मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, मोहब्बत और एहसासों की शायरी का एक दौर खत्म
प्रसिद्ध उर्दू शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में निधन हो गया। वे लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से जूझ रहे थे। अपनी सरल, भावनात्मक और रूमानी गजलों के लिए मशहूर बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को नई पहचान दी। अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र को साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 1999 में पद्मश्री सम्मान मिला था। उनके निधन पर साहित्य और कला जगत में शोक की लहर है।
भोपाल। उर्दू शायरी की दुनिया से गुरुवार को एक बेहद दुखद खबर सामने आई। अपनी गजलों और दिल को छू लेने वाले अशआर से करोड़ों लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे। 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने भोपाल में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य, शायरी और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि एहसासों को अल्फाज देने वाली एक ऐसी आवाज थे, जिसने मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और इंसानी जज्बात को बेहद सादगी और खूबसूरती से लोगों तक पहुंचाया। उनकी गजलें आज भी मुशायरों, महफिलों और लोगों की जुबान पर जिंदा हैं।
जावेद अख्तर ने जताया शोक
बशीर बद्र के निधन पर देश के प्रसिद्ध गीतकार और शायर जावेद अख्तर ने गहरा दुख जताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा “उर्दू आज और गरीब हो गई। नायाब शायर बशीर बद्र हमेशा के लिए रुखसत हो गए। उनकी शायरी हमारी यादों में हमेशा जिंदा रहेगी।” जावेद अख्तर का यह बयान बताता है कि बशीर बद्र सिर्फ पाठकों के ही नहीं, बल्कि शायरी की दुनिया के बड़े नामों के लिए भी कितने खास थे।
अयोध्या से अलीगढ़ तक का सफर
बशीर बद्र का पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की और वहीं से पीएचडी पूरी की। बाद में वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफेसर बने। साहित्य और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान बेहद अहम माना जाता है। उन्होंने उर्दू गजल को आम लोगों की भाषा और एहसासों से जोड़कर नई पहचान दी।
आसान अल्फाज में गहरी बात कहने का हुनर
बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे बेहद सरल शब्दों में दिल की गहरी बात कह देते थे। उनकी गजलों में आम बोलचाल की भाषा, मोहब्बत का दर्द, रिश्तों की नर्मी और जिंदगी की सच्चाइयों की झलक मिलती थी। उनके कई शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। जैसे “अगर तलाश करूं कोई मिल ही जाएगा,
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा।”
और उनका एक बेहद मशहूर शेर—
“आदमी की उम्र गुजर जाती है एक मकान बनाने में,
तुम देर नहीं करते बस्तियां जलाने में।” इन अशआर ने उन्हें घर-घर तक पहुंचाया।
भारत-पाक रिश्तों पर भी लिखे यादगार शेर
बशीर बद्र ने सिर्फ मोहब्बत ही नहीं, बल्कि समाज और इंसानी रिश्तों पर भी गहरी शायरी की। भारत-पाकिस्तान संबंधों पर लिखा उनका मशहूर शेर आज भी अक्सर उद्धृत किया जाता है “दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों।” कहा जाता है कि शिमला समझौते के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को यही शेर सुनाया था।
पद्मश्री से हुए सम्मानित
उर्दू साहित्य और गजल लेखन में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1999 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा था। यह सम्मान उनकी साहित्यिक यात्रा और शायरी की लोकप्रियता का बड़ा प्रमाण माना जाता है।
भोपाल में बसाया नया आशियाना
जीवन के कठिन दौर में भोपाल ने बशीर बद्र को नया सहारा दिया। यहीं उनकी मुलाकात डॉक्टर राहत से हुई, जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। उन्होंने मुश्किल वक्त में बशीर बद्र का साथ दिया और उन्हें फिर से सामान्य जीवन की ओर लौटने की ताकत दी। भोपाल में रहते हुए उन्होंने एक बार फिर अपनी कलम को जिंदा किया और मोहब्बत के एहसासों को नए शब्द दिए। वे अक्सर मुस्कुराते हुए कहा करते थे “खुदा ने मुझे गजलों का एक खूबसूरत शहर बख्शा है, और मैं इस पूरी सल्तनत को मोहब्बत के नाम करता हूं।”
हमेशा जिंदा रहेंगी बशीर बद्र की गजलें
बशीर बद्र का जाना सिर्फ एक शायर का जाना नहीं, बल्कि उर्दू अदब के एक पूरे दौर का खत्म होना माना जा रहा है। उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों को मोहब्बत, इंसानियत और रिश्तों की अहमियत सिखाती रहेगी। वे भले इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनके अल्फाज हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे।