भारत को वैश्विक वैज्ञानिक शक्ति बनाने के लिए अनुसंधान और नवाचार को मिले बढ़ावा, डीईआई में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. उमेश वाघमारे का आह्वान

दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीईआई) में आयोजित डायमंड जुबली मेमोरियल लेक्चर में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. उमेश वी. वाघमारे ने कहा कि विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और आत्मनिर्भरता को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स और मैटेरियल साइंस जैसे उभरते क्षेत्रों में भारत की क्षमताएं बढ़ाने पर जोर दिया।

Oct 31, 2026 - 19:38
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भारत को वैश्विक वैज्ञानिक शक्ति बनाने के लिए अनुसंधान और नवाचार को मिले बढ़ावा, डीईआई में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. उमेश वाघमारे का आह्वान
डीईआई में शनिवार को डायमंड जुबली मेमोरियल लेक्चर देते भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. उमेश वी. वाघमारे। मौजूद हैं गुरु सरूप सूद,  प्रो. सी. पटवर्धन, प्रो. संजीव स्वामी।

आगरा। भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को हासिल करने में विज्ञान, तकनीकी नवाचार और अनुसंधान की निर्णायक भूमिका होगी। इसके लिए विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, उद्योगों, स्टार्टअप्स और सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना जरूरी है। वैज्ञानिक खोजों को व्यावहारिक तकनीकों में बदलने के साथ ही तकनीकी विकास को सामाजिक जरूरतों, समावेशिता और पर्यावरणीय स्थिरता से जोड़ना होगा।

यह विचार भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. उमेश वी. वाघमारे ने शनिवार को दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीईआई) में आयोजित डायमंड जुबली मेमोरियल लेक्चर में व्यक्त किए। उन्होंने 'भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम को आकार देना' विषय पर व्याख्यान देते हुए देश की वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।

डीईआई कन्वोकेशन हॉल (शिक्षा स्रोत भवन) में 31 अक्टूबर को दोपहर 2:30 बजे आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत संस्थान के रजिस्ट्रार प्रो. संजीव स्वामी ने की। उन्होंने डायमंड जुबली मेमोरियल लेक्चर के आयोजन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए दयालबाग की शैक्षिक परंपरा और संस्थान की विकास यात्रा की जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि भविष्य के लिए आदर्श मानव (सुपर-ह्यूमन) तैयार करने के राधास्वामी मत के उच्च आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए राधास्वामी सत्संग सभा ने 1 जनवरी, 1917 को राधास्वामी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (आरईआई) की स्थापना सहशिक्षा मिडिल स्कूल के रूप में की थी। इसी के साथ दयालबाग में शिक्षा की नींव पड़ी। इसके बाद अनेक शिक्षण संस्थान स्थापित किए गए, जिनका उद्देश्य युवाओं को सत्संग संस्कृति के उच्च आदर्शों और मूल्यों के अनुरूप शैक्षिक वातावरण उपलब्ध कराना तथा समाज के कमजोर वर्गों को कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना रहा है।

प्रो. संजीव स्वामी ने बताया कि वर्ष 1973 में संस्थान के संस्थापक निदेशक परम गुरु डॉ. एम.बी. लाल साहब के मार्गदर्शन में दयालबाग के सभी शिक्षण संस्थानों को एक छत के नीचे लाकर दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीईआई) का गठन किया गया। आरईआई के 60 वर्ष पूरे होने के अवसर पर वर्ष 1977 में परम गुरु डॉ. एम.बी. लाल साहब के संरक्षण में डायमंड जुबली समारोह भी उत्साहपूर्वक आयोजित किया गया था।

डीईआई के निदेशक प्रो. सी. पटवर्धन ने मुख्य वक्ता प्रो. उमेश वी. वाघमारे का परिचय कराया। उन्होंने बताया कि प्रो. वाघमारे प्रख्यात भौतिक विज्ञानी, शिक्षाविद और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में प्रतिष्ठित नाम हैं। उन्होंने वर्ष 1990 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बॉम्बे से इंजीनियरिंग फिजिक्स में बीटेक किया और संस्थान के सिल्वर मेडल से सम्मानित हुए। वर्ष 1996 में अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी से एप्लाइड फिजिक्स में पीएचडी की। इसके बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पोस्टडॉक्टोरल शोध किया।

