वैदिक भारत की गहराइयों में: मथुरा सीमा से सटे बहज गांव में मिले महाभारत कालीन सभ्यता के अद्वितीय पुरावशेष
मथुरा जिले की सीमा से सटे भरतपुर (राजस्थान) जिले के बहज गांव की पुरातत्व विभाग द्वारा की जा रही खुदाई में मिल रहे पुरावशेष भारतीय इतिहास के उस पक्ष को उजागर कर रही है, जो अब तक केवल ग्रंथों में सीमित था। अब यह प्रमाणित हो रहा है कि ब्रज क्षेत्र न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी संस्कृति की आदिम भूमि रहा है।
-सीपी सिंह सिकरवार-
मथुरा। राजस्थान के डीग (भरतपुर) स्थित बहज गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जयपुर सर्किल द्वारा की जा रही खुदाई में महाभारत काल से भी पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं। खुदाई में मिले यज्ञकुंड, शक्ति पूजन टैंक, ब्राह्मी लिपि की मुहरें, मातृदेवी की मूर्ति, तांबे-चांदी के सिक्के और पेलियोचैनल जैसी खोजें न सिर्फ इस स्थल की प्राचीनता प्रमाणित करती हैं, बल्कि ब्रज क्षेत्र के सांस्कृतिक वैभव को भी उजागर करती हैं।
मथुरा की सीमा से सटा है भरतपुर का बहज गांव
बहज गांव मथुरा से सटे राजस्थान के भरतपुर जिले की डीग तहसील के अंतर्गत आता है। मथुरा जिले के सौंख कस्बे से इस गांव की दूरी मात्र चार किलोमीटर है। उत्खनन कार्य की शुरुआत 10 जनवरी 2024 से शुरू हुई थी जो अब भी लगातार जारी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जयपुर सर्किल के अधीक्षक विनय कुमार गुप्ता इस उत्खनन कार्य का नेतृत्व कर रहे हैं।
पांच ऐतिहासिक कालखंडों के पुरावशेष मिले
बहज गांव में खुदाई से अब तक मिले पुरावशेषों में महाभारत काल (द्वापर युग) के अलावा महाजनपद काल, मौर्य काल, शुंग काल और कुषाण काल के हैं। इन पांचों कालखंडों के संस्कृति, धर्म, और वाणिज्यिक जीवन के प्रमाण बहज की धरती से प्राप्त हुए हैं।
पेलियोचैनल और वैदिक सरस्वती नदी से संबंध
20–23 मीटर गहराई पर मिली एक सूखे नदी प्रवाह-मिट्टी की गहरी परतें (पेलियोचैनल) की संरचना वैदिक कालीन सरस्वती नदी से जोड़ी जा रही है। यह वैदिक भूगोल के पुनर्निर्माण में महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है।
अब तक इन खास पुरावशेषों की खोज
-मातृदेवी की मौर्यकालीन मूर्ति का सिर।
-अश्विनी कुमारों की टेराकोटा मूर्ति (शुंग युग)।
-ढाई हजार वर्ष पुराना यज्ञकुंड और शक्ति पूजन टैंक।
-ब्राह्मी लिपि की मुद्राएँ और मुहरें।
-काले मणिक्य, हड्डी से बने आभूषण और हड्डियों के औजार।
-कुषाणकालीन चांदी-तांबे के सिक्के।
ये सभी अवशेष इस स्थान को धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र सिद्ध करते हैं।
संरक्षण एवं संग्रहालय योजना
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संगठन ने इस खुदाई के बारे में संस्कृति मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। बहज स्थल की महत्ता को देखते हुए डीग संग्रहालय के ‘नंद भवन’ में एक स्थायी गैलरी स्थापित की जा रही है, जहां जनसामान्य इन खोजों को देख सकेंगे। कार्बन डेटिंग और वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रक्रिया प्रारंभिक चरण में है।
ये खोजें स्कंद पुराण में वर्णित दीर्घपुर से जुड़ाव दर्शा रहीं
बहज गांव की यह खोज स्कंद पुराण में वर्णित 'दीर्घपुर' और महाभारत में वर्णित क्षेत्रीय संकेतों से साम्य को भी दर्शाती है। यह खोज ब्रज क्षेत्र के वैदिक और महाभारतीय इतिहास को पुष्ट करने वाली संभवत: सबसे ठोस भौगोलिक-सांस्कृतिक कड़ी है।