अमेरिका के मिडटर्म चुनाव से पहले ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी पर हार का खतरा, शुरुआती मतदान में डेमोक्रेट्स को 11 अंकों की बढ़त; मतदाता सूची और अर्थव्यवस्था के मुद्दे ने बढ़ाई राष्ट्रपति की मुश्किलें
वाशिंगटन डीसी। अमेरिका के मिडटर्म चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के सामने मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही हैं। तीन नवंबर को होने वाले चुनाव के लिए शुरुआती मतदान में अब तक चार करोड़ के करीब मतदाता वोट डाल चुके हैं। रॉयटर्स-इप्सॉस के ताजा सर्वे में कांग्रेस के चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी को 47 प्रतिशत और रिपब्लिकन पार्टी को 36 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं का समर्थन मिला है। इस बीच ट्रम्प प्रशासन की ओर से राज्यों से संवेदनशील मतदाता सूचनाएं हासिल करने की कोशिश और अर्थव्यवस्था को लेकर जनता की नाराजगी भी चुनावी बहस के केंद्र में है।
चार करोड़ के करीब मतदाताओं ने पहले ही डाला वोट
अमेरिका में चुनाव के निर्धारित दिन से पहले मतदान करने की सुविधा को अर्ली वोटिंग यानी शुरुआती मतदान कहा जाता है। इसके तहत मतदाता चुनाव के दिन का इंतजार किए बिना तय अवधि में मतदान केंद्र पर जाकर या कुछ राज्यों में डाक से बैलेट भेजकर वोट डाल सकते हैं। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को मतदान का अवसर देना है।
एसोसिएटेड प्रेस और अन्य चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, 30 अक्टूबर से पहले शुरुआती मतदान का आंकड़ा चार करोड़ के करीब पहुंच गया था। 29 अक्टूबर की रिपोर्टों में 3.9 करोड़ से अधिक लोगों के वोट डालने की जानकारी सामने आई। हालांकि, शुरुआती मतदान के आंकड़ों से यह तय नहीं किया जा सकता कि अंतिम चुनाव परिणाम किस पार्टी के पक्ष में जाएगा।
सर्वे में डेमोक्रेट्स को 11 अंकों की बढ़त
रॉयटर्स-इप्सॉस के 22 से 26 अक्टूबर के बीच हुए सर्वे में पंजीकृत मतदाताओं से पूछा गया कि यदि आज कांग्रेस के चुनाव हों तो वे किस पार्टी को वोट देंगे। इसके जवाब में 47 प्रतिशत ने डेमोक्रेटिक पार्टी और 36 प्रतिशत ने रिपब्लिकन पार्टी के पक्ष में राय दी। यानी डेमोक्रेट्स को 11 प्रतिशत अंकों की बढ़त मिली।
अनिर्णीत मतदाताओं की पसंद को भी शामिल करने पर डेमोक्रेट्स की बढ़त नौ अंकों की रह गई। संभावित मतदाताओं के बीच डेमोक्रेटिक पार्टी को 53 प्रतिशत और रिपब्लिकन पार्टी को 44 प्रतिशत समर्थन मिला। यह सर्वे रिपब्लिकन पार्टी के लिए चिंता का संकेत है, क्योंकि उसे प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में अपना बहुमत बचाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
मतदाता सूचियों को लेकर ट्रम्प प्रशासन और राज्यों में टकराव
चुनाव से पहले ट्रम्प प्रशासन ने देश के लगभग सभी राज्यों से मतदाता पंजीकरण सूचियों और उनसे जुड़ी संवेदनशील जानकारियों की मांग की है। न्याय विभाग ने 30 राज्यों और वाशिंगटन डीसी के खिलाफ मुकदमे भी दायर किए हैं। इन सूचियों में मतदाताओं के नाम, पते, जन्मतिथि, ड्राइविंग लाइसेंस नंबर और सोशल सिक्योरिटी नंबर के कुछ अंकों जैसी जानकारियां शामिल हैं।
ट्रम्प प्रशासन का तर्क है कि इन सूचनाओं की मदद से यह जांच की जा सकेगी कि कहीं गैर-अमेरिकी नागरिक मतदाता सूची में शामिल होकर मतदान तो नहीं कर रहे। प्रशासन इसे चुनाव की पारदर्शिता और शुचिता से जुड़ा कदम बता रहा है। दूसरी ओर, कई राज्यों और चुनाव अधिकारियों ने मतदाताओं की निजता तथा आंकड़ों की सुरक्षा को लेकर आपत्ति जताई है।
इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची है। सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने संघीय सरकार को सोशल सिक्योरिटी से जुड़ी जानकारी वाले सरकारी डेटाबेस का इस्तेमाल मतदाता सूची की नागरिकता जांच के लिए करने की अनुमति दी थी। हालांकि, राज्यों से पूरी मतदाता सूचियां हासिल करने को लेकर अलग-अलग मुकदमे और कानूनी विवाद जारी हैं।
नागरिक अधिकार संगठनों और चुनाव विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि गलत या अधूरी सूचनाओं के आधार पर अमेरिकी नागरिकों के नाम भी मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। गैर-अमेरिकी नागरिकों के मतदान की घटनाएं बेहद दुर्लभ बताई जाती हैं। ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद गहरा गया है।
महंगाई और रोजगार के मुद्दे पर ट्रम्प घिरे
चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के सामने अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बनती दिख रही है। रॉयटर्स-इप्सॉस सर्वे में ट्रम्प की आर्थिक नीतियों और महंगाई से निपटने के तरीके को लेकर मतदाताओं में असंतोष सामने आया है। सर्वे के मुताबिक, 73 प्रतिशत लोगों का मानना है कि देश में जीवन-यापन की लागत गलत दिशा में जा रही है। ट्रम्प की अर्थव्यवस्था संभालने की क्षमता को लेकर भी जनता में भरोसा कमजोर हुआ है।
इमिग्रेशन यानी आव्रजन नीति, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दे चुनाव प्रचार में प्रमुखता से उठाए जा रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी इन मुद्दों पर ट्रम्प प्रशासन को घेर रही है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी अपनी नीतियों और उपलब्धियों के आधार पर मतदाताओं का समर्थन जुटाने में लगी है।
ओबामा और कमला हैरिस भी प्रचार में सक्रिय
डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रचार अभियान में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और पूर्व उप राष्ट्रपति कमला हैरिस की भूमिका महत्वपूर्ण है। कमला हैरिस 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प के खिलाफ डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार थीं। वे भी चुनावी सभाओं और प्रचार कार्यक्रमों के जरिए पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन में जुटी हैं। ओबामा की लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी उन्हें भी प्रचार अभियान में आगे कर रही है।
रिपब्लिकन बहुमत गया तो ट्रम्प की राह होगी कठिन
मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी हारती है तो भी ट्रम्प राष्ट्रपति बने रहेंगे। उनका कार्यकाल 2028 तक है, लेकिन कांग्रेस के किसी एक या दोनों सदनों में बहुमत गंवाने पर उनके लिए अपने एजेंडे को लागू करना कठिन हो सकता है। टैरिफ, वीजा, इमिग्रेशन और बजट जैसे मुद्दों पर उन्हें डेमोक्रेट्स के विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
यदि डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करते हैं तो वे ट्रम्प प्रशासन की नीतियों की जांच और निगरानी बढ़ा सकते हैं। विपक्षी नेताओं की ओर से महाभियोग की संभावना भी जताई जाती रही है। हालांकि, महाभियोग के लिए प्रतिनिधि सभा में बहुमत और राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है।
भारतीय मूल के मतदाता भी निभाएंगे अहम भूमिका
अमेरिका में करीब 17 करोड़ मतदाता हैं। इनमें भारतीय मूल के लगभग 25 से 26 लाख लोग मतदान के योग्य हैं। कार्नेगी एंडोमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक, कैलिफोर्निया में सबसे अधिक करीब 4.16 लाख भारतीय मूल के मतदाता हैं। इसके बाद टेक्सास, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क का स्थान है।
2024 के एक सर्वे में 60 प्रतिशत भारतीय मूल के मतदाताओं ने कमला हैरिस और 31 प्रतिशत ने ट्रम्प का समर्थन करने की बात कही थी। भारतीय मूल के मतदाताओं की संख्या और कुछ राज्यों में उनकी मौजूदगी चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।
तीन नवंबर के चुनाव में अमेरिकी मतदाता केवल अपने प्रतिनिधियों का चयन नहीं करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल के शेष दो वर्षों में उनकी नीतियों को कितना राजनीतिक समर्थन मिलेगा। रिपब्लिकन पार्टी के लिए यह चुनाव बहुमत बचाने की परीक्षा है, जबकि डेमोक्रेट्स के लिए कांग्रेस में अपनी ताकत बढ़ाने का बड़ा अवसर।