वर्ष 2000 में वह जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (जेएनसीएएसआर), बेंगलुरु से जुड़े। यहां उन्होंने थियोरेटिकल साइंसेज यूनिट में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया और वर्ष 2025-26 के दौरान इस यूनिट के अध्यक्ष भी रहे।

उनके प्रमुख शोध क्षेत्रों में कंप्यूटेशनल मैटेरियल्स साइंस, एब इनिशियो मॉडलिंग, मल्टीफंक्शनल मैटेरियल्स, नैनोस्ट्रक्चर, क्वांटम ज्यामिति, टोपोलॉजिकल इंसुलेटर तथा ऊर्जा एवं पर्यावरण से संबंधित उपयोगी सामग्री का विकास शामिल है। वह वर्ष 2022 से 2024 तक इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के अध्यक्ष भी रहे।

प्रो. वाघमारे को उनके वैज्ञानिक योगदान के लिए वर्ष 2010 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, 2015 में इंजीनियरिंग एवं कंप्यूटर साइंस के लिए इन्फोसिस पुरस्कार तथा 2016 में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए जी.डी. बिड़ला पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने जुलाई 2026 में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव का कार्यभार संभाला। इस पद पर उनकी जिम्मेदारी देश के वैज्ञानिक अनुसंधान तंत्र को मजबूत करने, नवाचार को प्रोत्साहित करने तथा शिक्षा जगत और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने की है।

अपने व्याख्यान में प्रो. वाघमारे ने मैटेरियल साइंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और साइबर-फिजिकल सिस्टम जैसे तेजी से उभरते क्षेत्रों की संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत को इन क्षेत्रों में अपनी अनुसंधान क्षमताएं विकसित करनी होंगी, ताकि वैज्ञानिक खोजों को ऐसी तकनीकों में बदला जा सके जिनका प्रत्यक्ष लाभ समाज और देश की अर्थव्यवस्था को मिले।

उन्होंने विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, उद्योगों, स्टार्टअप्स, सरकारी एजेंसियों और युवा नवप्रवर्तकों के बीच मजबूत साझेदारी की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, मौलिक वैज्ञानिक अनुसंधान और उसके व्यावहारिक सामाजिक उपयोग के बीच की दूरी कम करना समय की जरूरत है।

'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को मजबूत, नवाचार आधारित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम विकसित करना होगा। इसके लिए संस्थागत उत्कृष्टता, आधुनिक अनुसंधान ढांचा, तकनीकी उद्यमिता और रणनीतिक राष्ट्रीय मिशनों को मजबूती देना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचना चाहिए और विकास की प्रक्रिया टिकाऊ तथा सामाजिक जरूरतों के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए।

प्रो. वाघमारे ने उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि डीईआई जैसे संस्थान वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने, विभिन्न विषयों के बीच समन्वित अनुसंधान को बढ़ावा देने और भविष्य की चुनौतियों के लिए सक्षम मानव संसाधन तैयार करने में अहम योगदान दे सकते हैं। वैज्ञानिक उत्कृष्टता के साथ नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी का समन्वय भी आवश्यक है। उन्होंने तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक वैज्ञानिक नेतृत्व की दिशा में डीईआई के योगदान की सराहना की।

कार्यक्रम में शिक्षा सलाहकार समिति के अध्यक्ष प्रो. प्रेम सरन सत्संगी साहब और रानी साहिबा की गरिमामयी उपस्थिति भी इस मौके पर रही। अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। कुल मिलाकर, डायमंड जुबली मेमोरियल लेक्चर ने भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र की भावी दिशा, अनुसंधान की चुनौतियों और नवाचार की संभावनाओं पर महत्वपूर्ण विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया।

SP_Singh AURGURU Editor