बंगाल का सत्ता संग्राम: टीएमसी-भाजपा के बीच नैरेटिव, सामाजिक समीकरण और वोट संरचना की निर्णायक जंग

बंगाल विधानसभा चुनाव इस बार बेहद जटिल और तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच आमने-सामने के मुकाबले में बदलता दिख रहा है। टीएमसी प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सरकार बनाने के लिए हर पैंतरा अपना रही हैं तो भाजपा पिछले चुनाव जैसी कोई गलती न कर राज्य में पहली बार अपनी सरकार बनाने के लिए आगे बढ़ रही है। लगभग 90 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची (एसआईआर प्रक्रिया) से हटने से चुनावी गणित और अधिक संवेदनशील हो गया है। ऐसे में मुकाबला केवल दलों का नहीं, बल्कि मतदाता संरचना का भी हो गया है।

Apr 10, 2026 - 19:48
 0
बंगाल का सत्ता संग्राम: टीएमसी-भाजपा के बीच नैरेटिव, सामाजिक समीकरण और वोट संरचना की निर्णायक जंग

-एसपी सिंह-

बंगाल विधानसभा चुनाव इस बार सामान्य राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि मतदाता संरचना, रणनीति और नैरेटिव की सीधी जंग बन गया है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जहां लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी के लिए हर दांव चल रही हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी भी पिछली गलतियों से सबक लेकर इस बार पूरी रणनीति के साथ मैदान में उतर चुकी है। 90 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटने (एसआईआर प्रक्रिया) ने इस चुनाव को और अधिक संवेदनशील और जटिल बना दिया है।

सीधा मुकाबला: ममता बनाम भाजपा

राज्य में असली लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच ही सिमटती दिख रही है। ममता बनर्जी की ताकत अब भी ग्रामीण बंगाल, महिला वोट बैंक और अल्पसंख्यक समर्थन पर टिकी है। लक्ष्मी भंडार और स्वास्थ्य जैसी योजनाओं के लाभार्थी उनके पक्ष में मजबूत आधार तैयार कर रहे हैं। साथ ही बंगाल बनाम बाहरी के नैरेटिव को भी वे लगातार धार दे रही हैं। विभिन्न सर्वे में अभी भी ममता बनर्जी ही बढ़त लिए हुए हैं, इसकी वजह महिला और अल्पसंख्यक वोटों पर उनकी पकड़ होना है।

इस बार के चुनाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुरू से ही जिस तरह से बौखलाहट भरी बातें कर रही हैं, उससे इतना तो साफ है कि उन्होंने भी मान लिया है कि लगातार चौथी बार सत्ता पाने के लिए लोहे के चने चबाने होंगे। एसआईआर को रोकने के लिए ममता बनर्जी ने जिस तरह से हर संभव प्रयास किए, उससे उनका यह डर सामने आ गया कि इस प्रक्रिया में उनके समर्थक मतदाताओं के नाम कट जाएंगे। ये वही मतदाता हैं, जिन्हें भाजपा बांग्लादेशी बताकर इनके नाम हटाने की मांग लम्बे समय से करती आ रही है।

चुनाव आयोग ने भय रहित चुनाव कराने के लिए बंगाल में जो इंतजाम किए हैं, उससे भी ममता बनर्जी की त्यौरियां चढ़ी हुई हैं, लेकिन वे बेबस हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य से केंद्रीय बलों को हटाने की मांग को भी नामंजूर कर दिया है।

एसआईआर रोकने के लिए ममता ने हर हथकंडा अपनाया

एसआईआर प्रक्रिया को लेकर ममता बनर्जी की आक्रामकता ने चुनावी माहौल को और गरमा दिया है। इस प्रक्रिया को रोकने के लिए उन्होंने उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी, लेकिन सफलता नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य मशीनरी को एसआईआर प्रक्रिया अलग कर न्यायिक निगरानी में कराने के फैसले ने ममता के लिए स्थिति को और गंभीर बना दिया। इससे यह संकेत भी गया कि मतदाता सूची में बदलाव टीएमसी के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।

भाजपा की सतर्क रणनीति

भाजपा इस बार बेहद संयमित और योजनाबद्ध तरीके से चुनाव लड़ रही है। हिंदुत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और केंद्र सरकार की योजनाओं को आधार बनाते हुए पार्टी उत्तर बंगाल और शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने पर फोकस कर रही है।

