डिजिटल अरेस्ट में बैंक भी होंगे जवाबदेह, लापरवाही से ठगी हुई तो पीड़ित को लौटानी पड़ सकती है पूरी रकम, आरबीआई के प्रस्तावित नियमों की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि बैंक या वित्तीय संस्थान की लापरवाही के कारण किसी ग्राहक के साथ साइबर ठगी होती है, तो पीड़ित को मुआवजा देने की व्यवस्था होनी चाहिए। अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के प्रस्तावित नियमों में इस प्रावधान को शामिल करने की जरूरत बताई।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि बैंकों को ग्राहकों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करना चाहिए। यदि किसी खाते से अचानक असामान्य रूप से बड़ी रकम निकाली जाती है, तो बैंकिंग प्रणाली को ऐसे संदिग्ध लेनदेन की पहचान कर समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत का जोर ठगी होने के बाद जांच करने के बजाय उसे पहले ही रोकने पर रहा।
आरबीआई के नियमों की होगी समीक्षा
सुनवाई के दौरान अदालत ने साइबर ठगी रोकने के लिए आरबीआई के प्रस्तावित केवाईसी संशोधन निर्देशों पर भी ध्यान दिया। अदालत चाहती है कि इन नियमों में संदिग्ध लेनदेन की निगरानी, समय पर कार्रवाई और बैंक की लापरवाही सामने आने पर पीड़ित को मुआवजा देने की स्पष्ट व्यवस्था हो। प्रस्तावित नियमों को 30 नवंबर तक अधिसूचित करने और 31 दिसंबर तक लागू करने का लक्ष्य बताए जाने की जानकारी भी सामने आई। ये प्रस्तावित समयसीमाएं हैं, लागू हो चुके नियम नहीं।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराकर वसूली
डिजिटल अरेस्ट के मामलों में साइबर अपराधी खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को गिरफ्तारी का डर दिखाते हैं। वीडियो कॉल पर पूछताछ और फर्जी कानूनी आदेशों के जरिए दबाव बनाकर उनसे बैंक खातों में रकम जमा कराई जाती है। अदालत ने जागरूकता अभियानों के बावजूद लोगों के ठगी का शिकार होने पर चिंता जताई। सुनवाई में इस साल ऐसे मामलों में करीब 800 करोड़ रुपये के नुकसान का आंकड़ा भी सामने आया।
पीड़ितों के लिए क्या बदलेगा
सुप्रीम कोर्ट की पहल का उद्देश्य बैंकों की जिम्मेदारी तय करना और साइबर ठगी से प्रभावित लोगों को राहत दिलाना है। हालांकि, अभी इसे हर मामले में बैंक से मुआवजा मिलने का अंतिम आदेश नहीं माना जा सकता। मुआवजे की जिम्मेदारी लागू होने वाले नियमों और संबंधित मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगी।
साइबर ठगी होने पर पीड़ितों को तुरंत अपने बैंक और राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति के दबाव में आकर रकम हस्तांतरित नहीं करनी चाहिए और न ही ओटीपी या बैंक संबंधी गोपनीय जानकारी साझा करनी चाहिए।