मोरारी बापू की रामकथा में गूंजा ‘राधे-राधे’, प्रेम और करुणा में डूबा आगरा का कथा पंडाल
आगरा के फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड में चल रही नौ दिवसीय श्रीरामकथा के चौथे दिन कथा व्यास मोरारी बापू ने ‘मानस ऋषि पंचमी’ के माध्यम से ऋषि-मुनियों की साधना, प्रारब्ध और प्रभु-कृपा का वर्णन किया। कथा के बीच राधा नाम की धुन छिड़ते ही पूरा पंडाल ‘राधे-राधे’ के जयघोष से गूंज उठा और श्रद्धालु भक्ति में भावविभोर हो गए। बापू ने कहा कि ‘कृष्ण आश्रय हैं तो राधा अश्रु हैं’ और राधा नाम फल नहीं, बल्कि रस है। उन्होंने बच्चों को मोबाइल देते समय विवेक बरतने की सलाह दी। कथा में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र समेत विभिन्न प्रदेशों से पहुंचे श्रद्धालुओं के कारण स्थानीय पर्यटन और रोजगार गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला।
‘कृष्ण आश्रय हैं तो राधा अश्रु हैं’—बापू ने सुनाया राधा नाम का महात्म्य, गुजरात समेत कई राज्यों से पहुंचे श्रद्धालु
आगरा। फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड में करुणानिधान परिवार की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के चतुर्थ दिवस ‘मानस ऋषि पंचमी’ के अंतर्गत कथा व्यास मोरारी बापू ने श्रीरामचरितमानस के समस्त ऋषि-मुनियों को प्रणाम करते हुए कथा का शुभारंभ किया। रामचरितमानस की चौपाइयों के बीच जब बापू ने अचानक राधा नाम की धुन छेड़ी तो पूरा कथा पंडाल “राधे-राधे” के जयघोष से गूंज उठा। कथा के मध्य और विभिन्न प्रसंगों में बापू ने श्रद्धालुओं से राधा नाम का संकीर्तन कराया। देखते ही देखते वातावरण भक्ति, करुणा और प्रेम की ऐसी धारा में बदल गया कि अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
“कृष्ण आश्रय हैं तो राधा अश्रु हैं”
बापू ने कहा कि “कृष्ण आश्रय हैं तो राधा अश्रु हैं।” जब जीवन में कोई साथ देने वाला न हो, मन में आर्त भाव उठे, करुणा की पुकार भीतर से निकले और मनुष्य स्वयं को अकेला अनुभव करे, तब राधा नाम का स्मरण करना चाहिए। राधा जगदंबा हैं, श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं। राधा नाम लेने पर भगवान कृष्ण अपने भक्त को अपना कंधा प्रदान करते हैं।
ऋषि-मुनियों की विचारधारा अलग, परम भाव एक
‘मानस ऋषि पंचमी’ के विषय को आगे बढ़ाते हुए बापू ने कहा कि सभी ऋषि-मुनियों का समय, काल और विचारधारा अलग-अलग हो सकती है, लेकिन उनका परम भाव एक ही है—मनुष्य को उसके मूल तत्व और परमात्मा तक पहुंचाना। ऋषि-मुनियों की साधना का अंतिम लक्ष्य आत्मबोध और परमात्मा से मिलन ही है। उन्होंने कहा कि प्रारब्ध बलवान है। अयोध्याकांड में वशिष्ठ जी भरत जी को समझाते हैं कि हरि की इच्छा बलवान है। भविष्य और प्रारब्ध अपनी गति से चलते हैं।
पुराने समय में श्लोक-चौपाइयों से सजी कथा
बापू ने कथा परंपरा का स्मरण करते हुए कहा कि पुराने समय में कथाकार अपनी कथाओं में अधिक से अधिक श्लोक और चौपाइयों का वाचन करते थे। आज श्लोक और चौपाइयों की संख्या कम हुई है, लेकिन कथा का मूल भाव वही है। उन्होंने कहा कि रामचरितमानस के जितने भी वक्ता हैं, वे साधु-भाव से जुड़े हैं और साधुता का मूल विवेक में है।
“कृपा किसी पर भी हो सकती है”
