‘कुछ भी हो सकता है’ में अनुपम खेर ने जीता आगरा का दिल, बोले- अगर एक लंगोटी वाला आदमी देश आजाद करा सकता है, तो सपने भी पूरे हो सकते हैं

आगरा। अभिनेता अनुपम खेर ने अपने बहुचर्चित एकल नाट्य शो ‘कुछ भी हो सकता है’ के जरिए आगरा के दर्शकों को भावनाओं, संघर्ष, हास्य और प्रेरणा के अनोखे सफर पर ले जाकर मंत्रमुग्ध कर दिया। सूरसदन प्रेक्षागृह में आयोजित इस विशेष प्रस्तुति में शहर के कला प्रेमियों, बुद्धिजीवियों और गणमान्य नागरिकों की भारी भीड़ उमड़ी। कार्यक्रम का आयोजन स्पाइसी शुगर संस्था द्वारा किया गया।

May 26, 2026 - 19:55
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‘कुछ भी हो सकता है’ में अनुपम खेर ने जीता आगरा का दिल, बोले- अगर एक लंगोटी वाला आदमी देश आजाद करा सकता है, तो सपने भी पूरे हो सकते हैं
सूरसदन प्रेक्षागृह में अपने चर्चित नाट्य शो ‘कुछ भी हो सकता है’  के जरिए अपनी बात कहते अभिनेता अनुपम खेर।

कार्यक्रम की शुरुआत पूनम सचदेवा के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि यह केवल एक नाटक नहीं बल्कि जिंदगी को देखने का नजरिया है। इसके बाद डॉ. रंजना बंसल ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। मंच संचालन पावनी और चांदनी ने किया।

शो की शुरुआत बेहद अलग अंदाज में हुई। जैसे ही प्रेक्षागृह की लाइट बंद हुई, अचानक अनुपम खेर दर्शकों के बीच साइड गेट से सामान्य व्यक्ति की तरह प्रवेश करते दिखाई दिए। मंच पर पहुंचते ही उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा- ‘आगरा के सारे गुड लुकिंग लोग आ गए।‘ उनके इस संवाद पर पूरा सभागार तालियों और ठहाकों से गूंज उठा।

पूरे शो के दौरान अनुपम खेर ने हास्य, संवेदना और आत्मकथात्मक प्रसंगों के जरिए दर्शकों को लगातार बांधे रखा। उन्होंने बताया कि 21 वर्ष पहले शुरू हुए इस शो का आगरा में 501वां मंचन हुआ और संयोग से 25 मई को ही उनके फिल्मी करियर के 42 वर्ष भी पूरे हुए।

उन्होंने अपने बचपन, स्कूल जीवन, पहली गर्लफ्रेंड, पहले प्यार और संघर्षों को बेहद सहज और भावुक अंदाज में साझा किया। उन्होंने बताया कि अभिनय सीखने के लिए जब पहली बार चंडीगढ़ के एक्टिंग स्कूल पहुंचे तो महिला पात्र की एक्टिंग कर उन्हें प्रवेश मिला। मां के मंदिर से 100 रुपये चुराकर घर से निकलने का किस्सा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि वही साहस उन्हें आगे बढ़ाता गया।

अनुपम खेर ने बताया कि 27 जुलाई 1974 को वह शिमला छोड़कर थिएटर सीखने निकल पड़े थे। शुरुआत में उन्हें कहा गया कि उन्हें मंच पर चलना तक नहीं आता, लेकिन लगातार मेहनत और समर्पण के दम पर वही छात्र बाद में गोल्ड मेडल लेकर निकला। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के संघर्षपूर्ण दिनों और थिएटर के प्रति अपने समर्पण का भी विस्तार से जिक्र किया।

संघर्ष के दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि 3 जून 1981 को अपनी गर्लफ्रेंड के प्रोत्साहन से मुंबई पहुंचे, लेकिन वहां महीनों तक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। फिल्म ‘गांधी’ में नेहरू की भूमिका मिलने के बाद भी रोल किसी और को दे दिया गया। आर्थिक संकट, असफलताएं और टूटते रिश्तों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

उन्होंने बताया कि फिल्म ‘सारांश’ उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी। मात्र 28 वर्ष की उम्र में 65 वर्षीय वृद्ध का किरदार निभाने के लिए उन्होंने अपना सिर मुंडवाया और छह महीने तक लगातार तैयारी की। यही भूमिका उन्हें हिंदी सिनेमा में नई पहचान दिलाने वाली साबित हुई।

अनुपम खेर ने अपने करियर के उतार-चढ़ावों का भी खुलकर जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सफलता मिलने के बाद उन्होंने एक सप्ताह में 57 फिल्में साइन कर ली थीं। इस दौरान घमंड भी आया, लेकिन अमिताभ बच्चन की सहजता और व्यवहार ने उन्हें दोबारा जमीन से जोड़ दिया। उन्होंने दिलीप कुमार, संजीव कुमार, सतीश कौशिक, मुकुल आनंद, मनमोहन देसाई और अपने दादाजी को भी भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।

उन्होंने बताया कि लगातार काम के दबाव के कारण उनका चेहरा तक प्रभावित हो गया था और दो महीने तक इलाज चला। इसके बाद विशेष बच्चों के साथ बिताया गया समय उनके जीवन का सबसे सकारात्मक अध्याय बन गया। उन्होंने कहा कि हर बुधवार उन बच्चों के स्कूल जाना उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख बन गया।

अपने प्रोडक्शन हाउस, कर्ज, असफलताओं और चेक बाउंस जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए अनुपम खेर ने कहा कि जिंदगी में ऐसे दौर भी आते हैं जब सारे रास्ते बंद नजर आते हैं, लेकिन समय हमेशा बदलता है। बाद में निर्देशन, अभिनय और नए प्रोजेक्ट्स के जरिए उन्होंने खुद को फिर स्थापित किया।

पूरे शो के दौरान वह बार-बार यही संदेश देते रहे कि लाइफ में कुछ भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि यदि एक लंगोटी वाला आदमी देश को आजादी दिला सकता है, तो कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है।

कार्यक्रम में डीआईजी शैलेश पांडे, वाई. के. गुप्ता, मधु बघेल, शलभ गुप्ता सहित शहर की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।

SP_Singh AURGURU Editor