आगरा नगर निगम में करोड़ों के ई-टेंडर घोटाले पर बवाल बढ़ा, एसआईटी जांच की मांग तेज

आगरा नगर निगम में ई-टेंडर प्रक्रिया के दौरान कथित ब्लो रेट हेरफेर और फर्जी भुगतान के मामले में 100 से 200 करोड़ रुपये तक की अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है। बसपा पार्षदों ने नगर निगम की आंतरिक जांच समिति पर अविश्वास जताते हुए शासन से एसआईटी जांच, संबंधित कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ मुकदमा और दोषियों से राजस्व हानि की वसूली की मांग की है। सपा नेता राहुल चतुर्वेदी ने भी निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। मामले में फाइलें गायब होने और अन्य अनियमितताओं की चर्चाओं के बीच जांच का दायरा बढ़ाने की मांग तेज हो गई है।

Oct 15, 2026 - 14:12
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आगरा नगर निगम में करोड़ों के ई-टेंडर घोटाले पर बवाल बढ़ा, एसआईटी जांच की मांग तेज

बसपा पार्षदों ने आंतरिक जांच समिति पर जताया अविश्वास, कंप्यूटर ऑपरेटर और भुगतान मंजूर करने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग

आगरा। आगरा नगर निगम में ई-टेंडर प्रक्रिया के दौरान कथित अनियमितताओं और फर्जी तरीके से भुगतान कराए जाने का मामला लगातार तूल पकड़ रहा है। घोटाले की आशंका 100 से 200 करोड़ रुपये तक पहुंचने के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पार्षदों ने अब शासन स्तर से विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई है। पार्षदों ने नगर निगम की ओर से गठित जांच समिति पर भरोसा जताने से इनकार करते हुए आरोप लगाया है कि जिस व्यवस्था के भीतर कथित गड़बड़ी हुई, उसी व्यवस्था के अधिकारियों से निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना उचित नहीं है।

बसपा पार्षदों का आरोप है कि ई-टेंडर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों के जरिए सरकारी धन का नुकसान किया गया। उनका कहना है कि केवल एक बाबू को निलंबित करने और कुछ कंप्यूटर ऑपरेटरों के तबादले करने से पूरे मामले का खुलासा नहीं होगा। कथित घोटाले के मुख्य सूत्रधार बताए जा रहे कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसकी संपत्ति की जांच और नियमानुसार जब्ती की कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके साथ ही जिन अधिकारियों और इंजीनियरों की भूमिका जांच में सामने आए, उनकी जवाबदेही भी तय की जाए और दोष सिद्ध होने पर उनसे राजस्व हानि की वसूली की जाए।

ब्लो रेट के जरिए भुगतान में गड़बड़ी का आरोप

नगर निगम के ई-टेंडर घोटाले में आरोप है कि ठेकेदार को टेंडर आवंटित होने के बाद संबंधित पत्रावलियों में कथित तौर पर कूटरचित तरीके से ब्लो रेट दर्ज किए गए। इसके आधार पर भुगतान की प्रक्रिया में गड़बड़ी कर कुछ लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाए जाने की आशंका जताई जा रही है। इस मामले को 'और गुरु' ने उजागर किया था, जिसके बाद नगर निगम प्रशासन में हलचल मच गई और प्रकरण चर्चा का विषय बन गया। मामला सामने आने के बाद नगर निगम में एक बाबू करन को निलंबित किया जा चुका है। वहीं, सात कंप्यूटर ऑपरेटरों के तबादले भी किए गए हैं। हालांकि, बसपा पार्षदों का सवाल है कि जब कथित अनियमितताओं में एक कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, तो अब तक उसकी सेवाएं समाप्त करने या उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने जैसी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

