यूपी में योगी की हैट्रिक होगी या सत्ता का गणित बिगड़ेगा?
योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, हवाई संपर्क, निवेश और अर्थव्यवस्था के विस्तार जैसे क्षेत्रों में बदलाव हुए हैं। अपराध नियंत्रण और बुनियादी ढांचे को भाजपा अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करती है, जबकि मुठभेड़ों, बुलडोजर कार्रवाई, निष्पक्षता और नागरिक अधिकारों पर सवाल भी कायम हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव इन उपलब्धियों के साथ रोजगार, विकास और शासन की जवाबदेही की भी परीक्षा होगा। दस साल की सत्ता के बाद योगी की हैट्रिक का रास्ता इन बदलावों के प्रति जनता के भरोसे और बदलाव की इच्छा से तय होगा।
-बृज खंडेलवाल-
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को चुनौती आखिर देगा कौन? चुनावी रणभेरी बजने से पहले ही सियासी गलियारों में यह सवाल गूंजने लगा है। न कोई बड़ा जनआक्रोश दिख रहा है, न विरोधियों के हाथ कोई ऐसा मुद्दा नजर आता है, जिस पर सत्ता-विरोधी लहर खड़ी हो सके। आम आदमी को सबसे पहले चाहिए अमन-चैन, कानून का राज और ऐसी सरकार, जो काम करती दिखाई दे। बाकी वादे और नारे बाद में आते हैं। योगी की सियासत की असली ताकत यही मानी जा रही है। उनकी सरकार का इकबाल कायम है। भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों से उनकी निजी छवि पर कोई निर्णायक दाग नहीं लगा, हालांकि विपक्ष समय-समय पर शासन-शैली और चयनित कार्रवाई के सवाल उठाता रहता है। उनकी कार्यशैली ऐसी है कि मंत्री हों या अफसर, सबको अपनी कुर्सी हिलने का एहसास बना रहता है। दूसरे राज्यों में भी उनके शासन मॉडल की चर्चा होती है।
लेकिन क्या कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक कसावट और मजबूत नेतृत्व का यह तिलिस्म 2027 में भाजपा को लगातार तीसरी जीत दिला पाएगा? या दस साल की सत्ता के बाद बदलाव की चाहत अचानक करवट लेगी? यही वह अग्निपरीक्षा है, जो योगी की हैट्रिक का रास्ता तय करेगी।
कभी उत्तर प्रदेश का नाम आते ही बदहाली, अपराध, भ्रष्टाचार और जातीय खींचतान की तस्वीर उभरती थी। उद्योगपति निवेश से कतराते थे। नौजवान रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते थे। सड़कों, बिजली और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने विकास की रफ्तार रोक रखी थी। इसी वजह से उत्तर प्रदेश को लंबे समय तक BIMARU राज्यों की सूची में गिना जाता रहा।
फिर मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। करीब एक दशक बाद तस्वीर में कई बदलाव दिखाई देते हैं। एक्सप्रेसवे का जाल फैल रहा है, हवाई अड्डों की संख्या बढ़ी है, निवेश की कोशिशें तेज हुई हैं और कानून-व्यवस्था सरकार के एजेंडे में प्रमुख स्थान पर है।
क्या उत्तर प्रदेश पूरी तरह बदल चुका है? बिल्कुल नहीं। लेकिन 2017 के बाद हुए बदलावों को नजरअंदाज करना भी मुश्किल है।
पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा बदलाव कानून-व्यवस्था को लेकर बनी धारणा में दिखाई देता है। 2017 से पहले अपराधी गिरोहों, बाहुबलियों और राजनीतिक संरक्षण की चर्चा आम थी। कारोबारियों को रंगदारी की चिंता सताती थी। आम नागरिक पुलिस की कार्यप्रणाली और राजनीतिक दखलंदाजी पर सवाल उठाते थे।"
योगी सरकार ने संगठित अपराध और माफिया नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी पहचान बनाया। पुलिस भर्ती, आपातकालीन सहायता सेवाओं और अपराध नियंत्रण पर जोर दिया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़ों में उत्तर प्रदेश की दर्ज अपराध दर राष्ट्रीय औसत से लगभग 28 प्रतिशत कम रही है। राज्य का अपराध दर प्रति लाख जनसंख्या पर 180.2 रहा, जबकि राष्ट्रीय औसत 252.3 था।
सरकार सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण और सुरक्षा में सुधार को भी अपनी उपलब्धि बताती है। दूसरी ओर, मुठभेड़ों, बुलडोजर कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया के पालन पर सवाल उठते रहे हैं।
साफ है कि सुरक्षा आम आदमी और निवेशक, दोनों के लिए जरूरी है। लेकिन कानून का राज केवल सख्ती से नहीं चलता। उसमें निष्पक्षता, जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है, कहती हैं सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर।
अगर कानून-व्यवस्था ने प्रदेश की छवि बदलने में भूमिका निभाई है, तो बुनियादी ढांचे ने उसके भूगोल को नई शक्ल दी है।
2017 से पहले उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे का नेटवर्क सीमित था। आज पूर्वांचल और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने कई क्षेत्रों की कनेक्टिविटी बेहतर की है। सड़कों के विस्तार से औद्योगिक केंद्रों, कृषि मंडियों और छोटे शहरों को जोड़ने में मदद मिल रही है।
हवाई संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। कई हवाई अड्डे चालू हुए हैं और जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद है।
सीतापुर के रिटायर्ड कॉलेज प्रिंसिपल त्रिपाठी जी कहते हैं, "बिजली आपूर्ति, ग्रामीण सड़कों और शहरी परिवहन में भी सुधार की कोशिशें हुई हैं। कई शहरों में मेट्रो सेवाओं का विस्तार हुआ है। सरकार की विकास रणनीति में बुनियादी ढांचे को खास जगह मिली है।"
2017 के बाद उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आकार काफी बढ़ा है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, सकल राज्य घरेलू उत्पाद 2016-17 के करीब 13.3 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में लगभग 30.25 लाख करोड़ रुपये हो गया है, यानी दोगुना से अधिक।
सरकार ने निवेश सम्मेलन आयोजित किए, अलग-अलग उद्योगों के लिए नीतियां बनाईं और निवेश मित्र जैसी सिंगल-विंडो व्यवस्था को बढ़ावा दिया।
एक जिला, एक उत्पाद योजना का उद्देश्य स्थानीय हुनर और पारंपरिक कारोबार को नए बाजारों से जोड़ना है। हस्तशिल्प, कपड़ा उद्योग और खाद्य उत्पादों के जरिए स्थानीय रोजगार बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी संबंधी अनुमानों में उत्तर प्रदेश ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। 2013-14 से 2022-23 के बीच करीब 5.94 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए, देश में सबसे बड़ी संख्या।
2027 का चुनाव इसलिए उपलब्धियों और जवाबदेही, दोनों की परीक्षा होगा।
उत्तर प्रदेश का उभार एक बड़ी संभावना है। लेकिन इस संभावना को हर नागरिक की खुशहाली में बदलना ही असली सुशासन की कसौटी है।