जीत के जश्न में खतरे की घंटी सुन पाएगी भाजपा? वाराणसी से नागपुर तक विपक्ष की दस्तक- 2027 से पहले भाजपा के लिए आत्ममंथन का वक्त!
चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों में भाजपा और एनडीए की बढ़त के बावजूद उत्तर प्रदेश में सपा की पांच सीटों पर जीत, वाराणसी में विपक्ष की सफलता और नागपुर में कांग्रेस की वापसी ने भाजपा के सामने 2027 से पहले आत्ममंथन की चुनौती खड़ी कर दी है। कर्नाटक में गठबंधन की जीत और बिहार में जन सुराज की दस्तक के बीच भाजपा को समझना होगा कि मजबूत संगठन और मोदी का चेहरा हर चुनाव में जीत की गारंटी नहीं हैं। विपक्ष की बढ़ती राजनीतिक जमीन, स्थानीय नाराजगी और बदलते सामाजिक समीकरणों को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है।
-बृज खंडेलवाल-
चुनाव जीते हैं तो जश्न मनाइए, लेकिन जीत के नशे में चूर मत हो जाइए। राजनीति में आज का किला कल ढह भी सकता है। चार राज्यों; उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और बिहार, के विधान परिषद चुनावों ने भाजपा और उसके सहयोगियों को यही पैगाम दिया है।
एनडीए ने 28 में से 16 सीटें जीतकर बढ़त जरूर बनाई है, लेकिन इस जीत के भीतर कुछ ऐसे संकेत छिपे हैं जिन्हें नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। भाजपा ने अकेले 13 सीटें जीतीं। समाजवादी पार्टी को पांच, शरद पवार की एनसीपी (एसपी) को दो, कांग्रेस, जेडी(एस), जेडी(यू), आरजेडी, शिवसेना और जन सुराज पार्टी को एक-एक सीट मिली। दो निर्दलीय भी जीते।
पहली नजर में यह भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की कामयाबी है। लेकिन सियासत का हिसाब सिर्फ सीटों से नहीं लगाया जाता।
वाराणसी में मोदी के गढ़ को चुनौती
उत्तर प्रदेश में भाजपा को 11 में से छह सीटें मिलीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीत लीं। सबसे चौंकाने वाली बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की है। यहां सपा ने शिक्षक (लाल बिहारी यादव) और स्नातक (आशुतोष सिन्हा), दोनों सीटों पर जीत दर्ज की। आगरा-अलीगढ़ शिक्षक सीट पर भी सपा ने भाजपा को मात दी। इलाहाबाद-झांसी स्नातक और लखनऊ स्नातक सीटें भी सपा के खाते में गईं।
यह महज कुछ सीटों का मामला नहीं है। अखिलेश यादव के लिए यह मनोवैज्ञानिक बढ़त है। वे इसे अपने पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण की कामयाबी बता रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा को इससे नया हौसला मिलेगा।
भाजपा को समझना होगा कि मोदी के नाम पर हर चुनाव जीतने की गारंटी नहीं मिलती। स्थानीय नाराजगी, उम्मीदवारों की साख और सामाजिक समीकरण भी मायने रखते हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस को बड़ा झटका
कर्नाटक में भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन ने चारों सीटें जीतकर कांग्रेस सरकार को करारा राजनीतिक झटका दिया। बेंगलुरु शिक्षक सीट पर जेडी(एस) के ए.पी. रंगनाथ ने कांग्रेस के पुराने नेता पुट्टन्ना को हराया। इससे भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन की साझा ताकत सामने आई है।
नागपुर ने भाजपा के लिए असहज संदेश भेजा
महाराष्ट्र में कांग्रेस ने नागपुर स्नातक सीट बरकरार रखी। कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को करीब 3,271 वोटों से हराया। नागपुर सिर्फ एक शहर नहीं, भाजपा और संघ परिवार के लिए खास सियासी अहमियत रखता है। यहां कांग्रेस की जीत प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। इसे भाजपा के लिए आत्ममंथन का संकेत माना जा सकता है। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी ने पांच में से तीन सीटें हासिल कीं।
बिहार में नए खिलाड़ी की दस्तक
बिहार में मुकाबला बिखरा रहा। भाजपा ने तीन सीटें जीतीं। जेडी(यू), आरजेडी और जन सुराज को एक-एक सीट मिली। दो निर्दलीय भी विजयी हुए। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने दरभंगा शिक्षक सीट जीतकर विधान परिषद में अपना खाता खोला। यह नए राजनीतिक विकल्पों के लिए खुलती जगह का संकेत है।
भाजपा का अति-आत्मविश्वास कहीं भारी न पड़ जाए
भाजपा की एक बड़ी चुनौती उसका बढ़ता आत्मविश्वास भी है। लगातार चुनावी कामयाबी के बाद पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हो सकती है कि मोदी का चेहरा, संगठन और चुनावी मशीनरी हर चुनौती को पार कर लेंगे। लेकिन लोकतंत्र में कोई भी पार्टी अपराजेय नहीं होती। सत्ता का अहंकार कार्यकर्ताओं और जनता के बीच दूरी बढ़ा सकता है। स्थानीय नेताओं की अनदेखी, टिकट वितरण में मनमानी और जनता की शिकायतों को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। विपक्ष की हर जीत को साजिश या संयोग बताकर खारिज करना भी समझदारी नहीं है। आखिरकार जनता को भाषण नहीं, काम चाहिए।
एक और दिलचस्प पहलू है। ये चुनाव बैलेट पेपर से हुए। भाजपा नेतृत्व ने इसे ईवीएम पर विपक्ष के सवालों का जवाब बताया है। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद सोशल मीडिया पर कांग्रेस के शून्य प्रदर्शन पर तंज कसा। लेकिन चुनावी भरोसे की बहस केवल एक चुनाव के नतीजे से खत्म नहीं होती।
विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक मतदाता आम चुनावों के पूरे जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करते। फिर भी उनके रुझान कुछ सामाजिक और राजनीतिक बदलावों की आहट दे सकते हैं।
2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सामने है। भाजपा के पास मजबूत संगठन और सत्ता का अनुभव है। लेकिन सपा ने चुनौती की जमीन तलाशनी शुरू कर दी है।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि भाजपा कितनी सीटें जीती। सवाल यह है कि इन नतीजों से वह कितना सबक लेती है। क्योंकि सियासत में जीत का जश्न मनाने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि जनता का मिजाज बदलते देर नहीं लगती।
आखिर लोकतंत्र में कोई भी गढ़ हमेशा के लिए अभेद्य नहीं होता।