11 हजार का कैंसर इंजेक्शन अस्पताल में 1.30 लाख का! दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, फैसला सुरक्षित

नई दिल्ली/आगरा। दवाओं की कीमतों और व्यापारिक मार्जिन पर नियंत्रण की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई पूरी हो गई। आगरा के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता केसी जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान पीठ ने दवाओं की खरीद कीमत और मरीजों से वसूली जाने वाली रकम के बीच भारी अंतर पर सवाल उठाए। एक कैंसर इंजेक्शन की कीमत लगभग 11 हजार रुपये से बढ़कर अस्पताल में 1.30 लाख रुपये तक पहुंचने का उदाहरण सामने आया। केंद्र सरकार ने दवाओं की किफायत, उपलब्धता और मूल्य निर्धारण में सुधार के लिए उठाए जा रहे कदमों का पक्ष रखा।

Oct 27, 2026 - 21:58
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11 हजार का कैंसर इंजेक्शन अस्पताल में 1.30 लाख का! दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, फैसला सुरक्षित

11 हजार के इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये वसूलने पर सवाल

सुनवाई के दौरान पीठ ने कैंसर उपचार से जुड़ा एक उदाहरण उठाया। एक दवा वितरक के अनुसार, उसे लगभग 11 हजार रुपये में मिलने वाले इंजेक्शन को अस्पताल ने बाहर से लाकर लगाने से इनकार कर दिया और उसी इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये वसूले। अदालत ने इतनी बड़ी कीमत के अंतर का औचित्य जानना चाहा।

पीठ ने लगभग 15 रुपये में खुदरा विक्रेता को मिलने वाली ड्रिप लाइन के लिए मरीज से 250 रुपये वसूले जाने का उदाहरण भी सामने रखा। इन उदाहरणों के जरिए दवाओं और चिकित्सा सामग्री की खरीद कीमत तथा मरीजों से वसूली जाने वाली रकम के बीच अंतर को लेकर चिंता जाहिर की गई।

अस्पतालों की लागत बनाम मरीजों पर आर्थिक बोझ

निजी अस्पतालों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि अस्पतालों को चौबीसों घंटे चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने के साथ बुनियादी ढांचे, सुविधाओं और कर्मचारियों पर भारी खर्च करना पड़ता है। दवाओं के व्यापारिक मार्जिन में कटौती से अस्पतालों के संचालन पर असर पड़ सकता है।

पीठ ने इस दलील पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि अस्पतालों के संचालन की लागत दवाओं पर अत्यधिक मार्जिन का औचित्य नहीं बन सकती। सुनवाई का प्रमुख मुद्दा यह रहा कि चिकित्सा सेवाओं की लागत और मरीजों को सुलभ इलाज उपलब्ध कराने के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।

केंद्र ने किफायती दवाओं के साथ उपलब्धता पर भी दिया जोर

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दवाओं की कीमतों और मूल्य निर्धारण की नीतियों का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया में सबसे कम कीमतों में शामिल हैं और सरकार समय-समय पर मूल्य निर्धारण की नीतियों में बदलाव करती रहती है।

केंद्र का तर्क रहा कि दवाओं को किफायती बनाने के साथ उनकी उपलब्धता और औषधि क्षेत्र के सुचारु संचालन को भी ध्यान में रखना जरूरी है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निगाहें टिकी हैं, जिससे दवाओं की कीमतों और व्यापारिक मार्जिन के नियमन से जुड़े सवालों पर महत्वपूर्ण दिशा मिल सकती है।

137 कैंसर दवाओं पर 30 प्रतिशत व्यापारिक मार्जिन की सीमा

सुनवाई के बीच केंद्र सरकार ने 137 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के लिए व्यापारिक मार्जिन सीमित करने की व्यवस्था अधिसूचित की है। इसके तहत व्यापारिक मार्जिन की अधिकतम सीमा जीएसटी रहित अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का 30 प्रतिशत रखी गई है। संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होनी हैं।

उपलब्ध आकलन के अनुसार, इस व्यवस्था से संबंधित दवाओं की एमआरपी में लगभग 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आने और मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान है। ये अनुमानित लाभ हैं; वास्तविक बचत दवाओं और उनकी कीमतों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

शुरुआती कीमत तय करने की व्यवस्था पर भी सवाल

दवाओं की कीमतों के नियमन से जुड़ा एक प्रमुख सवाल गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत निर्धारित करने की व्यवस्था है। औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत अनुसूचित दवाओं की अधिकतम कीमत तय की जाती है। वहीं, गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती एमआरपी सामान्यतः निर्माता तय करते हैं।

मौजूदा व्यवस्था में गैर-अनुसूचित दवाओं की एमआरपी में पिछले 12 महीनों के दौरान 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ताओं का प्रमुख सवाल है कि यदि किसी दवा की शुरुआती कीमत ही बहुत अधिक तय कर दी जाए, तो बाद में कीमत बढ़ाने पर सीमा लगाने से मरीजों को पर्याप्त राहत कैसे मिलेगी।

हालांकि, सरकार के पास गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों में हस्तक्षेप करने का अधिकार भी है। औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश के पैराग्राफ 19 के तहत असाधारण परिस्थितियों में जनहित में किसी भी दवा की अधिकतम या खुदरा कीमत निर्धारित की जा सकती है। ऐसे में सवाल केवल मूल्य नियंत्रण की शक्तियों का नहीं, बल्कि उनके दायरे और प्रभावी इस्तेमाल का भी है।

याचिकाओं में दवाओं और चिकित्सा उपकरणों पर नियंत्रण की मांग

केसी जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की जनहित याचिकाओं में गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतों के नियमन, चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य अथवा व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय करने और जेनेरिक नाम से दवाएं लिखने की अनिवार्यता जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।

याचिकाओं का उद्देश्य दवा मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ाना और मरीजों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम करना है। याचिकाकर्ताओं का जोर ऐसी व्यवस्था बनाने पर है, जिसमें दवाओं की कीमतों और उनके वितरण से जुड़े व्यापारिक मार्जिन पर प्रभावी निगरानी हो तथा मरीजों को अनावश्यक रूप से अधिक भुगतान न करना पड़े।

केसी जैन बोले- उद्योग का विरोध नहीं, मरीजों के हितों की चिंता

केसी जैन एडवोकेट का कहना है कि इन याचिकाओं का उद्देश्य औषधि उद्योग का विरोध करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना है जिसमें उद्योग को उचित मुनाफा मिले और मरीजों के हित भी सुरक्षित रहें। आवश्यक दवाएं और इलाज आम नागरिक की पहुंच में होने चाहिए।

मंगलवार को सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब निर्णय से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि दवाओं की शुरुआती कीमतों, व्यापारिक मार्जिन और चिकित्सा उपकरणों के मूल्य नियमन से जुड़े सवालों पर किस तरह की दिशा तय होती है। मरीजों के लिए अहम सवाल यही है कि इलाज की लागत कम करने और दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता लाने के प्रयास कितने प्रभावी साबित होते हैं।

SP_Singh AURGURU Editor