भाजपा जिला कार्यकारिणी पर ‘वर्चस्व युद्ध’ का ब्रेक, नामों पर ऐसी खींचतान कि इस्तीफे की धमकी तक पहुंचा मामला
भाजपा की जिला कार्यकारिणी की घोषणा अंदरूनी गुटबाजी और जनप्रतिनिधियों के टकराव के चलते अटक गई है। सूत्रों के मुताबिक, सुग्रीव सिंह चौहान, सहदेव शर्मा और संतोष सिकरवार जैसे नामों पर पार्टी के भीतर जोरदार खींचतान चल रही है। सहदेव शर्मा के नाम का एक कैबिनेट मंत्री और पूर्व जिलाध्यक्ष विरोध कर रहे हैं, जबकि वे जिलाध्यक्ष प्रशांत पौनियां की प्रमुख पसंद बताए जा रहे हैं। वहीं सुग्रीव सिंह चौहान के नाम पर भी एक जनप्रतिनिधि खुलकर विरोध में हैं और इस्तीफे तक की धमकी दे चुकी हैं। जिलाध्यक्ष, जिला प्रभारी और जनप्रतिनिधियों के बीच सहमति न बनने से सूची अटक गई है। मामला अब हाईकमान तक पहुंच चुका है, लेकिन वहां भी संतुलन बनाने की कोशिश में फैसला टलता जा रहा है।
जिलाध्यक्ष, जिला प्रभारी और जनप्रतिनिधियों के बीच सहमति का संकट, सुग्रीव, सहदेव और संतोष सहित कई नामों पर अटकी सूची, हाईकमान भी असमंजस में
आगरा। भाजपा की जिला कार्यकारिणी की बहुप्रतीक्षित सूची इस बार संगठनात्मक प्रक्रिया से ज्यादा आंतरिक वर्चस्व की जंग में फंसती नजर आ रही है। पार्टी के भीतर चल रही खींचतान, गुटबाजी और जनप्रतिनिधियों के आपसी टकराव ने स्थिति को इतना उलझा दिया है कि अब मामला सिर्फ नाम तय करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस्तीफे की धमकी तक पहुंच गया है। यही वजह है कि जिला कार्यकारिणी की घोषणा लगातार टलती जा रही है और पार्टी हाईकमान भी फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचता नहीं दिख रहा है।
सूत्रों की मानें तो जिला संगठन में पदाधिकारियों के चयन को लेकर जिलाध्यक्ष प्रशांत पौनियां, जिला प्रभारी और प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों के बीच तीखा मतभेद बना हुआ है। कई नामों पर सहमति बनने के बजाय खुला विरोध सामने आ रहा है। स्थिति इतनी गंभीर बताई जा रही है कि एक नाम को लेकर एक जनप्रतिनिधि ने तो पद से इस्तीफा देने तक की चेतावनी दे डाली।
नामों पर नहीं, ‘पकड़’ पर लड़ाई
भाजपा की जिला कार्यकारिणी में फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा सुग्रीव सिंह चौहान, सहदेव शर्मा और संतोष सिकरवार जैसे नामों को लेकर है। लेकिन जानकारों का कहना है कि यह लड़ाई केवल इन नामों की नहीं, बल्कि जिला संगठन में किस गुट की कितनी पकड़ होगी, इसकी है।
दरअसल, जिला कार्यकारिणी में शामिल होने वाले पदाधिकारी आगे चलकर संगठनात्मक फैसलों, चुनावी प्रबंधन और स्थानीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में हर जनप्रतिनिधि और संगठन का हर प्रभावशाली चेहरा अपने-अपने समर्थकों को समायोजित कराने की कोशिश में जुटा है।
सहदेव शर्मा के नाम पर सबसे ज्यादा सियासी घमासान
सूत्र बताते हैं कि सहदेव शर्मा का नाम जिला कार्यकारिणी की सूची में सबसे ज्यादा विवाद का कारण बना हुआ है। बताया जा रहा है कि सहदेव के नाम को लेकर एक कैबिनेट मंत्री और एक पूर्व जिलाध्यक्ष खुलकर विरोध में उतर आए हैं। दोनों नेता इस नाम को संगठन में शामिल किए जाने के खिलाफ मुखर रुख अपनाए हुए हैं। इसके बावजूद, दिलचस्प बात यह है कि जिलाध्यक्ष प्रशांत पौनियां की पसंदीदा सूची में सहदेव शर्मा प्रमुख नामों में शामिल हैं। यही कारण है कि इस एक नाम ने संगठन के भीतर कई परतों वाला विवाद खड़ा कर दिया है।
