क्या कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की पटकथा तैयार हो चुकी है? दिल्ली दरबार ने सिद्धारमैया को कौन सा प्रस्ताव दिया और क्या अब डीके शिवकुमार की बारी आने जा रही?

कर्नाटक का नेतृत्व संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान के साथ हुई बैठकों के बाद सत्ता परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाने के लिए सिद्धारमैया को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका देकर राज्यसभा भेजने और डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने के विकल्प पर विचार कर रहा है। हालांकि पार्टी ने आधिकारिक तौर पर किसी बदलाव की पुष्टि नहीं की है, लेकिन राजनीतिक संकेत बताते हैं कि कर्नाटक कांग्रेस में सत्ता हस्तांतरण को लेकर गंभीर रणनीति तैयार की जा चुकी है।

May 27, 2026 - 13:37
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क्या कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की पटकथा तैयार हो चुकी है? दिल्ली दरबार ने सिद्धारमैया को कौन सा प्रस्ताव दिया और क्या अब डीके शिवकुमार की बारी आने जा रही?

कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां सत्ता, संतुलन और समझौते की राजनीति खुलकर सामने आने लगी है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिव कुमार के बीच लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान अब निर्णायक चरण में पहुंचती नजर आ रही है। दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान के साथ हुई बैठकों के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा बेहद तेज हो गई है कि कांग्रेस नेतृत्व ने सत्ता हस्तांतरण का फार्मूला लगभग तय कर लिया है।

हालांकि कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक संकेत साफ बताते हैं कि पार्टी अब कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर गंभीर मंथन कर चुकी है। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के साथ हुई बैठकों में केवल औपचारिक राजनीतिक चर्चा नहीं हुई, बल्कि सत्ता संतुलन और भविष्य की रणनीति पर गहराई से विचार किया गया।

दरअसल 2023 में कांग्रेस की सरकार बनने के समय से ही यह चर्चा रही कि मुख्यमंत्री पद को लेकर ढाई-ढाई साल का एक आंतरिक समझौता हुआ था। कांग्रेस ने सार्वजनिक तौर पर कभी इस फार्मूले को स्वीकार नहीं किया, लेकिन पार्टी के भीतर यह बात लगातार राजनीतिक सच की तरह घूमती रही। अब जब सरकार अपने कार्यकाल के मध्य चरण को पार कर चुकी है, तो वही पुराना फार्मूला फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है।

दिलचस्प बात यह है कि पिछले कुछ महीनों से डीके शिवकुमार लगातार संकेतों वाली राजनीति कर रहे थे। उनके बयान- ‘समय जवाब देगा’ और ‘कुछ भी छिपा नहीं है’ — यह बताते रहे कि अंदरखाने कोई बड़ी बातचीत चल रही है। दूसरी ओर सिद्धारमैया लगातार सार्वजनिक मंचों पर दोनों नेताओं के रिश्तों को सामान्य बताते रहे, लेकिन दिल्ली दौरे ने साफ कर दिया कि मामला केवल अफवाहों तक सीमित नहीं है।

कांग्रेस नेतृत्व लंबे समय तक ढाई-ढाई साल के कथित सत्ता फार्मूले पर डीके शिव कुमार को को यह भरोसा दिलाकर पीछे हटता रहा कि अगले विधानसभा चुनाव के बाद बनने वाली सरकार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा वही होंगे। लेकिन डीके शिवकुमार शायद यह राजनीतिक सच अच्छी तरह समझ चुके थे कि यदि इस बार मुख्यमंत्री बनने का मौका हाथ से निकल गया, तो भविष्य में उनके लिए यह राह और कठिन हो सकती है। यही कारण है कि उन्होंने पिछले कई महीनों से पार्टी नेतृत्व पर लगातार राजनीतिक दबाव बनाए रखा और सत्ता हस्तांतरण के मुद्दे को ठंडा नहीं पड़ने दिया।

सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व अब ऐसा समाधान तलाश रहा है जिसमें दोनों नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता बनी रहे। सिद्धारमैया को राष्ट्रीय राजनीति में लाकर राज्यसभा भेजने और आगे चलकर राज्यसभा में विपक्ष का नेता बनाने का प्रस्ताव इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कांग्रेस जानती है कि सिद्धारमैया केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि कर्नाटक में ओबीसी और ग्रामीण राजनीति का बड़ा चेहरा हैं। वहीं डीके शिवकुमार संगठन, संसाधन प्रबंधन और चुनावी रणनीति के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते हैं।

यही कांग्रेस की सबसे बड़ी मजबूरी भी है। पार्टी न तो सिद्धारमैया को अचानक किनारे कर सकती है और न ही डीके शिवकुमार को ज्यादा समय तक इंतजार में रख सकती है। यदि ऐसा होता है तो कर्नाटक कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ सकता है। इसलिए अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हाईकमान ने सत्ता परिवर्तन का रास्ता निकालते हुए सिद्धारमैया के लिए सम्मानजनक दिल्ली शिफ्ट का विकल्प तैयार किया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्धारमैया की उम्र और अनुभव को देखते हुए राज्यसभा में बड़ी भूमिका उनके लिए सम्मानजनक राजनीतिक विदाई का मार्ग भी बन सकती है। यदि उन्हें विपक्ष के नेता जैसी जिम्मेदारी मिलती है तो कांग्रेस दक्षिण भारत से एक अनुभवी और आक्रामक संसदीय चेहरा भी हासिल कर लेगी। दूसरी ओर डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी कर्नाटक में संगठनात्मक ऊर्जा और संसाधन क्षमता को मजबूत करना चाहती है।

हालांकि कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने अब भी नेतृत्व परिवर्तन की खबरों को सिर्फ अटकल बताया है, लेकिन राजनीति में अक्सर सबसे बड़े फैसले पहले अफवाह बनकर ही बाहर आते हैं। फिलहाल कर्नाटक की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस सत्ता संतुलन बचा पाएगी या नेतृत्व परिवर्तन नया शक्ति संघर्ष पैदा करेगा?

एक बात तय मानी जा रही है कि दिल्ली में हुई बैठकों के बाद कर्नाटक कांग्रेस की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहने वाली।

SP_Singh AURGURU Editor