भारत-श्रीलंका के सांस्कृतिक रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती, कोलंबो में साझा विरासत पर मंथन

कोलंबो स्थित स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र में डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा, भारतीय दूतावास और श्रीलंका हिंदी मित्र मंडल के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारत एवं श्रीलंका : सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। कुलपति प्रो. आशु रानी ने विश्वविद्यालय की 1500 से 2000 पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और पाली भाषा के अध्ययन के लिए श्रीलंका के बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय के साथ सहयोग की जानकारी दी। वक्ताओं ने बौद्ध दर्शन, हिंदी साहित्य, सांस्कृतिक विरासत और दोनों देशों के शैक्षणिक संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया।

Oct 15, 2026 - 17:45
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भारत-श्रीलंका के सांस्कृतिक रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती, कोलंबो में साझा विरासत पर मंथन
श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के मंच पर मौजूद डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी व अन्य।

डॉ. आंबेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी ने पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और पाली भाषा के अध्ययन पर दिया जोर, हिंदी साहित्य और बौद्ध दर्शन के संरक्षण पर हुई चर्चा

कोलंबो/आगरा। भारत और श्रीलंका के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक, धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंधों को नई मजबूती देने तथा दोनों देशों की साझा ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र, भारतीय दूतावास, श्रीलंका; डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा और श्रीलंका हिंदी मित्र मंडल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी का विषय ‘भारत एवं श्रीलंका : सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य’ रहा।

संगोष्ठी में शिक्षाविदों, साहित्यकारों, शोधकर्ताओं और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने दोनों देशों की साझा विरासत, बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता, पाली भाषा के अध्ययन, हिंदी साहित्य के विकास और लोकपरंपराओं के संरक्षण पर विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि भारत और श्रीलंका के संबंध केवल भौगोलिक निकटता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साझा इतिहास, धार्मिक आस्थाओं, साहित्य और ज्ञान परंपराओं ने दोनों देशों को लंबे समय से एक-दूसरे से जोड़ रखा है।

दीप प्रज्वलन के साथ हुआ शुभारंभ, शिक्षाविदों ने रखे विचार

कार्यक्रम का शुभारंभ भारतीय परंपरा के अनुरूप अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। भारतीय दूतावास, कोलंबो के प्रथम सचिव (ईएंडसी) सौरभ सभलोक मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी ने विशिष्ट अतिथि के रूप में सहभागिता की। पद्मश्री प्रो. उषा यादव तथा केलणिय विश्वविद्यालय, श्रीलंका के पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. लक्ष्मण सेनेविरत्न अतिथि वक्ता के रूप में शामिल हुए। संगोष्ठी के संयोजक एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के केएमआई निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर, बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय, श्रीलंका की प्रवक्ता डॉ. निरोषा सल्वतुर और स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र की शिक्षिका एवं श्रीलंका संयोजक अतिला कोतलावल ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मां सरस्वती की वंदना प्रो. शंपा चौधरी और प्रो. जया शर्मा ने प्रस्तुत की। इसके बाद प्रो. प्रदीप श्रीधर ने विषय प्रवर्तन करते हुए भारत और श्रीलंका के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन दोनों देशों के शिक्षाविदों, साहित्यकारों और शोधकर्ताओं को एक मंच पर लाकर ज्ञान, अनुभव और शोध कार्यों के आदान-प्रदान का अवसर प्रदान करते हैं।

भारत-श्रीलंका के संबंधों को बताया सभ्यतागत साझेदारी

मुख्य अतिथि सौरभ सभलोक ने अपने संबोधन में भारत और श्रीलंका को जुड़वां सभ्यताएं बताते हुए कहा कि दोनों देशों के संबंध वर्तमान में उच्च स्तर पर हैं। उन्होंने कहा कि आर्थिक संकट या प्राकृतिक आपदा जैसी कठिन परिस्थितियों में भारत ने श्रीलंका की सहायता के लिए आगे बढ़कर सहयोग किया है। उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत और श्रीलंका के बीच मुक्त व्यापार समझौता आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत के लिए श्रीलंका एक महत्वपूर्ण निर्यात बाजार भी है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में बढ़ता सहयोग दोनों देशों के संबंधों को और अधिक मजबूत बनाएगा। संगोष्ठी में इस बात पर भी जोर दिया गया कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान, शैक्षणिक सहयोग और भाषाई संपर्क के माध्यम से दोनों देशों के नागरिकों के बीच आपसी समझ को और व्यापक बनाया जा सकता है।

1500 से 2000 पांडुलिपियों के संरक्षण पर काम कर रहा आंबेडकर विश्वविद्यालय

विशिष्ट अतिथि एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी ने विश्वविद्यालय में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों और उनके संरक्षण के प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में लगभग 1500 से 2000 पांडुलिपियां उपलब्ध हैं, जिनमें पाली भाषा की पांडुलिपियों की संख्या उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा कि इन पांडुलिपियों को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित करने के लिए ज्ञान भारतम एप के माध्यम से अपलोड करने का कार्य किया जा रहा है। इससे प्राचीन ज्ञान-संपदा को सुरक्षित रखने के साथ-साथ शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए उसका अध्ययन भी आसान होगा।

प्रो. आशु रानी ने बताया कि पाली भाषा की पांडुलिपियों को पढ़ने और उनके अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए श्रीलंका के बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय के साथ समझौता किया गया है। उन्होंने हिंदी और सिंहली भाषा से जुड़े अध्ययन तथा शोध को आगे बढ़ाने के लिए संस्थागत सहयोग विकसित करने की संभावना भी व्यक्त की। उनके अनुसार, भारत और श्रीलंका के विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षणिक साझेदारी से प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन, पांडुलिपियों के संरक्षण और साझा सांस्कृतिक विरासत को समझने के नए अवसर खुलेंगे।

