यूपी का सत्ता संग्रामः सीएम योगी और अखिलेश यादव की महिलाओं को लेकर घोषणाओं ने चुनाव की बिसात पर खोला नया मोर्चा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और सपा के बीच महिला मतदाताओं को साधने की राजनीतिक होड़ तेज होती दिखाई दे रही है। योगी आदित्यनाथ की वरिष्ठ महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की घोषणा के जवाब में अखिलेश यादव के बड़े आर्थिक वादे इस मुकाबले को नई दिशा दे रहे हैं। भाजपा अपने कल्याणकारी योजनाओं और लाभार्थी मॉडल को आधार बना रही है, जबकि सपा आर्थिक सहायता और व्यापक मुफ्त यात्रा के जरिए नया भरोसा बनाने की कोशिश में है। ऐसे में आने वाले चुनाव में महिला मतदाता सत्ता के समीकरण तय करने वाला महत्वपूर्ण वर्ग बन सकती हैं।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सियासी मुकाबला धीरे-धीरे उस मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां महिला मतदाता सत्ता की चाबी तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण वर्ग बन सकती हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 60 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं के लिए रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा की घोषणा के अगले ही दिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने महिलाओं को 40 हजार रुपये सालाना देने, हर वर्ष राशि बढ़ाने और सभी महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा का वादा कर दिया। यह घटनाक्रम बताता है कि दोनों प्रमुख दल अब सीधे उस मतदाता समूह को साधने की कोशिश कर रहे हैं, जो चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
घोषणाओं के केंद्र में क्यों आईं महिलाएं?
यूपी की चुनावी राजनीति में महिलाओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है। भाजपा ने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में महिलाओं को केवल पारंपरिक सामाजिक समूह के रूप में नहीं, बल्कि अलग राजनीतिक लाभार्थी वर्ग के रूप में संबोधित किया है। उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास, शौचालय, राशन, बिजली कनेक्शन, बैंक खातों में पेंशन व अन्य योजनाओं के प्रत्यक्ष लाभ और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों के जरिए भाजपा ने महिला मतदाताओं तक अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश की है।
ऐसे में योगी सरकार की वरिष्ठ महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की घोषणा को केवल परिवहन सुविधा के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे बुजुर्ग महिलाओं को सीधे लाभ देने के साथ-साथ सरकार की महिला-केंद्रित छवि को मजबूत करने की राजनीतिक कोशिश भी दिखाई देती है।
अखिलेश यादव ने इसके जवाब में दांव और बड़ा कर दिया। 40 हजार रुपये सालाना की सीधी आर्थिक सहायता और सभी महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा का वादा उस वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश है, जो महंगाई, घरेलू खर्च और आय के संकट से प्रभावित है। यानी भाजपा जहां अपने मौजूदा कल्याणकारी मॉडल को आगे रख रही है, वहीं सपा नकद आर्थिक सहायता और व्यापक मुफ्त यात्रा के जरिए वैकल्पिक मॉडल पेश करने की कोशिश कर रही है।
योगी का पलटवार भी रणनीतिक
अखिलेश यादव की घोषणाओं पर योगी आदित्यनाथ का तत्काल पलटवार इस मुकाबले की राजनीतिक दिशा को और स्पष्ट करता है। योगी ने सपा शासनकाल में महिलाओं को दी जाने वाली कथित आर्थिक सहायता और उसमें भ्रष्टाचार के आरोपों का उल्लेख करते हुए अपनी सरकार की ओर से खातों में राशि भेजे जाने को सामने रखा। सीएम योगी ने कहा कि सपा की सरकार में महिलाओं को 300 रुपये महीने मिलते थे, उसमें से भी आधे पैसे ये अपनी जेबों में रख लेते थे।
इस जवाब में दो संदेश हैं। पहला, भाजपा यह बताना चाहती है कि महिलाओं को लाभ देने की राजनीति सपा से पहले भाजपा ने प्रभावी ढंग से लागू की है। दूसरा, भाजपा विपक्ष के किसी भी बड़े चुनावी वादे को अपने मौजूदा कल्याणकारी कार्यक्रमों की तुलना में कमजोर साबित करने की रणनीति अपना रही है।
