियों, कारोबारी प्रतिस्पर्धियों और दूसरे समूहों को किसी परियोजना के रुकने से फ़ायदा हो सकता है। जब पर्यावरणीय आपत्तियां सबूतों को मानने से इनकार करने लगती हैं, तब आंदोलन और अड़ंगे के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
नर्मदा: विरोध के बीच विकास के फ़ायदे
मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने दशकों तक नर्मदा घाटी की बड़ी बांध परियोजनाओं का विरोध किया। सरदार सरोवर बांध इस आंदोलन का प्रमुख निशाना रहा। आंदोलन ने विस्थापन, आदिवासी अधिकारों, पर्यावरणीय नुकसान और पुनर्वास की कमियों पर सवाल उठाए। ये गंभीर मुद्दे थे और इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
फिर भी एक दूसरा सवाल उतना ही ज़रूरी है: क्या आंदोलन ने उन लाखों लोगों के संभावित फ़ायदे पर पर्याप्त ध्यान दिया, जिन्हें इन परियोजनाओं से पानी और बिजली मिल सकती थी?
सरदार सरोवर बांध ने गुजरात के कई हिस्सों में पानी की उपलब्धता बढ़ाई है। इसकी विशाल नहर व्यवस्था नर्मदा का पानी सौराष्ट्र और कच्छ जैसे सूखाग्रस्त इलाकों तक पहुंचाती है। जिन गांवों और कस्बों में पीने के पानी की समस्या दशकों पुरानी थी, वहां अब जलापूर्ति कहीं ज़्यादा भरोसेमंद हुई है।
खेती को भी फ़ायदा मिला है। सिंचाई से किसानों की मानसून पर निर्भरता घटी है, फसलों को पानी मिला है और ग्रामीण आमदनी बढ़ाने के अवसर बने हैं। नहर व्यवस्था राजस्थान के कुछ हिस्सों तक भी पहुंचती है। गुजरात में पानी की कमी लंबे समय से विकास की राह में बड़ी बाधा रही है, और ऐसे इलाकों तक पानी पहुंचाने के दूसरे विकल्प कहीं ज़्यादा मुश्किल और महंगे साबित होते।
मध्य प्रदेश को भी नर्मदा घाटी विकास परियोजना से लाभ मिला है। इंदिरा सागर बांध की बिजली उत्पादन क्षमता 1,000 मेगावाट है, और यह सिंचाई व कृषि गतिविधियों को भी सहारा देता है। ये फ़ायदे सरकारी कागज़ों पर लिखे वादे भर नहीं हैं। पानी, बिजली और सिंचाई लोगों की ज़िंदगी पर सीधा असर डालते हैं।
टिहरी बांध: इंजीनियरिंग की बड़ी चुनौती
उत्तराखंड का टिहरी बांध भी विकास और पर्यावरण के बीच लंबे संघर्ष का केंद्र रहा है। चिपको आंदोलन के प्रसिद्ध नेता सुंदरलाल बहुगुणा ने इस परियोजना के खिलाफ़ जोरदार अभियान चलाया। भूख हड़ताल, प्रदर्शन और कानूनी लड़ाइयों ने वर्षों तक इस विवाद को जिंदा रखा।
टिहरी बांध 2006 में पूरा हुआ। इसकी ऊंचाई 260.5 मीटर है और मुख्य बिजलीघर की क्षमता 1,000 मेगावाट। व्यापक परियोजना में 400 मेगावाट की कोटेश्वर परियोजना और 1,000 मेगावाट की पंप्ड-स्टोरेज सुविधा भी शामिल है, जो अप्रैल 2026 तक पूरी तरह चालू हो चुकी थी। इस तरह पूरे परिसर की स्थापित क्षमता 2,400 मेगावाट हो गई है।
यह भारत की बिजली व्यवस्था में अहम योगदान है। परियोजना उत्तरी ग्रिड को सहारा देती है, और निर्धारित व्यवस्थाओं के तहत उत्तराखंड को भी बिजली संबंधी लाभ मिलते हैं। टिहरी झील दिल्ली सहित बड़े आबादी वाले क्षेत्रों की पेयजल ज़रूरतें पूरी करने में मदद करती है और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में सिंचाई के काम भी आती है। जलाशय बाढ़ के असर को कुछ हद तक कम कर सकता है, हालांकि इससे बाढ़ का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। झील ने पर्यटन, मनोरंजन और स्थानीय रोज़गार के नए अवसर भी पैदा किए हैं।
तो बांध टूटने और भारी तबाही की आशंकाओं का क्या हुआ? बांध 2006 से काम कर रहा है और वैसी विनाशकारी टूटन नहीं हुई, जिसका डर विरोधियों ने जताया था। इसके मिट्टी और चट्टानों से बने ढांचे को क्षेत्र के भूकंपीय जोखिमों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।
सबक साफ़ है: परियोजनाओं का मूल्यांकन तकनीकी तथ्यों, वास्तविक जोखिमों, प्रदर्शन और सामाजिक प्रभावों के आधार पर होना चाहिए। विरोध की तीव्रता से तय नहीं होता कि कोई परियोजना सही है या गलत। टिहरी दिखाता है कि बड़ी इंजीनियरिंग परियोजनाएं कठिन चुनौतियों के बावजूद सफल हो सकती हैं, पर सुरक्षा में कभी लापरवाही नहीं होनी चाहिए।
मथुरा रिफाइनरी: उद्योग बनाम ताजमहल
मथुरा की तेल रिफाइनरी ने विकास और पर्यावरण के बीच एक और कठिन सवाल खड़ा किया। 1970 के दशक में जब इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने रिफाइनरी की योजना बनाई, तो संरक्षणवादियों ने चिंता जताई कि इससे निकलने वाला प्रदूषण करीब 40 से 50 किलोमीटर दूर स्थित ताजमहल को नुकसान पहुंचा सकता है।
