पटना में छात्रों का आंदोलन: बीपीएससी की 70वीं परीक्षा रद्द करने से टीआरई-4 की एकल परीक्षा तक के मुद्दे, बैरिकेड तोड़कर राजभवन की ओर बढ़े छात्र
पटना। बिहार की राजधानी पटना में प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षक भर्ती से जुड़े मुद्दों को लेकर छात्र आंदोलन मंगलवार को और उग्र हो गया। गांधी मैदान से राजभवन की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारी छात्रों ने पुलिस के बैरिकेड तोड़ दिए और प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर आगे बढ़ने की कोशिश की। दूसरी ओर गर्दनीबाग में पिछले कई दिनों से चल रहे छात्र-युवा आंदोलन में बीपीएसी टीआरई -4 (शिक्षक भर्ती परीक्षा) को दो चरणों के बजाय एकल परीक्षा कराने, नेगेटिव मार्किंग हटाने और 70वीं बीपीएसी परीक्षा को रद्द करने समेत कई मांगें उठाई जा रही हैं। आंदोलन में विभिन्न छात्र एवं युवा संगठनों के साथ राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठन भी सक्रिय हैं।
आज के घटनाक्रम में प्रदर्शनकारियों का एक मार्च मुख्यमंत्री आवास के बजाय गांधी मैदान से राजभवन की ओर बढ़ा और इसी दौरान बैरिकेड तोड़े गए। वहीं गर्दनीबाग में आंदोलनरत छात्र संगठनों ने मुख्यमंत्री आवास मार्च का आह्वान किया था।
कैसे शुरू हुआ आंदोलन
पटना के गर्दनीबाग में छात्र-युवा संगठनों का धरना पिछले दिनों शुरू हुआ था। शुरुआत में आंदोलन का प्रमुख केंद्र बीपीएसी टीआरई-4 विज्ञापन जारी करना और भर्ती प्रक्रिया शुरू करना था। छात्रों के लगातार दबाव और धरने के बीच बीपीएसी ने टीआरई-4 के तहत 32,388 शिक्षक पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी कर दिया और आवेदन प्रक्रिया 1 सितंबर से शुरू होने की घोषणा की। लेकिन विज्ञापन जारी होने के बाद आंदोलन खत्म होने के बजाय उसका दायरा और बढ़ गया।
छात्रों की सबसे बड़ी आपत्ति अब परीक्षा के नए दो-स्तरीय प्रारूप को लेकर है। बीपीएसी ने टीआरई-4 के लिए प्रारंभिक परीक्षा यानी (PT) और उसके बाद मेन्स कराने की व्यवस्था बताई है। इसके साथ नेगेटिव मार्किंग भी लागू करने की बात कही गई है। प्रदर्शनकारी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
दो स्तरीय परीक्षा से छात्रों को क्या आपत्ति है?
छात्र नेताओं का तर्क है कि टीआरई की पिछली तीन चरणों की भर्ती परीक्षाएं एकल परीक्षा प्रणाली के आधार पर होती रही हैं। अब टीआरई-4 में पहली बार प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा की दो-स्तरीय व्यवस्था लागू किए जाने से अभ्यर्थियों पर परीक्षा का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और भर्ती प्रक्रिया लंबी हो सकती है। इसी कारण उनकी मांग है कि टीआरई-4 को भी पहले की तरह एक ही परीक्षा के आधार पर कराया जाए।
प्रदर्शनकारियों का दूसरा बड़ा विरोध नेगेटिव मार्किंग को लेकर है। उनका कहना है कि शिक्षक भर्ती परीक्षा में इसे लागू करने से अभ्यर्थियों पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा और परीक्षा का स्वरूप बदल जाएगा। इसलिए वे नेगेटिव मार्किंग पूरी तरह हटाने की मांग कर रहे हैं। बीपीएसी की ओर से फिलहाल परीक्षा प्रारूप बदलने की सहमति नहीं दी गई है और आयोग ने प्रारंभिक और मेन्स तथा नेगेटिव मार्किंग को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है।
100 प्रतिशत डोमिसाइल नीति भी प्रमुख मुद्दा
आंदोलन की एक प्रमुख मांग बिहार के अभ्यर्थियों को सरकारी शिक्षक भर्ती में प्राथमिकता देने से जुड़ी है। छात्र संगठन 100 प्रतिशत डोमिसाइल नीति की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि बिहार की सरकारी नौकरियों, खासकर शिक्षक भर्ती में राज्य के युवाओं को पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। डोमिसाइल को लेकर यह मांग पहले भी बिहार में छात्र आंदोलनों का प्रमुख मुद्दा रही है।
70वीं बीपीएसी परीक्षा रद्द करने की मांग ने आंदोलन को और व्यापक बनाया
