जीएसटी: सफल कर प्रणाली ने बदली अर्थव्यवस्था की तस्वीर, फिर भी पंजीकृत कारोबारियों पर गिरफ्तारी की तलवार क्यों? ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के दौर में प्रावधानों पर पुनर्विचार जरूरी

जीएसटी ने देश की अर्थव्यवस्था, राजस्व संग्रह, कारोबार के औपचारिकीकरण और राष्ट्रीय बाजार को एकीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बावजूद जीएसटी अधिनियम की धारा-69 में गिरफ्तारी के प्रावधान को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ईमानदार करदाताओं के मन से भय दूर करने और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को वास्तविक अर्थ देने के लिए ऐसे प्रावधानों की समीक्षा आवश्यक है।

Aug 25, 2026 - 12:10
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जीएसटी: सफल कर प्रणाली ने बदली अर्थव्यवस्था की तस्वीर, फिर भी पंजीकृत कारोबारियों पर गिरफ्तारी की तलवार क्यों? ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के दौर में प्रावधानों पर पुनर्विचार जरूरी

—पराग सिंघल—

एक जुलाई 2017 से लागू एवं प्रभावी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) अधिनियम ने भारत की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा प्रदान करने में महती भूमिका निभाने में सफलता प्राप्त की है। इस दावे में जून 2026 में हुए 2.11 लाख करोड़ रुपये के राजस्व संग्रह पर नजर डालना ही काफी होगा। इस दावे को झुठलाया नहीं जा सकता कि देश में बढ़ते औद्योगिक और व्यापारिक विकास के साथ जीएसटी ने आर्थिक व्यवस्था को स्थायित्व और सबलता प्रदान की है।

अब एक आंकड़े पर नजर डालना आवश्यक है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) भारत की आर्थिक वृद्धि का एक प्रमुख चालक साबित हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 में सकल संग्रह 22.27 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गया, जिससे सार्वजनिक अवसंरचना पर व्यय में वृद्धि हुई, कर आधार बढ़कर 1.65 करोड़ पंजीकृत व्यक्तियों तक पहुंचा और राष्ट्रीय बाजार की कार्यप्रणाली सुव्यवस्थित हुई है।

देश के आर्थिक प्रभाव और विकास की दृष्टि से राजस्व का महाशक्ति स्रोत जीएसटी बन चुका है, क्योंकि इससे औसतन लगभग 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का अनुमानित मासिक राजस्व उत्पन्न होता है। इस विशाल राजस्व संग्रह ने केंद्र और राज्य सरकारों को वित्तीय शक्ति प्रदान की है। व्यवसाय के औपचारिकीकरण की दृष्टि से छोटे और बड़े व्यापारियों को एक ही डिजिटल रिपोर्टिंग नेटवर्क में लाकर संगठित क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है।

यदि बात आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता की करें तो जीएसटी ने राज्यों की सीमाओं के पार लगने वाले करों के बोझ को कम किया ही है, साथ ही निर्माताओं के लिए परिवहन में देरी और लॉजिस्टिक्स लागत भी कम की है। इस सफलता में शीर्ष योगदान देने वाले राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात संग्रह में अग्रणी स्थान पर हैं, जो प्रमुख औद्योगिक और उपभोग केंद्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इन सफलताओं की कहानी का अध्ययन करने पर जीएसटी अधिनियम के एक प्रावधान की ओर नजर जाती है तो थोड़ा कष्ट का अनुभव होता है। इस भारी कर राजस्व संग्रह में जीएसटी के तहत पंजीकृत व्यक्तियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के अधीन पंजीकृत व्यक्ति देश के उपभोक्ताओं से जीएसटी वसूल कर उसे सरकारी कोष में जमा करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद जीएसटी अधिनियम की धारा-69 में पंजीकृत व्यक्ति की ‘‘गिरफ्तार करने की शक्ति’’ का प्रावधान रखा गया है।

यहां प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि ऐसे पंजीकृत व्यक्ति, जो सरकार के लिए उपभोक्ताओं से कर की वसूली करते हुए राजस्व संग्रह में योगदान देते हैं, उनके ऊपर गिरफ्तारी की तलवार भी लटकी रहे, तो इसका औचित्य क्या है? इस प्रकार के प्रावधान भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 21ए एवं 301 के स्पष्ट उल्लंघन की श्रेणी में आता है।

वैसे धारा-69 के प्रावधान को केंद्रीय उत्पाद कर अधिनियम, 1944 की धारा-13, सपठित धारा-19 एवं 21 के तहत प्राथमिक गिरफ्तारी के प्रावधान से लिया गया है, जो नामित अधिकारियों को किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। इस प्रकार का आतंकित करने वाला प्रावधान पंजीकृत व्यक्ति को हतोत्साहित करने वाला है। प्रश्न यह भी है कि ऐसे प्रावधान की आवश्यकता ही क्यों है?

