ब्रज के वीर ‘गोकुला’ की गाथा पर ऐतिहासिक नाट्य मंचन, दर्शकों ने किया वीरता का वंदन
मथुरा। ब्रजभूमि की शौर्य परंपरा और औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध वीरता से लड़े जाट योद्धा गोकुला के जीवन पर आधारित भव्य नाट्य ‘गोकुला’ का मंचन रविवार रात ब्रज कला केंद्र, मसानी के ऑडिटोरियम में किया गया। यह ऐतिहासिक प्रस्तुति मुंबई के प्रसिद्ध नाट्य किरण मंच द्वारा दी गई।
नाटक के मंचन से पूर्व दीप जलाकर उद्घाटन करते अतिथिगण।
नाटक का शुभारंभ राज्यसभा सांसद चौधरी तेजवीर सिंह, गीता शोध संस्थान के समन्वयक चंद्र प्रताप सिंह सिकरवार, व प्राचार्य अनिल वाजपेयी ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस अवसर पर ‘गोकुला’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया।
ऐतिहासिक सत्य को मंच पर जीवंत करती प्रस्तुति
लेखक व निर्देशक देव फौजदार के गहन शोध, ऐतिहासिक दृष्टि और भावनात्मक लेखनी ने नाटक को एक जीवंत दस्तावेज में बदल दिया। नाटक में दिखाया गया कि वीर गोकुला, जो महाराजा सूरजमल के पूर्वज थे, ने औरंगजेब के जुल्मों का डटकर मुकाबला किया। मुगलों की सेना से भिड़ते हुए गोकुला ने न केवल अपने साथियों के साथ संघर्ष किया, बल्कि बलिदान देकर सनातन धर्म की रक्षा भी की। अंततः आगरा कोतवाली के सामने उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया था।
जयंत देशमुख द्वारा मंच सज्जा, गुरु बिश्वजीत और रूपेश चौहान द्वारा युद्ध दृश्यों की कोरियोग्राफी, तथा मोहन सागर का संगीत मंचन की आत्मा बने।
मंच पर दमदार अभिनय और ऐतिहासिक समर्पण
तेजस यादव ने वीर गोकुला की भूमिका में जान डाल दी। अन्य भूमिकाओं में जोगिंदर बोकेन, सत्यम दांगी, बेला बारोट, राकेश भदौरिया, संजना, गौरव, अजय और अन्य कलाकारों का प्रदर्शन दर्शकों को रोचकता से बांधे रहा।
नाट्य प्रस्तुति में शैली बंसल शाह, प्रमोद लवानिया और कृष्णरंगम थिएटर का उल्लेखनीय योगदान रहा।
भावनाओं से भरा रहा ऑडिटोरियम
रविवार की शाम 7 बजे शुरू हुए इस मंचन को भारी संख्या में दर्शकों ने देखा। पूरा ऑडिटोरियम खचाखच भरा रहा। हर दृश्य पर तालियों की गूंज दर्शकों की भावनात्मक जुड़ाव का प्रमाण बनी। यह केवल एक नाट्य मंचन नहीं, बल्कि ब्रज की बलिदानी परंपरा का जीवंत उत्सव था।