नेहा बोरा की याचिका पर फैसला शुक्रवार को, दिल्ली पुलिस ने कहा- याचिका मेंटेनेबल नहीं, बोरा के वकील बोले- लोकतंत्र में रिजीम चेंज की मांग गलत नहीं
जस्टिस सुब्रहमण्यम प्रसाद की बेंच ने नेहा बोरा की याचिका पर सुनवाई की। नेहा बोरा की तरफ से एडवोकेट गोपाल शंकर नारायण ने बहस की। दिल्ली पुलिस की तरफ से एएसजी चेतन शर्मा पेश हुए।
नई दिल्ली। आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। कोर्ट का फैसला शुक्रवार (23 अक्टूबर) को आएगा। नेहा बोरा ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (एसईएम) द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी गई है, जिसमें उन्हें 10000 रुपये का बॉन्ड भरने और 'शांति बनाए रखने' का निर्देश दिया गया था। याचिका का विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा कि नेहा बोरा की याचिका मेंटेनेबल नहीं है।
सुनवाई के दौरान नेहा बोरा के वकील गोपाल शंकर नारायण ने कहा कि लोकतंत्र में रिजीम चेंज की मांग करने में कुछ भी गलत नहीं है। एएसजी चेतन शर्मा ने गोपाल शंकर नारायण के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन केवल चुनाव के जरिए हो सकता है, न कि दिल्ली के बीचों-बीच इकट्ठे हुए उपद्रवी तत्वों द्वारा।
एडवोकेट गोपाल शंकर नारायण ने कोर्ट को बताया कि उस इलाके मे बीएनएसएस 163 लागू नहीं थी, लेकिन लाउडस्पीकर से बताया जा रहा था कि 163 लागू है। उन्होंने कहा कि यह तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि नेहा बोरा ने कनॉट प्लेस के बारे में कुछ नहीं कहा है, जबकि नोटिस में लिखा है, 'बिना अनुमति के राष्ट्रीय ध्वज फहराना'। मुझे हैरानी है कि कोई ऐसा कैसे कह सकता है। राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा कि मान लीजिए कि कोई मजिस्ट्रेट को बताता है कि कोई व्यक्ति वहाँ नारे लगा रहा था और बस इसी आधार पर वह धारा 126 के तहत बीएनएसएस का नोटिस जारी करता है, तो क्या बिना किसी जाँच-पड़ताल के ही धारा 126 का नोटिस जारी कर देता है, जबकि यह भी पता लगाना जरूरी है कि वो व्यक्ति शायद वहाँ मौजूद ही न हो और उसी दिन प्रेस में खबर छपी हो कि वह व्यक्ति किसी अन्य स्थान पर भाषण दे रहा था? ऐसे में क्या मजिस्ट्रेट के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह स्वतंत्र रूप से जाँच करे कि प्राप्त जानकारी कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त रूप से विश्वसनीय है या नहीं?
हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा कि जब आप धारा 130 और 126 को मिलाकर धारा 130 का नोटिस या आदेश जारी करते हैं, तो क्या इसका यह मतलब नहीं होगा कि मजिस्ट्रेट ने पहले से ही मन बना लिया था। अदालत ने दिल्ली पुलिस से ये भी पूछा कि आपके मुताबिक 'अपराध करने की संभावना' वाली जानकारी मिलने का क्या मतलब है?
दिल्ली पुलिस की तरफ से एएसजी चेतन शर्मा ने कहा कि अगर ऐसी संभावना है कि कोई व्यक्ति शांति-भंग कर सकता है, तो बीएनएसएस की धारा 126 के साथ धारा 130 लागू हो जाती है। इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। इस तरह के तकनीकी बंटवारे से सार्वजनिक शांति और शांति-भंग के मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएंगे, इसलिए कई बार कानून आपको ऐसा करने के लिए बाध्य करता है।
एएसजी चेतन शर्मा ने एडवोकेट प्रशांत भूषण की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र करते हुए कोर्ट को बताया कि सीजेपी के नेताओं के साथ नेहा बोरा भी शामिल थी, जहां प्रशांत भूषण ने कहा कि ये रिजीम चेंज की लडाई है और हम रिजीम चेंज कराकर रहेंगे। एएसजी ने कहा कि नेहा बोरा ने 12 बार कानून का उल्लंघन किया है।