यानी मुकाबला केवल यह नहीं है कि कौन महिलाओं को ज्यादा देगा। असली राजनीतिक सवाल यह है कि महिलाएं किस मॉडल पर भरोसा करेंगी- भाजपा का मौजूदा लाभार्थी मॉडल या सपा का नए आर्थिक वादों वाला मॉडल।
सपा के सामने बड़ी चुनौती—वादे से भरोसे तक
अखिलेश यादव के लिए यह घोषणा राजनीतिक रूप से आकर्षक जरूर है, लेकिन इसके साथ सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की होगी। चुनाव में मतदाता केवल यह नहीं देखता कि कौन कितना देने का वादा कर रहा है, बल्कि यह भी देखता है कि वादा पूरा कैसे होगा और उसके लिए धन कहां से आएगा। सपा ने पिछले विधान सभा चुनाव में भी मुफ्त योजनाओं के वादों की झड़ी लगा दी थी, लेकिन लोगों ने उन पर विश्वास नहीं किया था।
40 हजार रुपये सालाना की राशि यदि प्रदेश की बड़ी संख्या में महिलाओं तक पहुंचानी है तो राज्य के बजट पर इसका बड़ा वित्तीय प्रभाव पड़ेगा। इसलिए आने वाले महीनों में भाजपा स्वाभाविक रूप से इन घोषणाओं की आर्थिक व्यवहार्यता को मुद्दा बनाएगी। सपा को जवाब देना होगा कि इस योजना का दायरा क्या होगा, पात्रता क्या होगी और इसके लिए वित्तीय संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे।
भाजपा के लिए भी चुनौती आसान नहीं
दूसरी तरफ भाजपा यह मानकर नहीं चल सकती कि सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना अपने आप वोट में बदल जाएगा। लाभार्थी और मतदाता के बीच अब सीधा संबंध पहले की तुलना में अधिक राजनीतिक हो चुका है। विपक्ष यदि यह धारणा बनाने में सफल होता है कि सरकार की योजनाओं का लाभ सीमित है या महंगाई के मुकाबले पर्याप्त नहीं है, तो भाजपा के लिए चुनौती बढ़ सकती है।
यही कारण है कि योगी सरकार की ओर से नई घोषणाएं और उपलब्धियों का प्रचार चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भाजपा संभवतः कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा, धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों और कल्याणकारी योजनाओं को एक साथ जोड़कर अपना चुनावी आख्यान तैयार करेगी।
महिला वोट का गणित किसके पक्ष में जाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि भाजपा और सपा दोनों महिला मतदाताओं को अब अलग राजनीतिक शक्ति के रूप में देख रहे हैं। भाजपा के पास महिला लाभार्थियों का संगठित आधार बनाने का अनुभव और सरकार की योजनाओं का रिकॉर्ड है, जबकि सपा के पास आर्थिक सहायता के बड़े वादे के जरिए महिला मतदाताओं के नए वर्ग को जोड़ने का प्रयास है।
कांग्रेस भी महिला मतदाताओं को लेकर अपनी अलग राजनीतिक रणनीति रखती है और बसपा का अपना सामाजिक आधार है। आजाद समाज पार्टी और एआईएमआईएम जैसे दल भले ही सत्ता की सीधी लड़ाई में भाजपा और सपा के बराबर न हों, लेकिन कई क्षेत्रों में उनका प्रदर्शन वोटों के बंटवारे और सीटों के समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
असल लड़ाई अब घोषणाओं की कीमत से ज्यादा भरोसे की
यूपी की राजनीति में चुनावी वादों की यह होड़ आने वाले महीनों में और तेज होने की संभावना है। भाजपा के पास सत्ता, संगठन और योजनाओं का रिकॉर्ड है, जबकि सपा के सामने सत्ता विरोधी भावना को अपने पक्ष में बदलने और नए सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की चुनौती है।
महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा और आर्थिक सहायता की घोषणाएं इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे सीधे परिवार की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों से जुड़ी हैं। लेकिन चुनाव में निर्णायक बात यह होगी कि महिला मतदाता इसे महज चुनावी घोषणा मानती हैं या अपने जीवन में वास्तविक बदलाव की संभावना के रूप में देखती हैं।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन घोषणाओं से किस दल को कितना लाभ मिलेगा। मगर एक बात लगभग साफ है कि यूपी का अगला चुनाव केवल जातीय समीकरणों, हिंदुत्व, कानून-व्यवस्था या विकास के मुद्दों पर नहीं लड़ा जाएगा। महिला मतदाता इस चुनावी मुकाबले के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक रणक्षेत्रों में से एक बनने जा रही हैं।
और योगी-अखिलेश के बीच शुरू हुआ यह ‘महिला कल्याण बनाम महिला आर्थिक वादा’ का मुकाबला आने वाले चुनावी अभियान की दिशा तय करने वाले प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकता है।