संजय बांगर की बेटी अनाया आस्ट्रेलिया में थामेंगी बल्ला, प्रीमियर कम्युनिटी महिला क्रिकेट खेलने की मंजूरी, अगले साल एलीट महिला क्रिकेट में करेंगी डेब्यू
संजय बांगर की बेटी अनाया बांगर को क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने प्रीमियर कम्युनिटी महिला क्रिकेट खेलने की हरी झंडी दे दी है, जिसके बाद वे 2027 में एलीट महिला क्रिकेट में डेब्यू की उम्मीद कर रही हैं।
नई दिल्ली। पूर्व भारतीय ऑलराउंडर और भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व बल्लेबाजी कोच संजय बांगर की बेटी अनाया बांगर के करियर और जीवन में एक बड़ा सकारात्मक मोड़ आया है। जेंडर-अफॉर्मिंग सर्जरी कराने के बाद 25 वर्षीया ट्रांस-एथलीट अनाया को क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (सीए) ने ऑस्ट्रेलिया में कम्युनिटी प्रीमियर महिला क्रिकेट खेलने की आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस फैसले के साथ ही अब अनाया के महिला क्रिकेट के मैदान पर दोबारा वापसी करने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की ट्रांसजेंडर एंड जेंडर डाइवर्स प्लेयर्स इन एलीट क्रिकेट पॉलिसी के अनुसार, एलीट या व्यावसायिक स्तर पर महिला क्रिकेट खेलने के लिए खिलाड़ी का टेस्टोस्टेरोन स्तर लगातार 12 महीनों तक 10 नैनोमोल प्रति लीटर से कम होना अनिवार्य है। बोर्ड के इंटीग्रिटी विभाग की प्रमुख जैकी पार्टरिज ने अनाया को लिखे पत्र में स्पष्ट किया है कि मार्च 2027 तक वे ऑस्ट्रेलिया के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में कम्युनिटी और प्रीमियर क्रिकेट खेल सकती हैं क्योंकि यह स्तर एलीट क्रिकेट के दायरे में नहीं आता है। इसके अलावा, यदि वे मार्च 2027 में एलीट महिला क्रिकेट खेलना चाहती हैं तो उन्हें तय टेस्टोस्टेरोन मानकों को पूरा करने के लिए ब्लड टेस्ट रिपोर्ट जमा करनी होगी।
अनाया बांगर का क्रिकेट से पुराना नाता रहा है। वे मुंबई की ओर से ऐज-ग्रुप क्रिकेट खेल चुकी हैं, जहां उन्होंने भारतीय टेस्ट खिलाड़ी सरफराज खान और उनके भाई मुशीर खान के साथ मैदान साझा किया है। सर्जरी और शारीरिक बदलावों के दौर से गुजरने के बाद अनाया ने सोशल मीडिया पर अपनी वापसी के संकेत दिए थे और अब वे ऑस्ट्रेलिया में एक नया क्लब तलाश रही हैं ताकि प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में अपनी नई पारी की शुरुआत कर सकें।
क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की तारीफ करते हुए अनाया बांगर ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, 'यह मेरे लिए एक बहुत बड़ा दिन है, खासकर यह जानने के बाद कि मैं दोबारा क्रिकेट खेल सकती हूं। एक वक्त ऐसा भी था जब मुझे लगा था कि मैं अब कभी बल्ला नहीं थाम पाऊंगी, लेकिन क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने मुझे एक नया अवसर दिया है। यह सिर्फ मेरे लिए ही नहीं बल्कि उन सभी एथलीट्स के लिए एक मिसाल है जो ट्रांजिशन और अपने पसंदीदा खेल में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर थे। हालांकि, शुरुआत से ही यह सफर शारीरिक के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी काफी दर्दनाक रहा जिससे मेरे रिश्ते, दोस्त, करियर और पूरी जिंदगी बदल गई।'