आंदोलन का दूसरा बड़ा मोर्चा 70वीं BPSC संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा को लेकर है। प्रदर्शनकारी इस परीक्षा को रद्द कर दोबारा कराने की मांग कर रहे हैं। छात्रों ने परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक से जुड़े आरोपों को लेकर सवाल उठाए हैं। इसी मांग को लेकर मंगलवार को गांधी मैदान से राजभवन की ओर मार्च निकाला गया और प्रदर्शनकारियों ने रास्ते में पुलिस बैरिकेड तोड़ दिए।
70वीं बीपीएसी परीक्षा का मामला पहले से ही विवादों में रहा है। परीक्षा से जुड़ी शिकायतों और दोबारा परीक्षा कराने की मांग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन चला था। हालांकि बीपीएसी ने बाद में परीक्षा प्रक्रिया पूरी की और 70वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा का अंतिम परिणाम भी जारी किया। इसके बावजूद आंदोलनकारी अब भी परीक्षा रद्द करने की मांग पर कायम हैं।
सिर्फ टीआरई-4 नहीं, दूसरी भर्तियां भी आंदोलन के एजेंडे में
छात्र संगठनों की मांगों का दायरा अब कई भर्ती परीक्षाओं तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारी लाइब्रेरियन भर्ती, दारोगा समेत अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और समय पर परीक्षा कराने की मांग उठा रहे हैं। इसके अलावा कथित रूप से अनुचित तरीके से सरकारी नौकरी हासिल करने वाले अभ्यर्थियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी आंदोलन का हिस्सा है।
आंदोलन में संगीत, ललित कला, नृत्य और कंप्यूटर साइंस जैसे विषयों में सीटें बढ़ाने की मांग भी सामने आई है। छात्र संगठनों का कहना है कि इन विषयों में उपलब्ध सीटें जरूरत के मुकाबले कम हैं।
परीक्षा में पारदर्शिता की मांग
छात्र संगठन परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने पर भी जोर दे रहे हैं। उनकी मांगों में परीक्षा समाप्त होने के बाद अभ्यर्थियों को उनकी ओएमआर शीट की कार्बन कॉपी, आधिकारिक उत्तर कुंजी सार्वजनिक करने और कटऑफ की जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराने जैसी मांगें शामिल हैं। इसके पीछे छात्रों का तर्क है कि परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ने से विवाद और संदेह कम होंगे।
आंदोलन में ‘वन कैंडिडेट, वन रिजल्ट’ जैसी मांग भी सामने आई है। इसके तहत छात्रों का कहना है कि शिक्षक भर्ती जैसी बड़ी प्रक्रियाओं में एक अभ्यर्थी का कई श्रेणियों या विषयों में चयन होने के कारण कुछ सीटें खाली रह सकती हैं। इसलिए अंतिम आवंटन व्यवस्था को इस तरह बनाया जाए कि एक अभ्यर्थी को एक ही अंतिम पद मिले और खाली सीटों का लाभ दूसरे योग्य अभ्यर्थियों को मिल सके।
भर्ती प्रक्रिया समय पर कराने और पेपर लीक रोकने की मांग
छात्रों का गुस्सा केवल परीक्षा पैटर्न तक सीमित नहीं है। वे भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक और कथित अनियमितताओं पर भी सरकार और आयोग से जवाब मांग रहे हैं। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने भी आंदोलन का समर्थन करते हुए पेपर लीक रोकने, परीक्षाएं समय पर कराने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और भर्ती एवं परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांगों का समर्थन किया है।
बीपीएसी अधिकारी की टिप्पणी से भी भड़का आक्रोश
आंदोलन के बीच बीपीएससी के परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार सिंह की एक टिप्पणी ने विवाद को और बढ़ा दिया। छात्रों से जुड़े सवाल पर उन्होंने ‘हाथी चले बाजार, कुत्ता भौंके हजार’ वाली कहावत का इस्तेमाल किया, जिस पर प्रदर्शनकारी भड़क गए और इसे छात्रों का अपमान बताया। इसके बाद अधिकारी ने माफी मांगी और सरकार की ओर से उनके निलंबन की कार्रवाई भी सामने आई। इसके बावजूद छात्रों का आंदोलन जारी है।
सरकार और आयोग के सामने अब बड़ी चुनौती
बिहार में छात्र आंदोलन अब एक परीक्षा या एक भर्ती तक सीमित नहीं रह गया है। सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि सरकार और बीपीएसी टीआरई-4 के परीक्षा प्रारूप और 70वीं बीपीएसी को लेकर छात्रों की मांगों पर कितना पीछे हटते हैं। फिलहाल आयोग ने दो-स्तरीय परीक्षा और नेगेटिव मार्किंग के फैसले में बदलाव के संकेत नहीं दिए हैं, जबकि आंदोलनकारी छात्र इन दोनों मुद्दों पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं।