यूजीसी रेगुलेशन से आरक्षण सुधार आंदोलन तक : अपने ही बुने जाल में फंस गई मोदी सरकार

सत्येंद्र सिंह

Aug 25, 2026 - 14:51
Aug 25, 2026 - 22:54
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यूजीसी रेगुलेशन से आरक्षण सुधार आंदोलन तक : अपने ही बुने जाल में फंस गई मोदी सरकार

यूजीसी रेगुलेशन वापसी से शुरू हुई कथित अगड़ी जातियों की लड़ाई आरक्षण व्यवस्था में सुधार तक पहुंच गई है। अभी तक यह समझ में नहीं आया कि मोदी सरकार ने विवादास्पद यूजीसी रेगुलेशन लाया क्यों?


हिंदुत्ववादी राजनीति का तकाजा था कि जातिगत दरार को पाटा जाए, लेकिन यह रेगुलेशन अगर लागू हुआ तो इस लिहाज से हिंदू समाज की एकजुटता की कोशिश को भारी झटका पहुंचेगा, जिसकी अपेक्षा हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी की सरकार से उसके समर्थक नहीं कर रहे थे। इसी तरह हिंदुत्व में विश्वास करने वाले किसी व्यक्ति को सामाजिक समानता से परहेज भी नहीं होना चाहिए, लेकिन अगर सामाजिक समानता लाने की कवायद में किसी समुदाय को दोयम दर्जे की स्थिति में धकेल दिया जाए, तो उसे भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार करने की बात कर एक तरह से अपने रुख में बदलाव का संकेत दे दिया है, लेकिन मोदी सरकार की कार्य-शैली के कारण अगड़ी जातियों के लिए उस पर भरोसा करना अब कठिन हो गया है। इसलिए कोर्ट में सरकार के भावी रुख का इंतजार रहेगा। यह प्रश्न अब भी बरकरार है कि यह सब कैसे और क्यों हुआ? इन प्रश्नों का उत्तर शायद कभी न मिले, लेकिन इस बात की उत्सुकता हमेशा रहेगी कि क्या यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जानकारी के बिना ही हुआ।

तमाम सैद्धांतिक प्रतिबद्धताओं के बावजूद एक राष्ट्र और समाज के जीवन में व्यावहारिक धरातल पर भेदभाव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर सरकार द्वारा किया गया प्रावधान ही समाज के एक हिस्से को भेदभावकारी लगने लगे तो उससे गंभीर चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। ऐसी सरकार जनता की नजरों में शासन की नैतिक सत्ता खो देती है। मोदी सरकार के लिए यह कदम राजनीतिक दृष्टि से भी भारी पड़ सकता है।

पता नहीं सरकार क्या चाहती है, लेकिन फिलहाल तो यही लगता है कि मामले को जल्द रफा-दफा करने में ही उसका भला है, अन्यथा यह मामला लंबा खींचा तो इसमें ऐसे नए-नए आयाम जुड़ते चले जाएंगे जो सरकार के लिए भारी मुश्किल खड़ी कर देंगे। अगड़ी जातियों द्वारा आरक्षण में सुधार का मामला उठाया जाना इसी कड़ी का हिस्सा है, जिससे निपटने में केंद्र सरकार की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता सवालों के घेरे में आ गई है।

भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक मर्यादा के तहत विरोध प्रदर्शन करने और सभा-सम्मेलन करने का अधिकार प्रत्येक नागरिक के पास है। ऐसे में जब सरकार इस पर रोक लगाने या दबाने की कोशिश करती है तो पारदर्शिता का तकाजा है कि उसे स्पष्ट रूप से देश को तथ्यों के साथ इसके कारण बताने चाहिए। यानी क्या इस आंदोलन से कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होने का खतरा है? क्या आतंकी इसमें घुसकर किसी वारदात को अंजाम देना चाहते हैं?

अगर इसके पुख्ता सबूत हैं तो सरकार द्वारा ऐसे प्रदर्शनों पर रोक लगाना जायज माना जा सकता है, लेकिन इसके अभाव में प्रदर्शन को रोकना लोकतांत्रिक कदम नहीं माना जा सकता, बल्कि यही कहा जायेगा कि सरकार का कदम मनमाना और अलोकतांत्रिक है। यह उस समय और पीड़ादायक हो जाती है, जब आंदोलनकारी इस बात पर ध्यान देते हैं कि इसके कुछ समय पहले काकरोच जनता पार्टी को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी।

पहली नजर में यही कहा जायेगा कि सरकार दोहरा मापदंड अपना रही है। इस तर्कशास्त्र के मुताबिक जब काकरोच जनता पार्टी को प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी, तो अगड़ी जातियों को भी अनुमति मिलनी चाहिए थी। अगर काकरोच जनता पार्टी को अनुमति देना प्रशासनिक चूक थी, तो ऐसा क्यों हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार है? अगर काकरोच जनता पार्टी भविष्य में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहे तो क्या सरकार उसे अनुमति देगी या नहीं?

तब सरकार के लिए धर्मसंकट की स्थिति होगी, खासकर उस समय जब दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम होने वाले हों। बहरहाल, यह सवाल उठना लाजिमी है कि आरक्षण में सुधार के लिए सड़क पर उतरे अगड़ी जातियों के प्रदर्शन के प्रति सरकार की मंशा क्या है? क्या वह अगड़ी जातियों के आंदोलन को दबाना चाहती है या उन्हें उकसाकर आरक्षण व्यवस्था में सुधार के लिए सामाजिक आधार तैयार करना चाहती है? फिर लोक चर्चा के मुताबिक यह सवाल भी हवा में तैरने लगा है कि यह भाजपा के किसी सत्ता-संघर्ष का नतीजा तो नहीं है? अभी इन सवालों का उत्तर मिलना कठिन है, राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इन पर रहेगी।

पर्दे के पीछे क्या चल रहा है, यह तो पता नहीं, लेकिन जो कुछ सामने है उससे साफ है कि भाजपा अपने बुने जाल में फंस चुकी है। न विवादास्पद यूजीसी रेगुलेशन आता और न आरक्षण में सुधार तक बात आती। अब स्थिति यह है कि भाजपा का कोर वोटर ही उसकी सरकार के खिलाफ सड़क पर है। अगर सरकार इसे हल्के में लेने या संवेदनहीन तरीके से निपटने की कोशिश करती है तो उसके गंभीर राजनीतिक परिणाम होंगे, (बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा इसकी झलक देख चुकी है) जिसकी गूंज-अनुगूंज 2027 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सुनाई पड़े या न पड़े, 2029 के लोक सभा में सुनाई पड़ सकती है।

कारण यह है कि दिल्ली में आंदोलनकारियों के साथ जो कुछ घटित हो रहा है, उस पर पूरे भारत की अगड़ी जातियों की नजर है- शहर से लेकर गांव तक। इन अगड़ी जातियों के विरोध और आक्रोश का अंदाजा न तो विरोध प्रदर्शन से लगाया जा सकता है और न ही सोशल मीडिया से। मुख्यधारा की मीडिया में इन खबरों को हाशिए पर डालने के बावजूद व्यक्तिगत स्तर पर बात रिस- रिसकर समाज के निचले पायदान तक पहुंचने लगी है, जो संचार का धीमा ही सही लेकिन प्रभावी माध्यम होता है। कोई आश्चर्य नहीं कि ये जातियां प्रतिक्रिया स्वरूप अपने तमाम आग्रहों को छोड़कर भाजपा को सबक सिखाने के लिए कोई नया सामाजिक गठबंधन न बना लें। बिहार में इसकी सुगबुगाहट भी होने लगी है।