आजम खां के सियासी भविष्य पर जौहर यूनिवर्सिटी का साया, ध्वस्तीकरण से लेकर ईडी की जांच तक बढ़ती मुश्किलें, 2027 के चुनाव में उतरने की राह भी कानूनी अड़चनों से घिरी

आजम खां के लिए जौहर यूनिवर्सिटी अब केवल उनके सपने की पहचान नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक और कानूनी भविष्य से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुकी है। यह भी सच्चाई है कि उनका यही सपना उनकी राजनीति के लिए ग्रहण बन चुका है।

Oct 14, 2026 - 05:34
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आजम खां के सियासी भविष्य पर जौहर यूनिवर्सिटी का साया, ध्वस्तीकरण से लेकर ईडी की जांच तक बढ़ती मुश्किलें, 2027 के चुनाव में उतरने की राह भी कानूनी अड़चनों से घिरी

लखनऊ। कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम चेहरों में गिने जाने वाले आजम खां के सामने अब अपनी राजनीतिक जमीन और महत्वाकांक्षी शैक्षणिक परियोजना को बचाए रखने की चुनौती है। रामपुर में मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर चल रहे कानूनी और प्रशासनिक विवादों के बीच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच ने नया मोर्चा खोल दिया है। 13 अक्टूबर को ईडी ने रामपुर जेल में आजम खां से करीब आठ घंटे तक पूछताछ की। जांच का केंद्र जौहर ट्रस्ट और यूनिवर्सिटी को मिले करोड़ों रुपये के चंदे का स्रोत, संबंधित संस्थाओं के बीच वित्तीय लेन-देन और निर्माण कार्यों में रकम के इस्तेमाल से जुड़े सवाल हैं।

दूसरी ओर, यूनिवर्सिटी के 38 भवनों के ध्वस्तीकरण का आदेश पहले ही जारी हो चुका है, जिस पर मंडलायुक्त की अदालत से फिलहाल अंतरिम रोक मिली हुई है। ऐसे में आजम खां का वह सपना, जिसे उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत का अहम हिस्सा बनाया था, अब उन्हीं की राजनीति के लिए ग्रहण बन गया है।

जौहर यूनिवर्सिटी पर ध्वस्तीकरण की तलवार

जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर सबसे बड़ा प्रशासनिक विवाद रामपुर विकास प्राधिकरण के उस आदेश से खड़ा हुआ, जिसमें परिसर के 40 में से 38 भवनों को बिना स्वीकृत नक्शे के निर्मित बताते हुए ध्वस्त करने का निर्देश दिया गया। प्राधिकरण की कार्रवाई के खिलाफ यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने मंडलायुक्त की अदालत में अपील की। जुलाई 2026 में अदालत ने मामले की सुनवाई पूरी होने तक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी। इस राहत का अर्थ यह नहीं है कि भवनों को लेकर विवाद समाप्त हो गया है या निर्माण को अंतिम रूप से वैध घोषित कर दिया गया है। मामले का निपटारा संबंधित दस्तावेजों और पक्षों की दलीलों पर होने वाली सुनवाई के बाद ही होगा। फिलहाल यूनिवर्सिटी को ध्वस्तीकरण से राहत जरूर मिली है, लेकिन उसके निर्माण की वैधानिकता पर उठे सवाल कायम हैं।

अब ईडी की जांच में चंदे और निर्माण की रकम

ध्वस्तीकरण के विवाद के बीच ईडी की पूछताछ ने जौहर ट्रस्ट की वित्तीय गतिविधियों को फिर सुर्खियों में ला दिया है। एजेंसी की जांच कथित मनी लॉन्ड्रिंग और यूनिवर्सिटी के लिए जुटाई गई रकम के इस्तेमाल से जुड़ी है। जांच अधिकारी चंदे के स्रोत, रकम के हस्तांतरण और निर्माण कार्यों में उसके उपयोग की कड़ियां जोड़ने में जुटे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, रामपुर में दर्ज 27 प्राथमिकी इस जांच की पृष्ठभूमि में हैं। इन मामलों में धोखाधड़ी, जालसाजी, जबरन वसूली और आपराधिक साजिश जैसे आरोप शामिल हैं।

आजम खां से पूछताछ से पहले ईडी जौहर ट्रस्ट से जुड़े लोगों और वित्तीय लेन-देन की जानकारी रखने वाले कुछ अन्य व्यक्तियों के बयान भी दर्ज कर चुकी थी। अब आजम खां का बयान दर्ज किए जाने के बाद जांच एजेंसी के सामने संबंधित बयानों, दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड का मिलान करने की चुनौती है। हालांकि, पूछताछ या जांच अपने आप में किसी आरोप को सिद्ध नहीं करती। वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकलेगा।

जिस यूनिवर्सिटी को बनाया राजनीतिक विरासत का प्रतीक, वही मुसीबतों की वजह बनी

आजम खां के लिए जौहर यूनिवर्सिटी केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं रही, बल्कि रामपुर में उनकी राजनीतिक और सामाजिक पहचान से भी जुड़ी परियोजना रही है। विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे शिक्षा के अवसर बढ़ाने और अपने क्षेत्र में एक बड़े संस्थान का निर्माण करने का उनका सपना था। लेकिन इसी परियोजना से जुड़ी जमीन, निर्माण और वित्तीय गतिविधियों के विवादों ने उनकी राजनीति को लंबे समय से प्रभावित किया है।