एक तरफ जिलाध्यक्ष अपने करीबी और भरोसेमंद चेहरों को टीम में जगह दिलाना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि और पुराने संगठनात्मक चेहरे इसे अपने प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप मान रहे हैं।
सुग्रीव सिंह चौहान के नाम पर भी खुला विरोध
सुग्रीव सिंह चौहान का नाम भी भाजपा की जिला कार्यकारिणी की अटकी सूची में बड़ा विवाद बनकर उभरा है। सूत्रों के मुताबिक, उनके नाम को लेकर एक जनप्रतिनिधि खुलकर विरोध में उतर आई हैं। इतना ही नहीं, इस विरोध ने सामान्य असहमति की सीमा पार कर दी और मामला इस्तीफे की धमकी तक जा पहुंचा। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि यदि संबंधित नाम को सूची में जगह दी गई, तो पार्टी के भीतर एक नया विवाद खुलकर सामने आ सकता है। यही वजह है कि संगठन के जिम्मेदार नेता भी फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं।
जिलाध्यक्ष बनाम जनप्रतिनिधि? अंदरखाने गहराई गुटबाजी
भाजपा जिला संगठन के भीतर इस समय सबसे बड़ा संकट आपसी सहमति का अभाव है।
बताया जा रहा है कि जिलाध्यक्ष प्रशांत पौनियां अपने विश्वस्त और सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिला कार्यकारिणी में समायोजित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि संगठन की कमान ऐसे लोगों के हाथ में रहे, जो सीधे तौर पर उनके साथ तालमेल में काम करें। लेकिन दूसरी ओर जिला प्रभारी और कई जनप्रतिनिधि कई नामों पर खुला विरोध जता रहे हैं। उनका तर्क है कि कार्यकारिणी में ऐसे नामों को जगह दी जाए जो व्यापक स्वीकार्यता रखते हों और जिनसे किसी गुट विशेष का संदेश न जाए। यही वजह है कि जिला कार्यकारिणी अब केवल संगठनात्मक सूची न रहकर “किसका वर्चस्व कितना” की राजनीतिक परीक्षा बन गई है।
हाईकमान भी उलझन में, फैसला टलता जा रहा
सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय स्तर पर सहमति न बन पाने के कारण मामला अब ऊपर तक पहुंच चुका है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि हाईकमान भी फिलहाल किसी पक्ष में साफ फैसला लेने से बच रहा है। कारण साफ है यदि किसी एक गुट के पक्ष में सूची जारी होती है, तो दूसरा पक्ष खुलकर असंतोष जता सकता है।
पार्टी नेतृत्व इस बात से भी चिंतित बताया जा रहा है कि कार्यकारिणी गठन जैसे संगठनात्मक मुद्दे पर यदि असंतोष सार्वजनिक हुआ, तो इसका असर आने वाले राजनीतिक कार्यक्रमों और स्थानीय चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।
जिला कार्यकारिणी बनी ‘प्रतिष्ठा की लड़ाई’
भाजपा के भीतर जिला कार्यकारिणी गठन को लेकर चल रही खींचतान ने अब इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है। हर गुट चाहता है कि सूची में उसके समर्थकों की पर्याप्त हिस्सेदारी हो। यही कारण है कि जिन नामों पर सामान्यतः चुपचाप सहमति बन जानी चाहिए थी, वही अब पार्टी के भीतर सियासी तनाव का केंद्र बन गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जल्द सहमति नहीं बनी, तो यह देरी केवल संगठनात्मक कमजोरी का संकेत नहीं होगी, बल्कि यह संदेश भी जाएगा कि स्थानीय स्तर पर भाजपा के भीतर गुटबाजी अब खुली लड़ाई का रूप ले चुकी है। जिला कार्यकारिणी की सूची फिलहाल अटकी हुई है। सूची कब जारी होगी, इसे लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में भी असमंजस बना हुआ है।