सरकार के तीन नए विधेयक होंगे ऐतिहासिक,  परिसीमन आयोग की शक्तियां बढ़ेंगी,  लोकसभा में होंगी 850 सीटें, परिसीमन के लिए जनगणना का पेच खत्म

लोकसभा में पेश होने वाले तीन ऐतिहासिक विधेयक भारत की संसदीय प्रणाली में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव लाने जा रहे हैं। इन विधेयकों के जरिए लोकसभा की सदस्य संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि परिसीमन को अब हर जनगणना की बाध्यता से मुक्त कर दिया गया है, जिससे 33% महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। परिसीमन आयोग अब एक नए और शक्तिशाली अवतार में होगा, जो जनसंख्या के बदलते पैटर्न और शहरीकरण के आधार पर सीटों का नए सिरे से निर्धारण करेगा।

Apr 14, 2026 - 19:32
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सरकार के तीन नए विधेयक होंगे ऐतिहासिक,  परिसीमन आयोग की शक्तियां बढ़ेंगी,  लोकसभा में होंगी 850 सीटें, परिसीमन के लिए जनगणना का पेच खत्म


नई दिल्ली। भारतीय संसदीय इतिहास में 16 से 18 अप्रैल 2026 का समय स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होने जा रहा है। लोकसभा में सांसदों के बीच सर्कुलेट किए गए तीन नए विधेयकों ने साफ कर दिया है कि देश एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। ये विधेयक न केवल संसद के स्वरूप को बदलेंगे, बल्कि देश के हर नागरिक के प्रतिनिधित्व की परिभाषा को भी नए सिरे से परिभाषित करेंगे। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा लोकसभा की सीटों की संख्या का है, जो अब बढ़कर 850 होने वाली है।
 
वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों पर चुनाव होते हैं, जो 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई थीं। लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से सांसदों की संख्या बढ़ाई जाए। सरकार द्वारा लाए जा रहे ‘संवैधानिक संशोधन बिल (131वां संशोधन)’ के जरिए अनुच्छेद 81 में बड़ा बदलाव किया जा रहा है।

नए प्रावधानों के मुताबिक, राज्यों से चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या 815 तक हो सकती है। इसके अलावा, केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 35 कर दी गई है। यह विस्तार इसलिए जरूरी हो गया था क्योंकि कई लोकसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या 25 से 30 लाख तक पहुंच गई है, जिससे एक सांसद के लिए अपने क्षेत्र का विकास करना और जनता से जुड़ना मुश्किल हो रहा था।

पहला है ‘संविधान (131वां संशोधन) बिल, 2026’. इसके जरिए अनुच्छेद 81 में लोकसभा की संरचना को बदला जा रहा है। अब ‘जनसंख्या’ का मतलब केवल नवीनतम जनगणना नहीं होगा, बल्कि संसद द्वारा अधिसूचित जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा।

दूसरा बड़ा बदलाव अनुच्छेद 82 में है। अब तक की व्यवस्था यह थी कि ‘हर जनगणना के बाद’ स्वतः ही परिसीमन की प्रक्रिया शुरू हो जाती थी. लेकिन नए बिल ने इस ‘स्वतः जुड़ाव’ को हटा दिया है। अब परिसीमन कब और कैसे होगा, यह संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और परिसीमन आयोग की शक्तियों द्वारा तय किया जाएगा।

इसी तरह, अनुच्छेद 170 में बदलाव कर राज्य विधानसभाओं के लिए भी जनसंख्या की नई परिभाषा तय की गई है।

इस पूरे विधायी बदलाव का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा ‘महिला आरक्षण’ है। 106वें संशोधन अधिनियम, 2023 के जरिए महिलाओं को 33% आरक्षण देने का वादा किया गया था, लेकिन शर्त यह थी कि यह अगली जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा। विपक्ष और कई संगठन इसे ‘देरी की रणनीति’ बता रहे थे।

लेकिन अब, इन नए बिलों के जरिए सरकार ने मास्टरस्ट्रोक खेला है। महिला आरक्षण कानून को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के चक्र से अलग कर दिया गया है। अब इसे सीधे तौर पर परिसीमन आयोग की कार्यवाही से जोड़ दिया गया है।

यानी, जैसे ही परिसीमन आयोग अपनी रिपोर्ट सौंपेगा और नई सीटों का निर्धारण होगा, वैसे ही 33% आरक्षण लागू हो जाएगा। यह आरक्षण लोकसभा, सभी राज्य विधानसभाओं, दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं में प्रभावी होगा।

‘परिसीमन विधेयक, 2026’ वह तीसरा स्तंभ है जिस पर नए भारत की चुनावी संरचना टिकी है। इस बिल के माध्यम से एक शक्तिशाली परिसीमन आयोग के गठन का मार्ग प्रशस्त किया गया है। इस आयोग की संरचना बेहद उच्च स्तरीय रखी गई है। इसमें अध्यक्ष- सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड या मौजूदा जज, सदस्य- मुख्य निर्वाचन आयुक्त या उनके द्वारा नामित निर्वाचन आयुक्त और राज्य प्रतिनिधि- संबंधित राज्य का राज्य निर्वाचन आयुक्त होंगे। 

आयोग के पास एक सिविल कोर्ट की शक्तियां होंगी। यह गवाहों को बुला सकता है, सरकारी रिकॉर्ड की मांग कर सकता है और ‘जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम’ विशेषज्ञों की मदद ले सकता है। यह आयोग ही तय करेगा कि 850 सीटों का बंटवारा राज्यों के बीच किस आधार पर होगा।