अमेरिका-ईरान वार्ता टूटी,  जेडी वेंस खाली हाथ अमेरिका रवाना,  पाक को बड़ा झटका, सऊदी अरब को साथ देना  मजबूूरी

अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में शनिवार को हुई सीजफायर वार्ता बेनतीजा रही। इससे दुनिया के मंच पर पाकिस्तान बुरी तरह घिर गया है। वह गहरे कूटनीतिक सुरक्षा संकट में उलझता दिख रहा है। सऊदी अरब के साथ सैन्य समझौते और अमेरिकी दबाव के बीच वह गेहूं में घुन की तरह पिस रहा है। ऐसे में संकट बढ़ने की स्थिति में इस्लामाबाद पर ईरानी मिसाइल हमलों से इनकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि पाकिस्तान को सऊदी अरब का साथ देना होगा, जो ईरानी मिसाइयों की जद में है।

Apr 12, 2026 - 09:22
 0
अमेरिका-ईरान वार्ता टूटी,  जेडी वेंस खाली हाथ अमेरिका रवाना,  पाक को बड़ा झटका, सऊदी अरब को साथ देना   मजबूूरी


इसलामाबाद। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही सीजफायर वार्ता के टूटने से न केवल पश्चिम एशिया में फिर से मिसाइलों और बमों से वार शुरू होंगे बल्कि पाकिस्तान को एक गंभीर कूटनीतिक और सुरक्षा संकट में धकेल दिया है। पाकिस्तान इन वार्ताओं का मध्यस्थ बनकर वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था। अब वह खुद को दो शक्तिशाली पड़ोसियों और सहयोगियों के बीच फंसा पा रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर की पूरी टीम इस वार्ता को किसी भी कीमत पर सफल बनाने में जुटी थी, क्योंकि इसके विफल होने का मतलब पाकिस्तान के लिए सिर्फ कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन जाना है. लेकिन, अब वार्ता टूट गई है। अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस वाशिंगटन के लिए रवाना हो गए हैं।
 
वार्ता टूटने के तुरंत बाद पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ गई हैं। एक तरफ अमेरिका है, जिससे पाकिस्तान आर्थिक सहायता, आईएमएफ जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में समर्थन और सुरक्षा सहयोग की उम्मीद रखता है। दूसरी तरफ ईरान है, जो पाकिस्तान का प्रत्यक्ष पड़ोसी है। दोनों देशों के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील रही है। ईरान के साथ कोई भी टकराव पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को दशकों पीछे धकेल सकता है, क्योंकि सीमा क्षेत्र में पहले से ही अस्थिरता मौजूद है। वार्ता के बीच पाकिस्तान ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। शनिवार को ही उसने अपने फाइटर जेट्स और सैन्य बल सऊदी अरब भेज दिए। यह कदम 2025 में सऊदी अरब के साथ हुए  सुरक्षा समझौते के तहत लिया गया है। इस समझौते के अनुसार यदि सऊदी अरब पर कोई खतरा मंडराता है, तो पाकिस्तान को उसकी सुरक्षा के लिए सैन्य सहायता प्रदान करनी होगी। फिलहाल सऊदी अरब अमेरिका का करीबी सहयोगी है और ईरान के साथ तनावपूर्ण संबंध रखता है।

यदि युद्ध की स्थिति बनी रही तो पाकिस्तान को न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करनी पड़ेगी, बल्कि सऊदी अरब के बचाव में भी सक्रिय भूमिका निभानी पड़ सकती है। इससे पाकिस्तान सीधे तौर पर एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में घिर जाएगा, जहां उसके सैनिक और संसाधन दोनों मोर्चों पर बंट जाएंगे। वार्ता टूटने के बाद अमेरिका अपने सैन्य विकल्पों को फिर से सक्रिय कर सकता है। ऐसे में अमेरिका पाकिस्तान से एयरबेस और एयरस्ट्रिप्स की मांग कर सकता है, खासकर बलूचिस्तान के पास वाले हवाई अड्डों की। ये बेस ईरान के पूर्वी हिस्सों और उसके परमाणु ठिकानों पर प्रभावी हमलों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। यदि पाकिस्तान यह मांग मान लेता है तो वह सीधे ईरान के निशाने पर आ जाएगा। ईरान पहले ही स्पष्ट चेतावनी दे चुका है कि वह वैसे किसी भी देश को निशाना बनाएगा जो अमेरिका को अपनी धरती का इस्तेमाल करने देगा। इसका मतलब पाकिस्तान के लिए ईरानी मिसाइलों और ड्रोन्स का सामना करना होगा, जो उसकी सैन्य क्षमता और नागरिक बुनियादी ढांचे दोनों को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।