हम मानते हैं कि 1944 में जब केंद्रीय उत्पाद कर अधिनियम बनाया गया था, उस समय भारत में अंग्रेजी शासन था और देश में गिने-चुने ही उद्योग हुआ करते थे। अंग्रेजी शासन का उद्देश्य इतना ही रहता था कि कैसे भी सख्त और ऐसे कानून बनाए जाएं, ताकि भारत के उद्योगपति आतंकित रहें और शासन को चुपचाप राजस्व प्रदान करते रहें, अन्यथा गिरफ्तारी का भय दिखाया जाता रहे।

इस प्रकार के प्रावधानों से दो उत्तर मिलते हैं। पहला, वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम का प्रमुख आधार केंद्रीय उत्पाद कर अधिनियम, 1944 ही रखा गया है। दूसरा, अधिनियम के तहत विभागीय अधिकारी को व्यापक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिससे पंजीकृत व्यक्ति के मन में यह भय बना रहता है कि यदि गलती से भी कोई गलती हो जाती है, तब सक्षम प्राधिकारी के पास यह मानने का कारण हो सकता है कि वह किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है।

वैसे तो सरकार एक तरफ देश में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की बात करती है, लेकिन दूसरी ओर ‘टफ ऑफ बिजनेस डूइंग’ का भी अनुभव रहता है। या यह कह सकते हैं कि सरकार का यह मान लेना है कि जहां व्यापार है, वहां कर चोरी तो होगी ही। यदि सरकार यह सोचती है कि जहां व्यापार है, वहां चोरी हो रही है, तब इस सत्य को स्वीकारना चाहिए कि जैसे-जैसे देश आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे नये तरीके भी अपनाए जाएंगे।

दूसरा यह भी महत्वपूर्ण अध्ययनशील प्रश्न है कि कुल पंजीकृत व्यक्तियों में ऐसे कितने व्यक्ति और कितने प्रतिशत होते हैं, जो येन-केन-प्रकारेण कर चोरी की मंशा पाले रहते हैं। लेकिन विचार करना आवश्यक है कि बहुतायत संख्या ईमानदार पंजीकृत व्यक्तियों की ही होती है, जो पूरी लगन और मेहनत से व्यापार करने में संलग्न रहते हैं। ऐसे में गिरफ्तारी के भय का प्रावधान इन ईमानदार व्यापारियों के मन में भी सताता रहता है।

दूसरा विचारणीय बिंदु यह भी है कि यदि सक्षम प्राधिकारी के पास यह मानने का कारण हो सकता है कि कोई व्यक्ति अधिनियम के तहत दंड का पात्र है, तब उसकी यह प्रमाणित करने की भी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि उस व्यक्ति का कृत्य वास्तव में गिरफ्तारी योग्य है। केवल प्रताड़ित करने के उद्देश्य से अधिकार का उपयोग करना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।

वैसे तो जीएसटी अधिनियम में 2017 के बाद से अनेक बदलाव हो चुके हैं, फिर भी इस प्रकार के आतंकित और भय उत्पन्न करने वाले प्रावधानों पर व्यापक विचार करते हुए उन्हें नया स्वरूप प्रदान करने की आवश्यकता अनुभव हो रही है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि 82 वर्ष के बाद भारत की औद्योगिक और व्यापारिक स्थिति में बड़ा बदलाव आ चुका है। उस समय की जीडीपी के साथ प्रति व्यक्ति आय में बड़ा ही नहीं, बल्कि अप्रत्याशित बदलाव आया है।

हमारा मानना यह भी है कि देश जैसे-जैसे आर्थिक दृष्टि से मजबूत होता जा रहा है और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे कानूनी प्रावधान भी सरल और आकर्षक होने चाहिए, ताकि करदाता प्रोत्साहित होते हुए देश की प्रगति में उत्साहपूर्ण भाग ले सके।

SP_Singh AURGURU Editor