पार्षदों का कहना है कि जांच का दायरा सीमित रखने के बजाय टेंडर से लेकर भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। जिन कर्मचारियों ने पत्रावलियां तैयार कीं, जिन अधिकारियों ने उनका परीक्षण किया और जिन इंजीनियरों तथा जिम्मेदार अधिकारियों के हस्ताक्षरों के आधार पर भुगतान हुआ, उन सभी की भूमिका की जांच जरूरी है।

महंगी गाड़ियों और खर्चीली जीवनशैली की चर्चा

कथित घोटाले में चर्चा के केंद्र में आए कंप्यूटर ऑपरेटर की जीवनशैली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि करीब 11 से 12 हजार रुपये मासिक वेतन पाने वाले इस कर्मचारी के पास महंगी गाड़ियां हैं और वह कथित तौर पर लोगों पर काफी पैसा खर्च करता रहा है। नगर निगम में चर्चा है कि उससे मिलने आने वाले लोगों के लिए महंगी कॉफी मंगाई जाती थी। एक कॉफी की कीमत 300 से 400 रुपये तक होने की बात कही जा रही है। इसके अलावा, अधिकारियों की पार्टियों और यात्राओं के खर्च उठाने के दावे भी सामने आ रहे हैं।

हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित कर्मचारी की आय, संपत्ति तथा खर्चों का आधिकारिक सत्यापन होना अभी बाकी है। ऐसे में इन आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए निष्पक्ष वित्तीय जांच की जरूरत बताई जा रही है। पार्षदों की मांग है कि संबंधित कर्मचारी की ज्ञात आय, संपत्ति, बैंक खातों और संभावित वित्तीय लेनदेन की जांच कराई जाए, ताकि किसी भी प्रकार की अवैध कमाई का पता लगाया जा सके।

अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

नगर निगम में चर्चा है कि संबंधित कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ पहले भी शिकायतें की गई थीं। आरोप है कि शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई और कथित अनियमितताएं जारी रहीं। कुछ सूत्रों का दावा है कि कर्मचारी की अधिकारियों से नजदीकी थी और इसी वजह से शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। इन आरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल उन अधिकारियों और इंजीनियरों की भूमिका को लेकर उठ रहा है, जिनके हस्ताक्षरों के आधार पर संबंधित पत्रावलियों पर कार्रवाई हुई और भुगतान किए गए। यदि भुगतान प्रक्रिया में कूटरचना या अनियमितता हुई है, तो यह जांचना भी जरूरी होगा कि संबंधित दस्तावेजों को किसने तैयार किया, किस स्तर पर उनका सत्यापन हुआ और भुगतान की स्वीकृति किसने दी। बसपा पार्षदों का कहना है कि जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रही तो पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ सकेगी। उनका आरोप है कि कथित घोटाले में शामिल किसी भी व्यक्ति को पद या प्रभाव के आधार पर संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

कई फाइलें गायब होने की चर्चा से बढ़ा संदेह

मामले के सार्वजनिक होने के बाद नगर निगम में कुछ महत्वपूर्ण फाइलों के गायब होने की चर्चा भी हो रही है। बताया जा रहा है कि ये वे पत्रावलियां हो सकती हैं, जिनमें कथित तौर पर ब्लो रेट से संबंधित गड़बड़ी और भुगतान की प्रक्रिया दर्ज थी। हालांकि, फाइलें गायब होने और इसके पीछे किसी विशेष कर्मचारी की भूमिका होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। नगर निगम में यह चर्चा भी है कि संबंधित कंप्यूटर ऑपरेटर कथित तौर पर लोगों से कह रहा है कि उसे एक जिम्मेदार व्यक्ति ने आश्वासन दिया है कि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा और करीब एक महीने बाद उसे दोबारा उसके पुराने पटल पर तैनात कर दिया जाएगा। इस कथित दावे की भी पुष्टि नहीं हुई है।