2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद रामपुर में आजम खां और उनसे जुड़े लोगों के खिलाफ अनेक मुकदमे दर्ज हुए। इनमें जमीन से संबंधित विवाद, कथित कब्जे, धोखाधड़ी और अन्य आपराधिक आरोप शामिल रहे। इन मामलों में अदालतों ने अलग-अलग फैसले दिए हैं। आजम खां को कुछ मामलों में सजा हुई है, जबकि कुछ मामलों में उन्हें बरी भी किया गया है। फिर भी यह स्पष्ट है कि जमीन और यूनिवर्सिटी से जुड़े विवाद उनके राजनीतिक जीवन पर लंबे समय से दबाव बनाए हुए हैं।

‘रामपुर का मुख्यमंत्री’ कहे जाने वाले नेता की बदली स्थिति

एक समय आजम खां उत्तर प्रदेश की सत्ता में बेहद प्रभावशाली माने जाते थे। अखिलेश यादव सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए नगर विकास सहित महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालने वाले आजम खां का रामपुर में व्यापक राजनीतिक प्रभाव था। उनके समर्थक उन्हें मुस्लिम समाज की प्रमुख राजनीतिक आवाजों में गिनते थे। स्थानीय राजनीति में उनके दबदबे के कारण विरोधी उन्हें ‘रामपुर का मुख्यमंत्री’ भी कहते थे।

लेकिन सत्ता में रहते हुए लिए गए फैसलों और उनसे जुड़े विवादों की कानूनी जांच ने बाद के वर्षों में उनकी स्थिति बदल दी। जिन मामलों को वह राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़कर देखते रहे, उनमें से कई अदालतों तक पहुंचे और कुछ में उन्हें सजा भी मिली। आज की स्थिति में उनके सामने केवल राजनीतिक विरोधियों का मुकाबला करने की चुनौती नहीं है, बल्कि अदालतों में चल रहे मामलों का सामना करना, सजा के खिलाफ कानूनी राहत हासिल करना और यूनिवर्सिटी के भविष्य को लेकर अनिश्चितता दूर करना भी जरूरी है।

आजम खां यह तर्क देते रहे हैं कि यूनिवर्सिटी बनाने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। दूसरी ओर, उनके खिलाफ दर्ज मामलों में शिकायतकर्ताओं और जांच एजेंसियों की ओर से अलग-अलग आरोप लगाए गए हैं। राजनीतिक दावों से इतर इन विवादों का फैसला संबंधित अदालतों और सक्षम प्राधिकारियों को करना है।

विधानसभा सदस्यता गंवाने के बाद 2027 की राह भी आसान नहीं

आजम खां के राजनीतिक भविष्य पर सबसे गंभीर सवाल उनकी सजाओं और चुनाव लड़ने की पात्रता को लेकर है। अक्टूबर 2022 में रामपुर की अदालत से हेट स्पीच मामले में तीन साल की सजा मिलने के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त कर दी गई थी। बाद में उस मामले में अपील पर राहत और अन्य मुकदमों में अलग-अलग न्यायिक घटनाक्रम सामने आए। मई 2026 में एक अन्य मामले में उन्हें दो साल की सजा सुनाई गई और जुलाई में अपील अदालत ने उस सजा को बरकरार रखा। इस तरह उनकी कानूनी मुश्किलें लगातार बनी हुई हैं।

जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत सामान्यतः दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होने पर दोषसिद्ध व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए अयोग्यता के दायरे में आ सकता है। हालांकि, किसी विशेष व्यक्ति की चुनाव लड़ने की पात्रता का निर्धारण उसकी दोषसिद्धियों, सजा की स्थिति, अपील में मिले आदेशों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर किया जाता है। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि आजम खां 2027 का विधानसभा चुनाव किसी भी परिस्थिति में नहीं लड़ पाएंगे। लेकिन यदि उनकी दोषसिद्धियां और सजाएं प्रभावी बनी रहती हैं तथा उन्हें कानून के अनुसार आवश्यक राहत नहीं मिलती, तो उनके लिए चुनावी मैदान में उतरना गंभीर कानूनी चुनौती बना रहेगा।

सपा के लिए भी अहम है आजम खां का मामला

आजम खां का मामला केवल एक नेता की व्यक्तिगत कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं है। रामपुर और आसपास के क्षेत्रों में उनका राजनीतिक प्रभाव रहा है। समाजवादी पार्टी के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि वह अपने इस वरिष्ठ नेता की राजनीतिक भूमिका को किस तरह बनाए रखती है और उनके समर्थकों के बीच अपनी पकड़ कैसे कायम करती है।

एक तरफ पार्टी भाजपा सरकार पर विपक्षी नेताओं के खिलाफ एजेंसियों के इस्तेमाल का आरोप लगाती रही है, तो दूसरी ओर आजम खां से जुड़े मामलों में अदालतों के फैसलों और प्रशासनिक कार्रवाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जौहर यूनिवर्सिटी पर ध्वस्तीकरण के आदेश और ईडी की वित्तीय जांच का आगे क्या परिणाम निकलता है, इसका असर आजम खां की व्यक्तिगत स्थिति के साथ-साथ रामपुर की राजनीति पर भी पड़ सकता है।

सपने की कीमत या पुराने फैसलों का हिसाब?

जौहर यूनिवर्सिटी के भविष्य पर फिलहाल दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं का असर है। एक ओर भवनों की वैधानिकता और ध्वस्तीकरण के आदेश पर अपीलीय सुनवाई होनी है, दूसरी ओर ईडी चंदे और वित्तीय लेन-देन की जांच कर रही है। किसी एक मामले का परिणाम दूसरे का फैसला स्वतः तय नहीं करेगा, लेकिन दोनों ही आजम खां और यूनिवर्सिटी प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

आजम खां के सामने चुनौती यह है कि वे अपने शैक्षणिक सपने से जुड़े संस्थान को विवादों से बाहर निकालने के लिए कानूनी स्तर पर राहत हासिल करें और अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर बनी अनिश्चितता का सामना करें।

SP_Singh AURGURU Editor