जेल से निकले तो बदली जिंदगी, शाहजहांपुर में 100 बंदियों ने प्रशिक्षण से खड़ा किया अपना रोजगार
शाहजहांपुर जिला कारागार में बंदियों को दिया जा रहा सिलाई, गमले बनाने, पेंटिंग और रंगाई-पुताई का प्रशिक्षण रिहाई के बाद उनकी आजीविका का आधार बन रहा है। करीब 100 रिहा बंदी प्रशिक्षण के सहारे अपना व्यवसाय शुरू कर परिवार चला रहे हैं। जेल में बनी पेंटिंग लोक अदालतों में प्रदर्शित और बिक्री की जाती हैं, जबकि काउंसलिंग और आध्यात्मिक गतिविधियों के जरिए बंदियों को अपराध से दूर कर सुधार की दिशा में ले जाने का प्रयास किया जा रहा है।
-राजीव शर्मा-
शाहजहांपुर। जिला कारागार में सजा काटने के दौरान मिला सिलाई, गमले बनाने, पेंटिंग और रंगाई-पुताई का प्रशिक्षण कई बंदियों के लिए जेल से बाहर निकलने के बाद नई जिंदगी की शुरुआत का आधार बन गया है। शाहजहांपुर कारागार से प्रशिक्षण लेकर रिहा हुए करीब 100 बंदी अब अपना-अपना व्यवसाय शुरू कर परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। कारागार प्रशासन की इस पहल का उद्देश्य बंदियों को केवल सजा देना नहीं, बल्कि उन्हें हुनर देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना और दोबारा अपराध की ओर जाने से रोकना है।
शाहजहांपुर जेल के अधीक्षक जितेंद्र प्रताप तिवारी ने बताया कि कारागार में बंदियों को सिलाई, गमले बनाने, पेंटिंग तथा रंगाई-पुताई जैसे विभिन्न कार्यों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले कम से कम 100 बंदियों ने जेल से रिहा होने के बाद इन्हीं हुनरों को अपनी आजीविका का साधन बना लिया है।
पेंटिंग बनी सामाजिक संदेश का माध्यम
कारागार में बंदियों द्वारा तैयार की जाने वाली आकर्षक पेंटिंग को केवल रोजगार से नहीं जोड़ा गया है, बल्कि इन्हें सामाजिक जागरूकता का माध्यम भी बनाया जा रहा है। जिले में आयोजित विभिन्न लोक अदालतों में इन पेंटिंग के स्टॉल लगाए जाते हैं। इन कलाकृतियों को जज और अधिवक्ता पसंद करने के साथ खरीदते भी हैं।
जेल अधीक्षक के मुताबिक इन पेंटिंग में अक्सर ज्वलंत सामाजिक मुद्दों, सामाजिक व्यवस्था और विभिन्न कुरीतियों को चित्रित किया जाता है। इनके माध्यम से बंदियों की कला को सामने लाने के साथ समाज को सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया जाता है।
जेल में सीखा हुनर, बाहर बना रोजगार का सहारा
फतेहगढ़ निवासी रिहा बंदी राजीव कुमार ने बताया कि उसने जेल में गमले बनाने का प्रशिक्षण लिया था। रिहाई के बाद इसी प्रशिक्षण की मदद से उसने अपना रोजगार शुरू किया और अब इससे अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहा है।
इसी तरह सिधौली निवासी पूर्व बंदी रामनिवास ने जेल में रहने के दौरान सिलाई का काम सीखा। उसका कहना है कि उसके लिए जेल यातनागृह के बजाय रिहाई के बाद नई जिंदगी शुरू करने का माध्यम बनी।
जेल अधीक्षक ने बताया कि हाल ही में कई रिहा कैदी उनसे मिलने पहुंचे थे। उन्होंने जेल में मिले प्रशिक्षण के लिए कारागार प्रशासन का आभार जताया और बताया कि इसी हुनर की मदद से वे अपना रोजगार शुरू कर चुके हैं।
यातनागृह नहीं, सुधार गृह बनाने पर जोर
जेल अधीक्षक जितेंद्र प्रताप तिवारी ने कहा कि कारागार को यातनागृह के बजाय सुधार गृह में परिवर्तित करना उनका उद्देश्य है। उनके मुताबिक जेल में बड़ी संख्या में ऐसे बंदी आते हैं जिनके भीतर बदले की भावना होती है। ऐसे बंदियों की मानसिक स्थिति में सुधार के लिए काउंसलिंग की व्यवस्था की गई है।
उन्होंने बताया कि बंदियों की काउंसलिंग के लिए मनोचिकित्सक की व्यवस्था की गई है। मनोचिकित्सक बंदियों की काउंसलिंग करने के साथ पढ़ने में सक्षम बंदियों को उनके धर्म के अनुरूप साहित्य भी उपलब्ध कराते हैं। इसका उद्देश्य उनके भीतर की नकारात्मकता और बदले की भावना को कम करना तथा उनकी मनोदशा में सकारात्मक बदलाव लाना है।
रुद्राभिषेक के बाद सैकड़ों बंदियों ने ली अपराध न करने की शपथ
जेल प्रशासन की ओर से आध्यात्मिक गतिविधियों को भी सुधार प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है। तिवारी ने बताया कि पिछले सोमवार को जेल में हिंदू बंदियों के लिए रुद्राभिषेक का आयोजन किया गया। इसके साथ एक कथा वाचक ने कथा का श्रवण भी कराया। आयोजन के बाद सैकड़ों बंदियों ने अपराध न करने की स्वयं शपथ ली।
उन्होंने कहा कि कारागार के भीतर धर्म आदि का भेदभाव नहीं रहता। बंदी एक-दूसरे के त्योहारों में सहयोग करते हैं और मिल-जुलकर पर्व मनाते हैं। इस तरह कारागार में अनुशासन के साथ सकारात्मक वातावरण तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है।
कारागार प्रशासन की यह पहल इस सोच को सामने रखती है कि सजा पूरी होने के बाद बंदियों के सामने यदि सम्मानजनक रोजगार और समाज में लौटने का रास्ता उपलब्ध हो, तो उनके दोबारा अपराध की ओर जाने की आशंका को कम किया जा सकता है। शाहजहांपुर जेल से रिहा करीब 100 बंदियों का प्रशिक्षण के बाद स्वरोजगार से जुड़ना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में सामने आया है।