मोदी सरकार की बड़ी कामयाबी: जीएसटी से पहले और अब, कितना बदला कारोबार और कितनी आसान हुई व्यापार की राह?
जीएसटी ने देश की बिखरी कर व्यवस्था को एक साझा ढांचे में लाकर कारोबार को आसान बनाने, राज्यों के बीच माल की आवाजाही सुगम करने, डिजिटल निगरानी बढ़ाने और कर संग्रह में वृद्धि करने में मदद की है। पंजीकृत करदाताओं की संख्या बढ़ी है और फर्जी बिलिंग व कर चोरी पर नियंत्रण के नए रास्ते खुले हैं। हालांकि, छोटे व्यापारियों के लिए जटिल नियमों और तकनीकी परेशानियों की चुनौती अब भी बनी हुई है। जीएसटी की सफलता के लिए कर व्यवस्था को सरल बनाना, व्यापारियों का समय और पैसा बचाना तथा आम उपभोक्ताओं तक इसका लाभ पहुंचाना जरूरी है।
-बृज खंडेलवाल-
कल्पना कीजिए, जुलाई 2017 से पहले का भारत। आगरा से दिल्ली जा रहा एक ट्रक रास्ते में बार बार रुकता है। कहीं चुंगी, कहीं प्रवेश कर, तो कहीं कागजों की जांच। घंटों की देरी से माल पहुंचता है और खर्च बढ़ जाता है। आखिरकार इस बोझ का कुछ हिस्सा ग्राहक की जेब से निकलता है।
दुकानदारों की मुश्किलें भी कम नहीं थीं। उत्तर प्रदेश में अलग टैक्स, दिल्ली में अलग नियम और दूसरे राज्यों में अलग हिसाब किताब। कागजात का ढेर, सरकारी दफ्तरों के चक्कर और एक टैक्स के ऊपर दूसरा टैक्स। कारोबार करना आसान नहीं था। टैक्स की दरों में अंतर का फायदा उठाकर कुछ लोग कर चोरी भी करते थे।
फिर आया जीएसटी का दौर। एक जुलाई 2017 को नरेंद्र मोदी सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू किया। इसका नारा था, ‘एक देश, एक कर’। मकसद साफ था। देश में टैक्स की बिखरी व्यवस्था को एक करना, कारोबार आसान बनाना और कर चोरी के रास्ते बंद करना।
पहले केंद्र सरकार कारखानों में बने सामान पर उत्पाद शुल्क और सेवाओं पर सेवा कर लगाती थी। राज्य सरकारें बिक्री कर, प्रवेश कर और चुंगी जैसे कई कर वसूलती थीं। हर राज्य के नियम अलग होने से व्यापारियों को परेशानी होती थी। कई बार पहले चुकाए गए टैक्स का पूरा फायदा भी नहीं मिलता था। इस तरह एक ही सामान पर बार बार टैक्स का बोझ बढ़ता जाता था।
जीएसटी ने इस व्यवस्था के बड़े हिस्से को एक ढांचे में ला दिया। अब राज्य के भीतर कारोबार पर केंद्र और राज्य का अपना अपना हिस्सा होता है। राज्यों के बीच बिक्री के लिए अलग व्यवस्था है। पहले खरीदे गए सामान पर चुकाए टैक्स का उचित हिसाब मिलने से टैक्स पर टैक्स का बोझ भी कम हुआ।
ऑनलाइन पंजीकरण, टैक्स रिटर्न और भुगतान की सुविधा ने कागजी कामकाज घटाने में मदद की। राज्यों की सीमाओं के पार माल भेजना भी पहले से आसान हुआ।
