संयुक्त राष्ट्र के 81 साल: शांति का वादा, तबाही का तमाशबीन; रवांडा से यूक्रेन तक नाकामी, ट्रंप की बेरुखी और वीटो के शिकंजे में वैश्विक व्यवस्था
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 1945 में दुनिया को युद्धों से बचाने और वैश्विक शांति कायम करने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन 81 साल बाद भी रवांडा, स्रेब्रेनित्सा, इराक, सीरिया, फिलिस्तीन और यूक्रेन जैसे संघर्षों में यह प्रभावी भूमिका नहीं निभा सका। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार, महाशक्तियों के स्वार्थ और डोनाल्ड ट्रंप की बहुपक्षीय संस्थाओं के प्रति बेरुखी ने इसकी कार्यक्षमता को कमजोर किया है। संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी बनाने के लिए सुरक्षा परिषद का विस्तार, वीटो अधिकारों पर अंकुश, शांति सैनिकों को पर्याप्त संसाधन और अंतरराष्ट्रीय कानून का सभी देशों पर समान रूप से पालन जरूरी है।
-बृज खंडेलवाल-
जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की नाकामियों पर सवाल उठते हैं, उसके पैरोकार यूनेस्को और दूसरी एजेंसियों की उपलब्धियाँ गिनाने लगते हैं। लेकिन सवाल उन एजेंसियों का नहीं, इसके बुनियादी मकसद का है। UNO बना था दुनिया को जंग से बचाने के लिए, या जंग के बाद राहत बाँटने, प्रस्ताव पारित करने और मातम मनाने के लिए?
1945 में दूसरे विश्व युद्ध की तबाही के बाद इसकी स्थापना आने वाली नस्लों को जंग की विभीषिका से बचाने के वादे के साथ हुई थी। आज 81 साल बाद भी बंदूकें खामोश नहीं हुईं, सरहदों पर तनाव कम नहीं हुआ और ताकतवर मुल्कों की मनमानी पर लगाम नहीं लगी। सवाल उठता है कि आखिर इस वैश्विक संस्था की उपयोगिता क्या है, अगर यह दुनिया को सबसे बड़े खतरों से बचा ही नहीं सकती?
रवांडा इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण है। 1994 में महज सौ दिनों के भीतर करीब आठ लाख तुत्सी और दूसरे लोग मार डाले गए। संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों को नरसंहार की आशंका के संकेत मिल चुके थे। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद ने फौज बढ़ाने के बजाय उसकी तादाद घटा दी। दुनिया देखती रही और इंसानियत का कत्ल होता रहा।
स्रेब्रेनित्सा में कहानी और कड़वी थी। UNO ने खुद इस इलाके को सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया था। फिर भी 1995 में करीब आठ हजार बोस्नियाई मुस्लिम पुरुषों और लड़कों की हत्या कर दी गई। जब संयुक्त राष्ट्र का घोषित सुरक्षित क्षेत्र ही कब्रगाह बन जाए, तो उसके वादों की कीमत क्या रह जाती है? कागज पर सुरक्षा और जमीन पर कत्लेआम, यही इस संस्था की सबसे बड़ी त्रासदी रही है।
सूडान और कांगो में हिंसा और विस्थापन लंबे समय तक जारी रहे। सीरिया के गृहयुद्ध में रूस और चीन के वीटो ने बार-बार प्रभावी कार्रवाई रोकी। 2003 में अमेरिका ने सुरक्षा परिषद की स्पष्ट अनुमति के बिना इराक पर हमला कर दिया। UNO विरोध करता रहा, लेकिन युद्ध रोक नहीं सका। फिलिस्तीन पर दशकों से प्रस्ताव पारित होते रहे, मगर जमीन पर हालात नहीं बदले। अमेरिकी वीटो ने कई मौकों पर परिषद की कार्रवाई रोक दी। प्रस्तावों का ढेर बढ़ता गया, लेकिन शांति दूर ही रही।
यूक्रेन में यह विडंबना सबसे साफ दिखाई देती है। जिस रूस ने पड़ोसी देश पर हमला किया, वह खुद सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और उसके हाथ में वीटो की ताकत है। यानी चौकीदार की सीटी तो बजती है, लेकिन उसे रोकने का अधिकार भी उसी के पास है, जिसे पकड़ना था। ऐसी व्यवस्था में निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद आखिर कैसे की जाए?
डोनाल्ड ट्रंप की बेरुखी और संयुक्त राष्ट्र के प्रति उनका सार्वजनिक तिरस्कार इस संस्था की साख पर नए सवाल खड़े करते हैं। जब दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बहुपक्षीय संस्थाओं को नजरअंदाज करके राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि बताती है, तो UNO की सीमाएँ खुलकर सामने आती हैं। अमेरिका की प्राथमिकताएँ बदलती हैं, तो वैश्विक सहयोग की पूरी इमारत हिलने लगती है।
लेकिन सारा ठीकरा ट्रंप पर फोड़ना आसान रास्ता है। रवांडा, इराक और सीरिया के संकट उनकी राजनीति से पैदा नहीं हुए। असली बीमारी व्यवस्था में है। अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस वीटो के जरिए अपने हितों की हिफाजत करते हैं। जब उनकी सियासत इंसाफ के रास्ते में आती है, तो पूरी संस्था पंगु हो जाती है। छोटे देशों को अंतरराष्ट्रीय नियमों का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन बड़े मुल्कों के लिए अक्सर अलग पैमाना दिखाई देता है।
अब क्या हो?
संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक होने से बचाना है, तो खोखले भाषणों से आगे बढ़ना होगा। सबसे पहले सुरक्षा परिषद का विस्तार जरूरी है, ताकि आज की दुनिया की वास्तविकता उसमें दिखाई दे। वीटो की ताकत पर भी लगाम लगनी चाहिए, खासकर नरसंहार और बड़े मानवीय संकटों के मामलों में। शांति सैनिकों को स्पष्ट अधिकार, पर्याप्त संसाधन और समय पर सहायता मिलनी चाहिए। गंभीर अपराधों के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय कानून ताकतवरों पर भी उतना ही लागू होना चाहिए, जितना कमजोर मुल्कों पर। संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को केवल बयान जारी करने के बजाय समयबद्ध कार्रवाई और उसके परिणामों का हिसाब भी देना चाहिए।
दुनिया को भाषणों, प्रस्तावों और सम्मेलनों की नहीं, ठोस नतीजों की जरूरत है। उसे ऐसी संस्था चाहिए, जो जंग के बाद सिर्फ मातम न मनाए, बल्कि जंग रोकने की ताकत भी रखे। वरना 81वीं वर्षगाँठ महज एक औपचारिक उत्सव बनकर रह जाएगी। इतिहास यही कहेगा: इरादे नेक थे, वादे बड़े थे, मगर व्यवस्था नाकाम रही।