नीला ड्रम हत्याकांड: अपराध की मानसिकता से समाज की जिम्मेदारी तकः मुस्कान रस्तोगी की मनोदशा, रिश्तों की जटिलता और सामाजिक जिम्मेदारी पर मनोवैज्ञानिक पड़ताल
मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड में कोर्ट के फैसले के बाद सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अपराधियों को क्या सजा मिली, बल्कि यह भी है कि इस घटना से हम क्या सीख सकते हैं। मुस्कान की मनोदशा, पति और प्रेमी के व्यक्तित्व, पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थितियों और रोकथाम के उपायों पर तथ्यपरक चर्चा ही इस त्रासदी से कोई सार्थक सबक निकालने में मदद कर सकती है।
-डॉ. नवीन गुप्ता, निदेशक, CSCD-
मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी को फांसी की सजा सुनाए जाने की खबर के बीच चर्चा का केंद्र अपराध और दंड है, लेकिन इस मामले का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनती हैं, जिनमें कोई व्यक्ति अपने ही करीबी की हत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है? क्या इस घटना को केवल अपराध और सजा के नजरिये से देखना पर्याप्त है, या इसकी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है?
मुस्कान की मनोदशा: किन परिस्थितियों ने लिया ऐसा मोड़?
इस मामले का पहला महत्वपूर्ण सवाल मुस्कान रस्तोगी की मनोदशा से जुड़ा है। उसके विचारों, भावनाओं और निर्णय लेने की प्रक्रिया में ऐसे कौन-से कारक प्रभावी रहे होंगे, जिन्होंने उसे इस अपराध तक पहुंचाया? क्या प्रेम संबंध के प्रति आकर्षण, भावनात्मक उलझन, स्वार्थ या परिस्थितियों के प्रति उसकी प्रतिक्रिया ने उसकी निर्णय क्षमता को प्रभावित किया? क्या उसके व्यवहार में ऐसे संकेत थे, जिनसे उसकी सोच और मनोदशा को समझा जा सकता था?
इन सवालों के जवाब अनुमान के आधार पर नहीं दिए जा सकते। इसके लिए घटना से संबंधित तथ्यों, व्यवहारगत साक्ष्यों और उपलब्ध होने पर वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक आकलन का सहारा लेना जरूरी है। किसी जघन्य अपराध को अंजाम देना अपने आप में किसी मानसिक बीमारी का प्रमाण नहीं है। इसलिए मुस्कान की मनोदशा पर चर्चा करते समय तथ्य और कल्पना के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
पति और प्रेमी का व्यक्तित्व: क्या हुआ था मनोवैज्ञानिक आकलन?
इस घटना का दूसरा पहलू पति, पत्नी और प्रेमी के व्यक्तित्व तथा पारस्परिक व्यवहार से संबंधित है। क्या इन तीनों के व्यक्तित्व, भावनात्मक व्यवहार और निर्णय लेने की प्रवृत्तियों का कोई मनोवैज्ञानिक आकलन किया गया था? यदि किया गया था, तो उसके निष्कर्ष क्या थे? और यदि ऐसा आकलन नहीं हुआ, तो क्या इस तरह के गंभीर मामलों में विशेषज्ञों की मदद से संबंधित व्यवहार को समझने की संभावना पर विचार नहीं किया जाना चाहिए?
इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में राय बनाना नहीं, बल्कि घटना से जुड़े व्यवहार और परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझना है। हालांकि, किसी भी मनोवैज्ञानिक आकलन के निष्कर्षों को वास्तविक तथ्यों और विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर ही स्वीकार किया जाना चाहिए। बिना प्रमाण के किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व या मानसिक स्थिति के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
समाज की भूमिका: केवल अपराधी जिम्मेदार या पृष्ठभूमि पर भी विचार हो?
तीसरा सवाल समाज की जिम्मेदारी से जुड़ा है। किसी अपराध के लिए कानूनी जिम्मेदारी अपराध करने वाले व्यक्ति की होती है, लेकिन ऐसे मामलों की पृष्ठभूमि को समझना भी सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पारिवारिक संबंधों में संवाद की कमी, रिश्तों में अविश्वास, भावनात्मक असंतुलन और नैतिक मूल्यों को लेकर बदलती धारणाएं मानवीय संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, इनमें से किसी एक कारक को ऐसे जघन्य अपराध का सीधा कारण नहीं माना जा सकता।
जरूरत इस बात की है कि हम व्यक्तिगत व्यवहार के साथ उन पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों पर भी विचार करें, जिनमें संबंधों का तनाव बढ़ता है और समस्याओं के समाधान के रास्ते सीमित हो जाते हैं। क्या परिवारों में एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और खुलकर बातचीत करने की पर्याप्त गुंजाइश है? क्या रिश्तों में पैदा होने वाले गंभीर मतभेदों को समय रहते पहचानने और सुलझाने की कोशिश की जाती है?
ऐसे सवालों पर विचार करना किसी अपराध का बचाव नहीं है। इसका उद्देश्य उन परिस्थितियों को समझना है, जिनसे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के प्रयासों को दिशा मिल सकती है।
भविष्य में ऐसे अपराधों की रोकथाम कैसे हो?
चौथा और सबसे व्यावहारिक सवाल यह है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की आशंका कम करने के लिए समाज क्या कर सकता है। परिवारों में संवाद, भावनात्मक समझ, रिश्तों में विश्वास और आपसी मतभेदों के शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करना जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लेकर जागरूकता बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर समय पर मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रयास होने चाहिए।
स्कूलों और कॉलेजों में विद्यार्थियों को भावनाओं को समझने, तनाव से निपटने और संबंधों में पैदा होने वाले मतभेदों का समाधान खोजने के बारे में जागरूक किया जा सकता है। सामाजिक संगठन भी परिवारों और युवाओं के बीच संवाद तथा मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि केवल जागरूकता या परामर्श से हर जघन्य अपराध रोका जा सकता है। लेकिन वैज्ञानिक समझ, समय पर सहायता और स्वस्थ पारिवारिक संवाद ऐसे प्रयासों को मजबूत आधार दे सकते हैं।
किसी जघन्य अपराध के बाद न्याय और सजा पर चर्चा स्वाभाविक है, लेकिन उसके साथ यह समझने का प्रयास भी जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति की मनोदशा, पारस्परिक संबंधों और सामाजिक परिस्थितियों की भूमिका क्या रही होगी। यह चर्चा तभी उपयोगी होगी, जब इसे पूर्वाग्रह से मुक्त, वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित और संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ किया जाए। न तो बिना प्रमाण किसी मानसिक विकार की कल्पना की जानी चाहिए और न ही सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करके अपराध की जिम्मेदारी को कम किया जाना चाहिए।