अटेंशन सीकिंग बिहेवियर: पहचान की चाह या प्रशंसा की भूख? जब काम से ज्यादा प्रचार और सोशल मीडिया पर छाने की होड़ बन जाए जुनून!
दूसरों से प्रशंसा और सामाजिक पहचान पाने की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन जब व्यक्ति का आत्मविश्वास लाइक, कमेंट, तस्वीरों और सार्वजनिक प्रचार पर निर्भर होने लगे, तो यह आत्ममूल्यांकन का विषय बन जाता है। सोशल मीडिया और प्रतिस्पर्धा ने ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है, जिससे वास्तविक उपलब्धियों की तुलना में उनका प्रदर्शन अधिक महत्वपूर्ण लगने लगता है। स्वस्थ सोच यही है कि व्यक्ति अपनी पहचान दूसरों की प्रतिक्रियाओं के बजाय अपने काम, व्यवहार, ईमानदारी और सामाजिक योगदान से बनाए तथा प्रशंसा की अपेक्षा को अपने आत्मविश्वास पर हावी न होने दे।
-डॉ. नवीन गुप्ता-
आजकल समाज में एक प्रवृत्ति तेजी से दिखाई दे रही है। हर व्यक्ति चाहता है कि लोग उसे देखें, उसके बारे में बात करें और उसकी पहचान को स्वीकार करें। बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर नाम और तस्वीरें लगवाना, शुभकामना संदेशों में अपना चेहरा प्रमुखता से दिखाना, भव्य जुलूस निकालना और छोटी-बड़ी उपलब्धियों को तुरंत सोशल मीडिया पर साझा करना इसी प्रवृत्ति के उदाहरण हो सकते हैं। मनोविज्ञान में दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने की इस प्रवृत्ति को अटेंशन सीकिंग बिहेवियर यानी ध्यानाकर्षण व्यवहार कहा जाता है।
सवाल यह है कि हम अपने काम के कारण पहचाने जाना चाहते हैं या पहचान पाने के लिए अपने काम का प्रदर्शन कर रहे हैं? दोनों स्थितियों में बुनियादी अंतर है। पहली स्थिति में पहचान उपलब्धि का स्वाभाविक परिणाम होती है, जबकि दूसरी में प्रदर्शन ही उद्देश्य बन सकता है। जब किसी काम की उपयोगिता से अधिक उसके प्रचार को महत्व मिलने लगे, तो यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि हमारी प्राथमिकताएं किस दिशा में जा रही हैं।
प्रशंसा, असुरक्षा और प्रतिस्पर्धा
ध्यान आकर्षित करने की इच्छा अपने आप में असामान्य नहीं है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके प्रयासों को सराहा जाए और उसे सामाजिक सम्मान मिले। लेकिन जब आत्मविश्वास दूसरों की प्रशंसा पर निर्भर होने लगे, तो यह प्रवृत्ति परेशानी का कारण बन सकती है।
इसके पीछे प्रशंसा पाने की इच्छा, असुरक्षा की भावना, सामाजिक प्रतिस्पर्धा और अपनी अलग पहचान बनाने की चाह जैसे कारण हो सकते हैं। व्यक्ति को लग सकता है कि यदि वह लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराएगा, तो लोग उसे भूल जाएंगे या उसका महत्व कम हो जाएगा। ऐसे में वास्तविक उपलब्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि उसे कितने लोगों ने देखा और कितनी प्रशंसा मिली।
सोशल मीडिया और दिखावे की संस्कृति
सोशल मीडिया ने ध्यान आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा को एक नया मंच दिया है। लाइक, कमेंट, शेयर और फॉलोअर की संख्या लोकप्रियता मापने के पैमाने बन गए हैं। दूसरों की उपलब्धियों से तुलना और प्रतिक्रिया पाने की इच्छा व्यक्ति को अपनी गतिविधियां लगातार साझा करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है। राजनीति, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक जीवन में भी नाम, पद और तस्वीर को प्रमुखता देने की होड़ दिखाई देती है। प्रचार अपने आप में गलत नहीं है। वह किसी अच्छे काम की जानकारी लोगों तक पहुंचा सकता है, लेकिन जब प्रचार वास्तविक योगदान से बड़ा हो जाए, तो दिखावा प्राथमिकता बन सकता है।
क्या यह मानसिक विकार है?
दूसरों का ध्यान आकर्षित करना अपने आप में कोई मानसिक बीमारी नहीं है। अपनी उपलब्धियों को साझा करना, प्रशंसा चाहना और सामाजिक स्वीकृति की अपेक्षा रखना सामान्य मानवीय व्यवहार हैं। चिंता तब हो सकती है, जब व्यक्ति का व्यवहार दूसरों की प्रतिक्रिया पर अत्यधिक निर्भर हो जाए और इसका असर उसके रिश्तों, कामकाज या मानसिक संतुलन पर पड़ने लगे।
फिर भी, केवल किसी के व्यवहार के आधार पर उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित करना उचित नहीं है। इसके पीछे की परिस्थितियों और भावनाओं को समझना जरूरी है। आवश्यकता होने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह ली जा सकती है।
पहचान काम से बने, केवल प्रदर्शन से नहीं
इस प्रवृत्ति पर विचार करने के लिए व्यक्ति खुद से कुछ सवाल पूछ सकता है—यदि मेरे काम की तस्वीर न छपे, सोशल मीडिया पर प्रशंसा न मिले और कोई सार्वजनिक सम्मान न हो, तो क्या मैं यह काम उतनी ही ईमानदारी से करूंगा? क्या मुझे काम पूरा करने से संतुष्टि मिलती है या दूसरों की प्रतिक्रिया से?
परिवार और समाज को भी केवल लोकप्रियता और बाहरी प्रदर्शन के बजाय ईमानदारी, प्रयास, सहयोग और वास्तविक योगदान को महत्व देना चाहिए। अपनी उपलब्धियों को साझा करना स्वाभाविक है, लेकिन हर काम को प्रदर्शन में बदल देना जरूरी नहीं।
अंततः महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम दूसरों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं, बल्कि यह है कि कहीं हमारा जीवन उसी ध्यान को पाने के लिए तो संचालित नहीं होने लगा है। स्वस्थ सामाजिक वातावरण वही होगा, जहां प्रशंसा अच्छी लगे, लेकिन उसके बिना आत्मविश्वास न डगमगाए। क्योंकि टिकाऊ पहचान होर्डिंग्स, तस्वीरों और प्रचार से नहीं, बल्कि व्यक्ति के काम, व्यवहार और समाज के प्रति उसके योगदान से बनती है।
(लेखक व्यवहार विज्ञानी और सीएसडीएस के निदेशक हैं।)