जीएसटी की एक बड़ी खासियत है कि इसमें लेनदेन का हिसाब रखना पहले से आसान हुआ है। ई वे बिल, ई इनवॉइस और ऑनलाइन रिकॉर्ड से माल की आवाजाही तथा टैक्स भुगतान पर नजर रखना आसान हुआ। टैक्स क्रेडिट के लिए भी खरीद और बिक्री का हिसाब जरूरी है। इससे फर्जी बिलों और टैक्स चोरी को पकड़ने में मदद मिली है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि कर चोरी पूरी तरह खत्म हो गई। फर्जी बिलिंग और नियमों से बचने के तरीके आज भी सामने आते हैं। लेकिन डिजिटल निगरानी ने ऐसे मामलों पर कार्रवाई के नए रास्ते खोले हैं।
जीएसटी के दायरे में आने वाले कारोबारियों की संख्या भी बढ़ी है। शुरुआती वर्षों में करीब 65 से 67 लाख पंजीकृत करदाता थे। जून 2026 तक यह संख्या लगभग 1.67 करोड़ बताई गई। इसका अर्थ है कि अधिक कारोबार अब टैक्स व्यवस्था के दायरे में आ रहे हैं। इसमें नए कारोबारों के साथ बेहतर पंजीकरण और अनुपालन की भी भूमिका है।
टैक्स संग्रह के आंकड़े भी बढ़ोतरी दिखाते हैं। सितंबर 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 2,03,521 करोड़ रुपये रहा। यह पिछले साल के मुकाबले 14.7 प्रतिशत अधिक था। अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच कुल सकल संग्रह 12.46 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। बढ़ते संग्रह में आर्थिक गतिविधियों, बेहतर अनुपालन और कर चोरी रोकने के प्रयासों का योगदान हो सकता है।
जीएसटी लागू होने के बाद छोटे व्यापारियों को तकनीकी दिक्कतों, जटिल नियमों और रिटर्न भरने की परेशानियों का सामना करना पड़ा। कारोबारियों को कई बार समझ नहीं आता था कि कौन सा नियम कब लागू होगा। राज्यों को भी राजस्व में कमी की चिंता थी। केंद्र की मुआवजा व्यवस्था ने शुरुआती वर्षों में राज्यों को राहत दी।
समय के साथ नियमों और ऑनलाइन व्यवस्था में बदलाव किए गए। छोटे कारोबारियों के लिए कुछ आसान योजनाएं बनाई गईं। रिफंड की प्रक्रिया तेज करने और कागजी काम घटाने के प्रयास भी हुए। हालांकि, इन सुविधाओं का लाभ पात्रता और लागू नियमों पर निर्भर करता है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने अब भी यही चुनौती है कि व्यवस्था को सरल बनाया जाए। छोटे दुकानदारों, कारीगरों, महिला उद्यमियों और ग्रामीण कारोबारियों को अनावश्यक परेशानी से बचाना जरूरी है। ट्रकों को रास्ते में बेवजह रोकने के बजाय जांच ठोस सूचना और नियमों के आधार पर होनी चाहिए।
जीएसटी की कहानी सिर्फ एक नए टैक्स की कहानी नहीं है। इसने देश के अलग अलग बाजारों को जोड़ने और कारोबार के लिए साझा व्यवस्था बनाने में मदद की है। टैक्स संग्रह बढ़ा है और लेनदेन पर निगरानी मजबूत हुई है। लेकिन बढ़ते राजस्व का पूरा श्रेय केवल जीएसटी को देना भी सही नहीं होगा।
यही सबसे बड़ा सवाल है। व्यापारी का समय और पैसा बचना चाहिए। ट्रक कम रुकें, कारोबारियों को कम कागजी झंझट झेलना पड़े और कर चोरी पर लगाम लगे। साथ ही, टैक्स का फायदा आम ग्राहक तक भी पहुंचना चाहिए।
मित्तल साहब की बात गौर करने लायक है। वे कहते हैं, “सुधार तभी सफल माना जाएगा, जब ट्रक समय पर पहुंचे, व्यापारी बेवजह न उलझे और ग्राहक को उचित कीमत पर सामान मिले।”