यह चिंता बेबुनियाद नहीं थी। सल्फर डाइऑक्साइड और दूसरे प्रदूषक अम्लीय जमाव का कारण बन सकते हैं, जिससे संगमरमर और दूसरी संवेदनशील सतहों को नुकसान पहुंचता है। ताजमहल की हिफ़ाज़त बेहद ज़रूरी है, इसलिए सावधानी बरतना स्वाभाविक था।
विरोध बढ़ा और विशेषज्ञ समितियों ने संभावित असर की जांच की। आखिरकार ज़रूरी सुरक्षा उपायों के साथ रिफाइनरी को मंज़ूरी मिली और 1982 में इसका संचालन शुरू हुआ। आलोचकों को आशंका थी कि प्रदूषण से ताजमहल धीरे-धीरे पीला पड़ जाएगा और पूरे इलाके की हवा खराब होगी।
फिर क्या हुआ? समय के साथ रिफाइनरी की प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्थाएं बेहतर हुईं, जिनमें सल्फर रिकवरी और स्वच्छ ईंधन बनाने की तकनीकें शामिल हैं। ताजमहल की सुरक्षा के लिए व्यापक ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में भी कई पाबंदियां लगाई गई हैं। इस विवाद ने औद्योगिक प्रदूषण और ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा पर ध्यान बढ़ाया और यह संदेश मज़बूत किया कि विश्वप्रसिद्ध स्मारक के आसपास उद्योगों को कड़े पर्यावरणीय मानकों का पालन करना चाहिए।
दूसरी तरफ़, रिफाइनरी का आर्थिक महत्व भी है। यह उत्तरी भारत और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को पेट्रोलियम उत्पाद पहुंचाती है, और इसकी क्षमता सालाना 60 लाख टन से बढ़कर 80 लाख टन हो गई है। रिफाइनरी रोज़गार, सरकारी राजस्व, औद्योगिक गतिविधियों और ईंधन आपूर्ति में योगदान देती है, और तकनीकी सुधारों से स्वच्छ ईंधन उत्पादन में भी मदद मिली है।
क्या ताजमहल की सुरक्षा से समझौता करके ये फ़ायदे हासिल किए जा सकते थे? बिल्कुल नहीं। लेकिन क्या प्रदूषण के जोखिम भर से यह निष्कर्ष निकाल लेना चाहिए कि रिफाइनरी बननी ही नहीं चाहिए थी? इस निष्कर्ष के लिए भी ठोस सबूत चाहिए। रिफाइनरी का संचालन और उसके साथ बढ़ती पर्यावरणीय पाबंदियां बताती हैं कि उद्योग और धरोहर संरक्षण साथ चल सकते हैं, बशर्ते सुरक्षा उपाय प्रभावी हों और उनका लगातार पालन हो।
सबक यह नहीं कि पर्यावरणीय चेतावनियों को खारिज कर दिया जाए। सबक यह है कि चेतावनियों के जवाब में बेहतर नियम, स्वच्छ तकनीक और नतीजों की नियमित जांच होनी चाहिए। हर उद्योग को बिना सोचे-समझे खारिज कर देना समाधान नहीं है।
विकास को चाहिए सबूत, अंतहीन मुकदमे नहीं
पीपावाव बंदरगाह का मामला इस बहस को फिर सामने ले आया है। 11 मई 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के नाम पर विकास परियोजनाओं को बार-बार चुनौती देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए। इस चिंता पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, क्योंकि जब बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं लंबे मुकदमों में उलझती हैं, तो नुकसान केवल सरकार या कंपनियों का नहीं होता।
देरी से लागत बढ़ती है, रोज़गार टलते हैं और निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है। ज़रूरी सुविधाएं वर्षों तक अधूरी रह सकती हैं। इसकी सबसे ज़्यादा मार गरीब और पिछड़े इलाकों पर पड़ती है, जिन्हें पानी, बिजली, सड़क और रोज़गार की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।
भारत को विकास और पर्यावरण में से किसी एक को चुनने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें परियोजना बनाने वालों और उसका विरोध करने वालों, दोनों को अपने दावों के समर्थन में सबूत देने पड़ें। कानून टूटे तो अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए, लेकिन मुकदमेबाज़ी तथ्य-आधारित फ़ैसलों का विकल्प नहीं बननी चाहिए।
तीनों उदाहरण एक ही निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं। नर्मदा बताती है कि बांध पानी और बिजली देने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। टिहरी दिखाता है कि बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट कितने उपयोगी हो सकते हैं, पर उनकी सुरक्षा की निरंतर निगरानी भी ज़रूरी है। मथुरा बताती है कि उद्योग और धरोहरों का संरक्षण साथ चल सकते हैं, बशर्ते पर्यावरणीय नियमों का प्रभावी पालन हो।
हर परियोजना का आंख मूंदकर विरोध करना सही रास्ता नहीं है। भारत को असली पर्यावरण रक्षक चाहिए, बैठे-बिठाए खतरे गिनाने वाले नहीं। देश को सुरक्षा उपायों के साथ विकास चाहिए, बिना सबूत के अड़ंगे नहीं।