कोलंबो में गूंजी आगरा विवि की आवाज, प्रो. आशु रानी ने साझा विरासत और शोध सहयोग पर दिया जोर

श्रीलंका के कोलंबो स्थित बुद्धिस्ट एवं पाली विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन इंडिया एंड श्रीलंका–2026’ में डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा की कुलपति प्रो. आशु रानी ने भारत और श्रीलंका की साझा ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने रामायण परंपरा और बौद्ध धर्म को दोनों देशों की निकटता का प्रमुख आधार बताते हुए विश्वविद्यालयों के बीच शोध एवं शैक्षणिक सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता जताई। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय में उपलब्ध पाली पांडुलिपियों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से शोध की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। सम्मेलन में केएमआई के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर, शोधकर्ताओं और स्वास्तिक हैंडराइटिंग वेलफेयर ट्रस्ट के प्रतिनिधियों ने भी सहभागिता की।

Oct 14, 2026 - 18:36
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कोलंबो में गूंजी आगरा विवि की आवाज, प्रो. आशु रानी ने साझा विरासत और शोध सहयोग पर दिया जोर
श्रीलंका की राजधानी कोलंबो स्थित बुद्धिस्ट एवं पाली विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन इंडिया एंड श्रीलंका–2026’ में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुईं कुलपति प्रो. आशु रानी।

डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी ने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में किया भारत का प्रतिनिधित्व, पाली पांडुलिपियों पर एआई के जरिए शोध की संभावनाएं तलाशने की बात

आगरा/कोलंबो। भारत और श्रीलंका के संबंध केवल भौगोलिक निकटता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देश साझा इतिहास, धर्म, दर्शन, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं की मजबूत डोर से सदियों से जुड़े हुए हैं। इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने, नई पीढ़ी तक पहुंचाने और दोनों देशों के बीच शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक सहयोग को नई दिशा देने की आवश्यकता है। यह विचार डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा की कुलपति प्रो. आशु रानी ने श्रीलंका की राजधानी कोलंबो स्थित बुद्धिस्ट एवं पाली विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन इंडिया एंड श्रीलंका–2026’ में मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए।

सम्मेलन में भारत और श्रीलंका के बीच ऐतिहासिक, सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर विद्वानों ने विचार साझा किए। इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ (केएमआई) के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर ने अपने शैक्षणिक दल के साथ भारत का प्रतिनिधित्व किया। आगरा की सामाजिक एवं आध्यात्मिक संस्था स्वास्तिक हैंडराइटिंग वेलफेयर ट्रस्ट की सचिव श्रुति दास और आईटी इंचार्ज अंशिका मित्तल ने भी सम्मेलन में सहभागिता करते हुए अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।

रामायण और बौद्ध परंपरा भारत-श्रीलंका की सांस्कृतिक निकटता के आधार

सम्मेलन के पूर्ण सत्र का विषय ‘भारत और श्रीलंका के बीच सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समझ का विकास’ रहा। सत्र की अध्यक्षता भारत की ओर से प्रो. शिखा श्रीधर और श्रीलंका की ओर से वरिष्ठ प्रो. मोरागोल्लागामा उपरतना थेरो ने की। डॉ. संगीता कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं, जबकि सत्र का संचालन वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. हसनथा वसना समरसिंघा ने किया।

मुख्य वक्ता प्रो. आशु रानी ने कहा कि रामायण परंपरा और बौद्ध धर्म भारत तथा श्रीलंका के बीच आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों के प्रमुख आधार रहे हैं। दोनों देशों की साझा विरासत ने सदियों से उनके बीच मैत्री, संवाद और परस्पर समझ को मजबूत किया है। उन्होंने सम्राट अशोक द्वारा अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका भेजे जाने का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संघमित्रा द्वारा बोधिवृक्ष की शाखा श्रीलंका ले जाना दोनों देशों के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संबंधों का महत्वपूर्ण उदाहरण है। प्रो. आशु रानी ने कहा कि विश्वविद्यालयों, शोधकर्ताओं और साहित्यकारों के बीच निरंतर संवाद स्थापित करके इस साझा विरासत को नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग से न केवल ऐतिहासिक संबंधों को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि नए शोध और ज्ञान के आदान-प्रदान के अवसर भी विकसित होंगे।

पाली पांडुलिपियों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से शोध की संभावनाएं

अपने संबोधन में कुलपति प्रो. आशु रानी ने पाली भाषा और उससे संबंधित पांडुलिपियों के अध्ययन की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में पाली भाषा की पर्याप्त संख्या में पांडुलिपियां उपलब्ध हैं। इन ऐतिहासिक एवं साहित्यिक धरोहरों के संरक्षण और अध्ययन के लिए भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने पाली भाषा की पांडुलिपियों पर आधुनिक तकनीक की मदद से शोध करने और प्राचीन ज्ञान को व्यवस्थित रूप से समझने की संभावनाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। उनके अनुसार, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय शोध के नए रास्ते खोल सकता है। इससे प्राचीन साहित्य के अध्ययन, पांडुलिपियों के संरक्षण और भारत-श्रीलंका की साझा बौद्ध विरासत को समझने में सहायता मिल सकती है।

