टिकट की आस में बदलने लगे सियासी ठिकाने, 2027 से पहले यूपी में तेज होगा दल-बदल का खेल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों में नेताओं के आने-जाने का सिलसिला तेज होने लगा है। अभी चुनाव में कई महीने बाकी हैं, लेकिन टिकट की दावेदारी, राजनीतिक भविष्य की चिंता और बदलते जातीय-सामाजिक समीकरणों ने नेताओं को अपने सियासी ठिकाने तलाशने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी के तीन विधायकों का भाजपा में जाना और पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप का भाजपा छोड़कर सपा में शामिल होना इस बदलते राजनीतिक माहौल की ताजा मिसाल है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूर्व मंत्री साहब सिंह सैनी और चौधरी नीरपाल सिंह की सपा में वापसी की तैयारी भी इसी सिलसिले की अगली कड़ी मानी जा रही है।
दरअसल, विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल उत्तर प्रदेश की राजनीति का पुराना चलन रहा है। चुनाव नजदीक आते ही उन नेताओं की सक्रियता बढ़ जाती है, जिन्हें अपने मौजूदा दल में टिकट मिलने की उम्मीद कमजोर दिखाई देने लगती है। कुछ नेता राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते तो कुछ अपने सामाजिक और क्षेत्रीय प्रभाव के आधार पर नए दल में संभावनाएं तलाशते हैं। कई बार पार्टी बदलने के पीछे वैचारिक मतभेद सामने रखे जाते हैं, लेकिन चुनावी राजनीति में टिकट और राजनीतिक भविष्य की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
2022 में भी चुनाव से पहले हुआ था बड़ा उलटफेर
पिछले विधानसभा चुनाव का घटनाक्रम इसका बड़ा उदाहरण है। 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा सरकार में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी ने भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया था। इनके साथ भाजपा के कई विधायक भी सपा में चले गए थे। इसी तरह दारा सिंह चौहान ने भी भाजपा छोड़कर सपा का रुख किया था। दूसरी ओर कांग्रेस की विधायक अदिति सिंह भाजपा में शामिल हुई थीं। उस समय दल-बदल के पीछे पिछड़े वर्गों के राजनीतिक समीकरण और चुनावी टिकट की संभावनाएं भी चर्चा में रही थीं।
हालांकि, पार्टी बदलने वाले सभी नेताओं को चुनाव में सफलता नहीं मिली। 2022 के चुनाव में 21 चर्चित दलबदलू नेताओं में से केवल चार ही विधानसभा पहुंच सके थे। स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी जैसे बड़े नामों को भी हार का सामना करना पड़ा था। इससे साफ है कि दल बदलने से राजनीतिक संभावनाएं जरूर बनती हैं, लेकिन मतदाताओं का समर्थन अपने आप हासिल नहीं हो जाता।
अब भाजपा और सपा दोनों में दिख रही आवाजाही
2027 के चुनाव से पहले दल-बदल का सिलसिला दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों में दिखाई देने लगा है। 14 अक्टूबर को समाजवादी पार्टी के तीन विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए। तीनों विधायक 2022 में सपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। दूसरी तरफ पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने 27 अक्टूबर को भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली।
अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूर्व कैबिनेट मंत्री साहब सिंह सैनी और राष्ट्रीय लोकदल के खेल प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय प्रभारी चौधरी नीरपाल सिंह के दिवाली के बाद सपा में लौटने की तैयारी है। दोनों नेता इसकी पुष्टि कर चुके हैं। सैनी समाज के प्रभावशाली चेहरे माने जाने वाले साहब सिंह सैनी जुलाई 2023 में भाजपा में शामिल हुए थे, जबकि नीरपाल सिंह रालोद में सक्रिय थे। इन दोनों की संभावित वापसी को पश्चिमी यूपी में सपा के संगठनात्मक और सामाजिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।
टिकट का गणित खोलेगा दल-बदल का अगला दौर
राजनीतिक दलों में अभी से विधानसभा सीटों पर दावेदारों की संख्या बढ़ रही है। जिन सीटों पर मौजूदा विधायकों की दावेदारी मजबूत है, वहां दूसरे नेताओं के लिए टिकट की गुंजाइश कम हो सकती है। ऐसे में लंबे समय से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे नेता अपने लिए दूसरे दलों में संभावनाएं तलाश सकते हैं। यही स्थिति उन नेताओं की भी है, जिन्हें पार्टी नेतृत्व से अपेक्षित महत्व या भविष्य में राजनीतिक भूमिका मिलने की उम्मीद नहीं है।
भाजपा, सपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल सहित सभी दलों में टिकट के दावेदारों का अपना-अपना गणित है। चुनाव की तारीखें नजदीक आने और संभावित प्रत्याशियों के नामों पर मंथन शुरू होने के साथ यह खींचतान और बढ़ सकती है।
फिलहाल जो तस्वीर उभर रही है, उसमें 2027 का विधानसभा चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं के लिए भी अपने राजनीतिक भविष्य का फैसला करने का समय होगा। आने वाले दिनों में कई और नेताओं के पाला बदलने की चर्चाएं सामने आ सकती हैं। चुनावी मौसम में दलों के दरवाजे खुलेंगे और टिकट की उम्मीद में नेताओं के सियासी ठिकाने बदलने का सिलसिला तेज होने की संभावना है।