खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में सवर्ण समाज का प्रदर्शन, आरक्षण व यूजीसी नीतियों के खिलाफ हजारों की लामबंदी

खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में भी आरक्षण, यूजीसी नीतियों और विभिन्न विधिक प्रावधानों की समीक्षा की मांग को लेकर सवर्ण समाज ने शक्ति प्रदर्शन किया। युवराज परिहार के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग बाकलपुर के डॉ. बीपीएस डिग्री कॉलेज पर जुटे और महाराणा प्रताप चौराहा होते हुए परशुराम भवन तक रैली निकाली। आयोजकों ने इसे किसी जाति के विरोध के बजाय समानता और निष्पक्षता की मांग बताया। लगातार दूसरे दिन हुए प्रदर्शन से यह मुद्दा आगरा के स्थानीय राजनीतिक विमर्श में जरूर उभरता दिखाई दे रहा है। हालांकि, इसके व्यापक चुनावी असर का आकलन आने वाले दिनों में होने वाली लामबंदी और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया के आधार पर ही किया जा सकेगा।

Aug 26, 2026 - 21:05
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खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में सवर्ण समाज का प्रदर्शन, आरक्षण व यूजीसी नीतियों  के खिलाफ हजारों की लामबंदी
यूजीसी के विरोध में मार्च निकालते सवर्ण समाज के लोग।

हजारों लोगों ने निकाली पैदल रैली, समानता और विधि के समान संरक्षण की मांग, लगातार दूसरे दिन प्रदर्शन से प्रशासन सतर्क, राजनीतिक दलों के लिए बढ़ सकती है चुनौती

आगरा। यूजीसी की नीतियों, आरक्षण व्यवस्था और एससी-एसटी अधिनियम समेत विभिन्न विधिक प्रावधानों की समीक्षा की मांग को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रही बहस अब आगरा में भी सड़क पर दिखाई देने लगी है। खेरागढ़ में एक दिन पहले हुए सवर्ण समाज के पैदल मार्च के बाद बुधवार को शमसाबाद में भी सवर्ण समाज ने बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया। बड़ी संख्या में लोग सड़क पर उतरे और अपनी मांगों के समर्थन में रैली निकाली। हालांकि, प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा और किसी अप्रिय स्थिति की सूचना नहीं है।

युवराज परिहार के नेतृत्व में बड़ी संख्या में सवर्ण समाज के लोग बाकलपुर स्थित डॉ. बीपीएस डिग्री कॉलेज पर एकत्र हुए। यहां से रैली शुरू हुई, जो एपी इंटर कॉलेज मोड़, महाराणा प्रताप चौराहा होते हुए परशुराम भवन पहुंचकर समाप्त हुई। रैली के दौरान महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी की नीतियों, आरक्षण व्यवस्था और एससी-एसटी अधिनियम सहित विभिन्न कानूनी प्रावधानों की समीक्षा की मांग उठाई। लगातार दूसरे दिन जिले के अलग-अलग हिस्सों में इस तरह का प्रदर्शन सामने आने से प्रशासन की भी नजर इस गतिविधि पर बनी हुई है।

'किसी जाति के खिलाफ नहीं, समानता की मांग'

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे युवराज परिहार ने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य किसी विशेष जाति या समुदाय को निशाना बनाना नहीं है। उनके मुताबिक समाज की मांग समानता, निष्पक्षता और कानून के समान संरक्षण को लेकर है। आयोजकों का कहना है कि आरक्षण व्यवस्था और अन्य विधिक प्रावधानों की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए, ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय की भावना पैदा न हो और संवैधानिक व्यवस्था में लोगों का विश्वास मजबूत बना रहे।

खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में प्रदर्शन ने बढ़ाई सियासी हलचल

खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में प्रदर्शन को केवल स्थानीय कार्यक्रम के तौर पर देखना राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं होगा। लगातार दो क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों का एक ही मुद्दे पर सड़क पर उतरना यह संकेत जरूर देता है कि आरक्षण, यूजीसी नीतियां और कथित कानूनी असमानता जैसे मुद्दे स्थानीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन प्रदर्शनों का किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में सीधा असर पड़ेगा। लेकिन यदि आने वाले दिनों में इसी तरह के प्रदर्शन जिले के अन्य ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में भी होते हैं, तो राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति और संवाद दोनों पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।

सबसे बड़ा असर चुनावी मुद्दों पर पड़ सकता है

इन प्रदर्शनों का संभावित राजनीतिक असर मुख्य रूप से तीन स्तरों पर दिखाई दे सकता है।  पहला यदि विभिन्न संगठनों की गतिविधियां लगातार बढ़ती हैं और स्थानीय स्तर पर साझा मंच बनता है, तो यह वर्ग अपने मुद्दों को चुनावी एजेंडे में अधिक प्रमुखता से लाने की कोशिश कर सकता है। दूसरा आरक्षण और एससी-एसटी अधिनियम जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कोई भी दल ऐसा रुख नहीं अपनाना चाहेगा जिससे किसी एक सामाजिक समूह में नाराजगी पैदा हो। इसलिए आने वाले समय में दलों के नेताओं के बयानों और स्थानीय बैठकों पर नजर रहेगी।

तीसरा यदि विरोध का स्वर केवल नीतिगत समीक्षा और समानता की मांग तक सीमित रहता है, तो यह लोकतांत्रिक विरोध के रूप में सामने आएगा। लेकिन यदि मुद्दा जातीय टकराव की भाषा में बदलता है, तो इसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हो सकता है। इसलिए आयोजकों और प्रशासन दोनों के सामने आंदोलन को शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में बनाए रखने की चुनौती रहेगी। आगरा में फिलहाल सामने आए दोनों प्रदर्शन स्थानीय स्तर के कार्यक्रम हैं। इन्हें किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप मिल गया है, ऐसा निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में प्रदर्शन यह जरूर दिखाता है कि मुद्दे को लेकर संगठित लामबंदी की कोशिश शुरू हो चुकी है।

यदि आने वाले दिनों में आगरा के अन्य कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो यह प्रशासन के साथ-साथ राजनीतिक दलों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत होगा। खासकर ऐसे समय में जब सामाजिक समीकरण चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इन मांगों की अनदेखी किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगी।

पुलिस की सतर्कता से शांतिपूर्ण रहा कार्यक्रम

प्रदर्शन के दौरान समाज के जिम्मेदार लोगों ने भीड़ से शांति बनाए रखने की अपील की। पुलिस की सतर्कता और आयोजकों के सहयोग से कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है। प्रदर्शन में युवराज परिहार, राजेश सिंह, हेमंत परिहार, शिशुपाल सिंह धाकरे, जितेंद्र सिकरवार, राजू ठाकुर, विष्णु दत्त शर्मा, हुकम सिंह, नीरू प्रधान, जोगेंद्र सिंह, भानू सिकरवार, शिवा तोमर, पुनीत शर्मा, विशाल शर्मा, चंद्र मोहन शर्मा, दीपक तोमर, एवरन सिंह, सतेन्द्र, मुनेद्र चौहान, भानवेन्द्र, ध्रुव सिकरवार, अभय जादौन, नरेंद्र, भूरा, जसवंत सिंह, वीरेश, मोहित, कन्हैया, धीरज, राजेश, श्रीभगवान, संतोष, देवा, अजय तोमर, लोटन, राहुल शर्मा, आकाश, सोनू पंडित और हरिओम समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।