बापू ने भगवान की कृपा का विस्तार समझाते हुए कहा कि कृपा केवल भक्तों तक सीमित नहीं है। भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया, लेकिन उसे परमधाम की प्राप्ति हुई—यह भी प्रभु की कृपा थी। युद्ध के बाद श्रीराम ने इंद्र से अपने सभी वानरों को जीवित करने का वर मांगा और कृपा वानर सेना के साथ रावण की सेना पर भी हुई।
“रामकथा अनंत जन्मों तक गानी है”
बापू ने भावपूर्ण अंदाज में कहा कि यदि उन्हें एक जन्म में रामकथा गाने का अवसर न मिले तो वे अनेक जन्मों तक रामकथा गाएंगे। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि भले ही वे उन्हें न पहचानें, लेकिन वे उनके प्रेम, उनकी सुगंध, उनके पराग और उनके जनों की यात्राओं को पहचानते रहेंगे।
बच्चों को मोबाइल दें, लेकिन विवेक के साथ
बच्चों के हाथों में मोबाइल देने के विषय पर बापू ने अभिभावकों को सावधान किया। उन्होंने कहा कि बच्चे चंचल और जिज्ञासु होते हैं। इसलिए यदि उन्हें मोबाइल दिया जाए तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसकी सामग्री उन्हें भ्रमित न करे और उनके संस्कारों पर विपरीत प्रभाव न पड़े।
गुजरात के प्रति जताया आभार, गोवर्धन में कथा का संकेत
बापू ने गुजरात के लोगों के प्रति विशेष आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आज वे जिस स्थान और प्रतिष्ठा पर हैं, उसमें गुजरात के लोगों का बहुत बड़ा आशीर्वाद है। आगरा के गुजराती समाज का भी उन्होंने आभार व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि आगरा के गुजराती समाज के अध्यक्ष सतीश शाह के आग्रह पर उन्होंने जतीपुरा, गोवर्धन में कथा करने की स्वीकृति दी है। इसकी तिथि शीघ्र निश्चित की जाएगी।
सुंदरकांड में नौ बार आया ‘सुंदर’
कथा के दौरान श्रद्धालुओं की प्रश्न-पत्रियों का उत्तर देते हुए बापू ने बताया कि सुंदरकांड का नाम सुंदरकांड क्यों पड़ा। उन्होंने कहा कि सुंदरकांड में ‘सुंदर’ शब्द नौ बार आता है और नौ का अंक अपने आप में पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद बापू शिव-सती विवाह और सती त्याग के प्रसंग में प्रवेश कर गए। कथा के दौरान वातावरण फिर राधे-राधे के संकीर्तन से गूंज उठा। बापू ने श्रद्धालुओं को जैसे आगरा से भावनात्मक रूप से बरसाना की ओर ले जाते हुए राधे नाम की धुन में भिगो दिया।
“राधा नाम फल नहीं, रस है”
बापू ने कहा कि राधा नाम फल नहीं, बल्कि रस है। भगवान श्रीकृष्ण फल की इच्छा पूरी कर सकते हैं, लेकिन श्रीराधा का नाम शाश्वत रस प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि हमारी पूरी परंपरा राधा-कृष्ण के मिलन और प्रेम की परंपरा है, लेकिन रामकथा में रामनाम का जाप भी उसी परम प्रेम की ओर ले जाता है।
“एक भरोसो, एक बल…” से मिला निर्भयता का संदेश
बापू ने तुलसीदास जी की पंक्ति “एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास” का स्मरण कराते हुए कहा कि जब मनुष्य का भरोसा भगवान पर हो जाता है तो भय समाप्त होने लगता है। श्रीराम ने सुग्रीव को भी अपने बल पर भरोसा रखने और चिंता छोड़कर निर्भीक होने का संदेश दिया था।
बढ़ा स्थानीय रोजगार
मोरारी बापू की कथा सुनने के लिए दो से 3000 लोग विभिन्न प्रदेशों गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि से पहुंचे हैं। कथा के बाद सभी श्रद्धालु आगरा और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन के लिए निकलते हैं जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार भी लोगों का बढ़ा है। ऑटो आदि के साथ विभिन्न स्टॉल भी कथा स्थल के बाहर लग रही हैं।