यदि फाइलें वास्तव में गायब हुई हैं, तो उनकी तलाश, डिजिटल रिकॉर्ड की जांच, ई-टेंडर पोर्टल के लॉग, भुगतान संबंधी दस्तावेजों और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का संरक्षण बेहद महत्वपूर्ण होगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कथित अनियमितताएं किस अवधि में हुईं और उनमें किन-किन लोगों की भूमिका रही। बसपा पार्षदों ने इन्हीं आशंकाओं के आधार पर नगर निगम की आंतरिक जांच को अपर्याप्त बताते हुए शासन से स्वतंत्र एजेंसी के माध्यम से जांच कराने की मांग की है।

राहुल चतुर्वेदी बोले- छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई से नहीं खुलेगी पूरी पोल

समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मेयर प्रत्याशी राहुल चतुर्वेदी ने भी इस मामले में शासन स्तर से एसआईटी जांच कराने की मांग की है। उनका आरोप है कि नगर निगम में करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं और इसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की आशंका है। राहुल चतुर्वेदी ने संबंधित कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं होने पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर उसे सेवा से हटाने में देरी क्यों हो रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या संबंधित कर्मचारी के पास अधिकारियों से जुड़े ऐसे तथ्य हैं, जिनके सामने आने का उन्हें डर है।

सपा नेता के मुताबिक, यदि जांच नगर निगम के स्तर पर ही सीमित रही तो कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई करके मामले को दबाने की कोशिश हो सकती है। उन्होंने मांग की कि टेंडर आवंटन से लेकर भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराई जाए, जिससे कथित घोटाले के वास्तविक जिम्मेदार लोगों की पहचान हो सके।

200 करोड़ रुपये से अधिक भी हो सकता है कथित घोटाला

नगर निगम में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, ई-टेंडर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी का सिलसिला केवल एक-दो वर्षों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके तीन से चार वर्षों से चलने की आशंका जताई जा रही है। इसी आधार पर कुछ लोगों का दावा है कि जांच का दायरा बढ़ने पर कथित घोटाले की राशि 200 करोड़ रुपये से भी अधिक निकल सकती है। इसके अलावा, फर्जी तरीके से भुगतान कराए जाने के आरोपों के साथ कुछ अन्य प्रक्रियाओं में भी वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, इन सभी दावों की पुष्टि विस्तृत दस्तावेजी और वित्तीय जांच के बाद ही हो सकेगी। फिलहाल 100 से 200 करोड़ रुपये की बताई जा रही रकम को जांच में प्रमाणित राशि नहीं माना जा सकता।

मामले में संबंधित कंप्यूटर ऑपरेटर से पूछताछ, टेंडर और भुगतान की पत्रावलियों का मिलान तथा अधिकारियों की भूमिका की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और नियमानुसार राजस्व वसूली का रास्ता खुल सकता है।

बसपा पार्षदों ने दी आंदोलन की चेतावनी

शासन से एसआईटी जांच की मांग करने वालों में बसपा पार्षद कप्तान सिंह, सुनील शर्मा, निधि पटेल, अरविंद मथुरिया, डॉ. यशपाल सिंह और रजनी देवी सहित अन्य पार्षद शामिल हैं। सभी ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की जांच नगर निगम से बाहर की स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए। पार्षदों ने कथित घोटाले के मुख्य सूत्रधार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने, उसकी संपत्ति की जांच करने और कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की है। साथ ही, जिन अधिकारियों और इंजीनियरों की भूमिका सामने आए, उनके खिलाफ भी कार्रवाई करते हुए सरकारी धन की वसूली सुनिश्चित करने की मांग उठाई है।

बसपा पार्षदों ने चेतावनी दी है कि यदि शासन ने उनकी मांग पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो वे सड़क पर उतरकर आंदोलन करेंगे। अब सबकी निगाहें शासन और नगर निगम प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। सबसे अहम सवाल यही है कि जांच का दायरा कितना व्यापक होगा और क्या कथित अनियमितताओं से जुड़े सभी कर्मचारियों, अधिकारियों तथा अन्य जिम्मेदार लोगों की भूमिका निष्पक्ष तरीके से सामने लाई जाएगी।