पिछले चुनाव में 200 सीटों का दावा कर शोर मचाने वाली भाजपा इस बार बिना ज्यादा प्रचार के जमीनी रणनीति पर काम कर रही है। शुवेंदु अधिकारी को प्रमुख चेहरा बनाकर स्थानीय नेतृत्व को आगे किया गया है, जिससे बाहरी बनाम बंगाल का मुद्दा कमजोर पड़ता दिख रहा है। 90 लाख वोटों की कटौती को भी भाजपा अपने लिए संभावित लाभ के रूप में देख रही है।

भाजपा के लिए यह चुनाव अभी नहीं तो कभी नहीं वाली स्थिति है। भाजपा का नेतृत्व जानता है कि यदि इस बार भी ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर नहीं कर पाए तो फिर वे और मजबूत होकर उभरेंगी, इसलिए भाजपा भी चुनाव जीतने के लिए साम, दाम, दंड और भेद, सभी तरीके अपना रही है।

कांग्रेस और वामदल: किंगमेकर या वोट काटने वाले?

कांग्रेस और वाम दल तीसरे मोर्चे के रूप में मौजूद हैं। उनकी राज्यव्यापी ताकत सीमित जरूर है, लेकिन कई सीटों पर वे मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं। दोनों ही दलों द्वारा छात्र राजनीति और ग्रामीण क्षेत्रों में पुनर्जीवन की कोशिश की जा रही हैं, लेकिन राज्यव्यापी प्रभाव अभी भी सीमित ही नजर आ रहा है।

कांग्रेस और वाम दलों की असल भूमिका सीधे खुद की जीत से कहीं ज्यादा टीएमसी के वोट बैंक में सेंध लगाने की है। अगर ऐसा होता है तो इसका फायदा भाजपा को मिलेगा।

ओवैसी फैक्टर: सीमित लेकिन असरदार

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कुछ मुस्लिम बहुल सीटों पर चुनाव लड़ रही है। ममता बनर्जी से बगावत कर अपनी अलग पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर ने ओवैसी की पार्टी से गठबंधन किया है। इस गठबंधन का फोकस अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर है। ऐसे में अल्पसंख्यक वोटों में विभाजन की संभावना पैदा हो रही है। इस गठबंधन के लिए भी सीधे सीटें जीतना आसान नहीं लगता, लेकिन अगर मुस्लिम वोटों में विभाजन किया तो इसका नुकसान टीएमसी के उम्मीदवारों को उठाना पड़ सकता है। भाजपा इस स्थिति का लाभ उठाने की फिराक में दिखती है।

90 लाख वोटों की कटौती: गेमचेंजर?

मतदाता सूची से 90 लाख से अधिक नाम हटना इस चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर बन गया है। यदि हटाए गए मतदाताओं में बड़ा हिस्सा टीएमसी समर्थक या अल्पसंख्यक वर्ग का रहा, तो इसका सीधा असर सीटों पर पड़ेगा।

यह चुनाव अब केवल राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरण और वोट संरचना का चुनाव बन चुका है।

संभावित चुनावी तस्वीर

कुल मिलाकर बंगाल विधान सभा चुनाव पिछले चुनाव से ज्यादा टक्कर वाला चुनाव होने जा रहा है। अभी तक के सर्वे आदि में टीएमसी को बढ़त है, लेकिन पार्टी का मार्जिन घटने के संकेत मिल रहे हैं। भाजपा की ओर से टीएमसी को मजबूत चुनौती दी जा रही है, खासकर उत्तर और सीमावर्ती इलाकों में। तीसरा मोर्चा (कांग्रेस-वाम) विभिन्न सीटों के परिणामों को प्रभावित तो कर सकते हैं, लेकिन ज्यादा सीटें जीतने के संकेत नजर नहीं आ रहे। ओवैसी फैक्टर सीमित सीटों पर गेमचेंजर बन सकता है

यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि नैरेटिव, सामाजिक समीकरण और मतदाता संरचना का चुनाव है।

अगर टीएमसी अपना पारंपरिक वोट बैंक बचा लेती है तो वापसी संभव है,

लेकिन यदि वोट विभाजन और एसआईआर का असर बड़ा हुआ, तो भाजपा सत्ता के काफी करीब पहुंच सकती है। कांग्रेस-वाम समीकरण परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि ओवैसी फैक्टर सीमित सीटों पर गेमचेंजर बन सकता है।

SP_Singh AURGURU Editor