400 करोड़ रुपये में नॊर्थ बाईपास बना, फिर भी आगरा शहर में दौड़ रहे भारी वाहन, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और प्राधिकरणों को जारी किया नोटिस
आगरा। आगरा में भारी वाहनों से हो रही जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन ने राष्ट्रीय राजमार्ग-19 पर भारी वाहनों की आवाजाही का मुद्दा उठाया है, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से आगरा उत्तरी बाईपास बनने के बावजूद शहर के बीच से गुजर रहे भारी वाहनों को रोकने की मांग पर अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को होगी।
चार किलोमीटर की दूरी बचाने के लिए शहर में भारी वाहनों का दबाव
के.सी. जैन की ओर से दाखिल अंतरिम आवेदन संख्या 18487/2026 शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने सड़क सुरक्षा से संबंधित अन्य मामलों की सुनवाई के दौरान यह मुद्दा न्यायालय के समक्ष उठाया। उनकी दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया।
आवेदन के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्ग-19 आगरा के घनी आबादी वाले क्षेत्रों से होकर गुजरता है। इसके आसपास आवासीय कॉलोनियां, स्कूल, अस्पताल, बाजार और ऐतिहासिक स्मारक स्थित हैं। सिकंदरा, खंदारी, भगवान टॉकीज, रामबाग और ट्रांस यमुना जैसे क्षेत्रों में भारी वाहनों के साथ स्थानीय यातायात भी चलता है। ऐसे में तेज रफ्तार ट्रकों और कंटेनरों की आवाजाही से आम नागरिकों, स्कूली बच्चों, मरीजों, पैदल यात्रियों और दोपहिया वाहन चालकों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है।
दो दुर्घटनाओं में पांच लोगों की मौत का उल्लेख
आवेदन में भारी वाहनों से हुई कई जानलेवा दुर्घटनाओं का उल्लेख किया गया है। इनमें 8 जनवरी 2026 को विजय नगर कॉलोनी के पास ट्रक के सड़क किनारे एक झोपड़ी पर पलटने से तीन लोगों की मौत और 15 जनवरी को सिकंदरा के पास ट्रक की टक्कर से दो लोगों की मौत की घटनाएं शामिल हैं। आवेदन में सिकंदरा, खंदारी और अन्य स्थानों पर हुई दुर्घटनाओं का भी हवाला दिया गया है।
के.सी. जैन का तर्क है कि जब शहर के बाहर से भारी वाहनों को निकालने के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध है, तो आगरा में गंतव्य नहीं रखने वाले वाहनों को घनी आबादी के बीच से गुजरने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
14 किलोमीटर का उत्तरी बाईपास, शहर के बाहर से वैकल्पिक रास्ता
आवेदन के मुताबिक, लगभग 400 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित 14 किलोमीटर लंबा आगरा उत्तरी बाईपास 4 दिसंबर 2025 से चालू है। यह यमुना एक्सप्रेसवे से जुड़कर शहर के बाहर से गुजरने का वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराता है।
आवेदन में बताया गया है कि शहर के भीतर से गुजरने वाला मार्ग लगभग 34 किलोमीटर, जबकि उत्तरी बाईपास और यमुना एक्सप्रेसवे के रास्ते की कुल दूरी लगभग 38 किलोमीटर है। इस प्रकार शहर के बाहर से जाने पर भारी वाहनों को करीब चार किलोमीटर अतिरिक्त चलना होगा। के.सी. जैन के अनुसार, इतनी कम अतिरिक्त दूरी के बावजूद भारी वाहनों का शहर के भीतर से गुजरना सड़क सुरक्षा के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय है।
टोल व्यवस्था में बदलाव और भारी वाहनों के लिए अनिवार्य बाईपास की मांग
आवेदन में यह भी कहा गया है कि उत्तरी बाईपास और यमुना एक्सप्रेसवे के रास्ते अलग-अलग टोल वसूले जाने के कारण कुछ भारी वाहन अतिरिक्त टोल से बचने के लिए शहर के भीतर से गुजरना पसंद करते हैं। इससे बाईपास का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस समस्या के समाधान के लिए आवेदन में टोल व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने और संबंधित प्राधिकरणों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की मांग की गई है।
वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि जिन भारी व्यावसायिक वाहनों का आगरा में कोई गंतव्य नहीं है, उनके लिए राष्ट्रीय राजमार्ग-19 पर शहर के भीतर से गुजरने के बजाय उत्तरी बाईपास और यमुना एक्सप्रेसवे का उपयोग अनिवार्य किया जाए।
इसके लिए आवश्यक सरकारी अधिसूचना जारी करने, प्रमुख स्थानों पर स्पष्ट यातायात संकेतक लगाने और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग भी की गई है।
आवेदन में यह व्यवस्था देश के उन अन्य शहरों में भी लागू करने का अनुरोध किया गया है, जहां बाईपास उपलब्ध हैं। इसके पीछे उद्देश्य शहरों के भीतर भारी वाहनों का दबाव कम करना, सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाना तथा यातायात जाम, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण से राहत दिलाना है।
‘बाईपास का उद्देश्य शहर के लोगों की जान बचाना’
सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन ने कहा कि जब सरकार जनता के लगभग 400 करोड़ रुपये खर्च करके बाईपास बना चुकी है, तो भारी वाहनों को शहर के बीच से गुजरने की अनुमति क्यों दी जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल चार किलोमीटर की दूरी या कुछ टोल बचाने के लिए लोगों की जान जोखिम में डालना उचित है?
जैन के अनुसार, सड़क दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं होती, बल्कि इससे पूरा परिवार प्रभावित होता है। सड़क सुरक्षा का वास्तविक उद्देश्य दुर्घटना होने के बाद मुआवजा देना नहीं, बल्कि दुर्घटना को पहले ही रोकना होना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मांग वाहनों की आवाजाही या व्यापार रोकने की नहीं है। जिन भारी वाहनों का आगरा से कोई संबंध नहीं है, उन्हें शहर के बाहर बने बाईपास से निकाला जाना चाहिए। बाईपास बनाने का उद्देश्य केवल सड़क तैयार करना नहीं, बल्कि शहर के लोगों की जान बचाना भी है।
के.सी. जैन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने से इस समस्या के प्रभावी समाधान की उम्मीद जगी है। मामले में अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को निर्धारित है।