साहित्य और लोकपरंपराएं दोनों देशों को जोड़ने का सशक्त माध्यम

पद्मश्री प्रो. उषा यादव ने अपने उद्बोधन में साहित्य और संस्कृति को समाज को जोड़ने का सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि भारत और श्रीलंका की लोकपरंपराओं, धार्मिक मान्यताओं, कथाओं और जीवन मूल्यों में अनेक समानताएं दिखाई देती हैं। इन समानताओं को साहित्य, शोध और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से सामने लाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल किसी समाज की भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त नहीं करता, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद और पारस्परिक समझ विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन नई पीढ़ी को अपने इतिहास और परंपराओं से जोड़ने में सहायक हो सकता है।

श्रीलंका के नौ विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही हिंदी

केलणिय विश्वविद्यालय, श्रीलंका के पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ प्रोफेसर लक्ष्मण सेनेविरत्न ने भारत और श्रीलंका के बीच बौद्ध धर्म तथा प्राचीन ज्ञान परंपराओं के ऐतिहासिक संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने इन संबंधों की जड़ों को प्राचीन भारतीय परंपराओं से जोड़ते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संपर्क का इतिहास अत्यंत पुराना है। उन्होंने बताया कि श्रीलंका में लगभग 80 वर्षों से हिंदी की पढ़ाई हो रही है। देश के 17 विश्वविद्यालयों में से नौ विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले वर्ष से श्रीलंकाई हिंदी साहित्य को विकसित करने की दिशा में विशेष प्रयास शुरू किए गए हैं।

प्रो. सेनेविरत्न ने कहा कि हिंदी के अध्ययन और लेखन को प्रोत्साहन देने से दोनों देशों के साहित्यिक संबंधों को नई दिशा मिल सकती है। श्रीलंका में हिंदी साहित्य के विकास से वहां की सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभूतियों को हिंदी भाषा के माध्यम से व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने का अवसर मिलेगा।

तकनीकी सत्र में बौद्ध दर्शन, नारी जीवन और संगीत परंपराओं पर चर्चा

संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में भारत और श्रीलंका के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों के विभिन्न आयामों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। सत्र की अध्यक्षता सबरागामुवा विश्वविद्यालय, श्रीलंका के हिंदी विभाग की प्रो. संगीत रत्नायक ने की, जबकि संचालन श्री कृष्ण ने किया। इस दौरान बौद्ध दर्शन, नारी जीवन, संगीत परंपराओं, भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों पर अकादमिक विचार-विमर्श हुआ। शोधपत्रों के माध्यम से दोनों देशों की परंपराओं में मौजूद समानताओं, उनके ऐतिहासिक विकास और समकालीन समाज में उनकी प्रासंगिकता को समझने का प्रयास किया गया।

तकनीकी सत्र में राजकीय महाविद्यालय, आगरा कैंट की प्राचार्य एवं हिंदी विभाग की प्रो. मनीषा, बीडी जैन कन्या महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष प्रो. मीरा अग्रवाल, इतिहास विभाग की सेवानिवृत्त अध्यक्ष डॉ. मधु वशिष्ठ, आर्य कन्या पीजी कॉलेज, हापुड़ की संगीत विभाग की प्रो. जया शर्मा, बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय, श्रीलंका के भाषा निपुणता संवर्धन विभाग की डॉ. सरसी राणसिंह तथा होमागम महिन्द राजपक्ष विद्यालय की हिंदी शिक्षिका निमेषा संदीपनी दयावंश ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। शोधपत्रों और अकादमिक चर्चाओं के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि भाषा, साहित्य, संगीत और दर्शन के क्षेत्र में संयुक्त अध्ययन से दोनों देशों की साझा विरासत को अधिक व्यवस्थित रूप में समझा और संरक्षित किया जा सकता है।

कथक नृत्य और काव्य प्रस्तुति ने बांधा समां

संगोष्ठी में अकादमिक चर्चा के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भी भारत-श्रीलंका की मैत्री को भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी। तिलिनि लियनगे ने ‘कथा सोलह शृंगार’ विषय पर कथक नृत्य प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा की सुंदरता को मंच पर साकार किया। नूतन अग्रवाल ने ‘एक किनारे भारत, जिसके दूजे लंका की सीमा…’ पंक्तियों के माध्यम से दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया। इस दौरान हिंदी साहित्यकार कामना सिंह की पुस्तक ‘शिव शक्ति’ का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में भारतीय प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि सौरभ सभलोक के कर-कमलों से सम्मान पत्र वितरित किए गए। डॉ. निरोषा सल्वतुर और अतिला कोतलावल ने आभार व्यक्त किया। समापन अवसर पर स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र की हिंदी शिक्षिका एवं श्रीलंका हिंदी मित्र मंडल की सचिव अमानी विक्रमारच्ची ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार प्रकट किया।

साझा विरासत को शोध और संवाद से आगे बढ़ाने का संदेश

कोलंबो में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने भारत और श्रीलंका के संबंधों को केवल ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से देखने के बजाय शिक्षा, भाषा, साहित्य, पांडुलिपि संरक्षण और सांस्कृतिक संवाद के व्यापक संदर्भ में समझने का अवसर प्रदान किया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाकर दोनों देशों की प्राचीन ज्ञान परंपराओं को संरक्षित किया जा सकता है। संगोष्ठी का प्रमुख संदेश रहा कि भारत और श्रीलंका की साझा विरासत दोनों देशों की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे शोध, साहित्य, शिक्षा और नई पीढ़ी की भागीदारी के माध्यम से आगे बढ़ाना भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत बनाने में सहायक होगा।