श्रीलंका के कुलपति ने शैक्षणिक सहयोग को बताया महत्वपूर्ण

बुद्धिस्ट एवं पाली विश्वविद्यालय, श्रीलंका के कुलपति प्रो. वेन. होमगामा धम्मानंद थेरो ने भारत और श्रीलंका के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को दोनों देशों की मैत्री का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने बौद्ध परंपरा, साझा सांस्कृतिक मूल्यों और शैक्षणिक सहयोग को मजबूत बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शोध, ज्ञान-विनिमय और परस्पर समझ को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारतीय दूतावास की ओर से द्वितीय सचिव रमैया चंद्र शेखरन ने भी भारत और श्रीलंका के संबंधों के महत्व पर प्रकाश डाला। सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर हुए विमर्श के माध्यम से दोनों देशों के बीच शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संवाद को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

दीप प्रज्वलन के साथ हुआ सम्मेलन का शुभारंभ

बुधवार को सम्मेलन के प्रथम दिवस का शुभारंभ विधिवत दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर बुद्धिस्ट एवं पाली विश्वविद्यालय, श्रीलंका के कुलपति प्रो. वेन. होमगामा धम्मानंद थेरो, डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा की कुलपति प्रो. आशु रानी, केएमआई के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर और पद्मश्री डॉ. ऊषा यादव सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित किया तथा भगवान बुद्ध की प्रतिमा के समक्ष पुष्प अर्पित किए। कार्यक्रम में श्रीलंकाई विद्यार्थियों ने मनमोहक सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत किया। वहीं, सरस्वती वंदना को स्वर ज्योति मित्तल (नूतन) ने दिए। भारतीय और श्रीलंकाई सांस्कृतिक परंपराओं की झलक प्रस्तुत करने वाले आयोजन ने सम्मेलन के शैक्षणिक वातावरण को सांस्कृतिक आयाम भी प्रदान किया।

साझा विरासत पर आधारित शोध समालोचन पुस्तक का विमोचन

सम्मेलन के दौरान भारत और श्रीलंका के ऐतिहासिक, साहित्यिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों पर आधारित शोध समालोचन पुस्तक का विमोचन भी किया गया। इस पुस्तक के संपादन मंडल में शामिल प्रो. शिखा श्रीधर, संगीता कुमार, विनीता कुमार, हंसिका कुमारी, नूतन अग्रवाल, डॉ. कामना सिंह, डॉ. प्रेमलता और निखिल कुमार को सम्मानित किया गया। सम्मेलन में शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले सभी लेखकों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए। आयोजन का उद्देश्य दोनों देशों की साझा विरासत के विभिन्न पहलुओं को अकादमिक दृष्टिकोण से समझना, शोध को प्रोत्साहित करना और भविष्य में शैक्षणिक सहयोग की संभावनाओं को मजबूत करना रहा।

भारतीय शोधकर्ताओं ने विविध विषयों पर रखे विचार

अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत और श्रीलंका के बीच सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों से जुड़े विभिन्न विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इनमें एकता अग्रवाल, डॉ. कामना सिंह, डॉ. डब्ल्यू. एम. अमिला दामयंती, डॉ. मधु वशिष्ठ, प्रो. मीरा अग्रवाल, हंसिका कुमारी, वेन. वाघ सचिन कैलास, राजवीर सिंह ओझा, प्रो. शम्पा चौधरी, प्रो. जया शर्मा, सोरन सिंह, डॉ. सुनीता सिंह, प्रियंका खंडेलवाल, डॉ. मधु ओझा, ज्योति मित्तल, श्रीमती चथुरिनी, डॉ. प्रेमलता प्रयागराज, श्रुति दास, अंशिका मित्तल और अखिल शर्मा शामिल रहे। सम्मेलन में प्रो. शिखा श्रीधर, प्रो. नीलिमा सिंह, प्रो. भावना पोखरना, प्रो. लक्ष्मण सेनवीरत्ने, प्रो. गीता यादवेंदु, प्रो. अल्पना मोहन और वेन. प्रो. मावतगामा पेमानंद थेरो सहित अनेक शिक्षाविदों एवं विद्वानों ने सहभागिता की। विभिन्न सत्रों का संचालन वेन. बेरलापनातारा धम्मरामा थेरो और विजिटिंग लेक्चरर डॉ. जे. ए. डी. सरसी उपेक्षिका रणसिंघे ने किया।

विवि के लिए अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संवाद का अवसर

कोलंबो में आयोजित यह सम्मेलन डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के लिए अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संवाद का महत्वपूर्ण अवसर रहा। कुलपति प्रो. आशु रानी और केएमआई के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर की सहभागिता ने साझा विरासत, पाली भाषा, बौद्ध दर्शन और आधुनिक तकनीक के जरिए शोध की संभावनाओं पर चर्चा का मंच प्रदान किया।

सम्मेलन में सामने आए विचारों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत और श्रीलंका के ऐतिहासिक संबंधों को केवल अतीत की विरासत के रूप में देखने के बजाय शिक्षा, शोध, साहित्य और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से वर्तमान तथा भविष्य से भी जोड़ा जाना चाहिए। पाली पांडुलिपियों के संरक्षण और एआई आधारित शोध की संभावनाएं इसी दिशा में नए अवसरों का संकेत देती हैं।