जेल से बाहर आते ही आजम खान गिरफ्तार, जौहर विश्वविद्यालय मामले में ईडी की कार्रवाई से यूपी की सियासत गरमाई
रामपुर। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की करीब 11 महीने बाद जेल से रिहाई की खुशी कुछ ही मिनटों में गिरफ्तारी की खबर में बदल गई। रामपुर जिला जेल से बाहर निकलते ही प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें जौहर विश्वविद्यालय और मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट से जुड़े कथित धनशोधन मामले में गिरफ्तार कर लिया। इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल बढ़ा दी है।
आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को दो पैनकार्ड रखने के मामले में मिली सजा के बाद 17 नवंबर 2025 से रामपुर जेल में रखा गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर 2026 को दोनों की सजा निलंबित करते हुए जमानत मंजूर की थी। इसके बाद शनिवार, 31 अक्टूबर की शाम दोनों की रिहाई हुई। अब्दुल्ला आजम जेल से बाहर आकर घर चले गए, लेकिन आजम खान को ईडी ने दूसरे मामले में गिरफ्तार कर लिया।
रिहाई के एक मिनट बाद गिरफ्तारी
रामपुर जेल के बाहर आजम खान के स्वागत के लिए समर्थकों की भीड़ जुटी थी। ईडी की टीम भी पहले से वहां पहुंच गई थी। शाम करीब 7 बजे आजम खान जेल से बाहर आए और इसके अगले ही मिनट ईडी अधिकारियों ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। अधिकारियों के साथ उनकी तीखी बातचीत भी हुई। समर्थकों ने कार्रवाई के विरोध में नारेबाजी की।
आजम खान ने मीडिया के सामने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए सवाल उठाया कि क्या मुस्लिम होने की यही सजा है और क्या विश्वविद्यालय तथा बच्चों के लिए स्कूल बनाना उनका अपराध है। उनका यह बयान अब इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक बहस का प्रमुख हिस्सा बन गया है।
जौहर विश्वविद्यालय के निर्माण पर 416 करोड़ रुपये के अंतर की जांच
ईडी की कार्रवाई मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और उसके अधीन संचालित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में हुई है। आजम खान ट्रस्ट के अध्यक्ष और विश्वविद्यालय के संस्थापक हैं।
जांच एजेंसी के अनुसार विश्वविद्यालय के निर्माण पर हुए खर्च और ट्रस्ट के आयकर रिटर्न में घोषित पूंजीगत व्यय के बीच 416.14 करोड़ रुपये का अंतर सामने आया है। जांच में निर्माण कार्यों के लिए सरकारी धन के कथित इस्तेमाल और वित्तीय लेनदेन की भी पड़ताल की जा रही है। ईडी विश्वविद्यालय परिसर की जमीन और इमारतों को पहले ही धनशोधन निरोधक कानून के तहत कुर्क कर चुकी है। इन संपत्तियों का अनुमानित बाजार मूल्य एक हजार करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है।
ईडी ने आजम खान को गिरफ्तार करने के बाद गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत में पेश करने और पूछताछ के लिए रिमांड मांगने की प्रक्रिया शुरू की। यह मामला पैनकार्ड प्रकरण से अलग है, जिसमें उन्हें और अब्दुल्ला आजम को हाईकोर्ट से राहत मिली थी।
अखिलेश यादव ने कार्रवाई को बताया अन्याय
आजम खान की गिरफ्तारी पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि सत्ता बदलती है तो सिंहासन भी बदलते हैं और आजम खान को मामलों में फंसाने की कथित साजिश को पूरा देश देख रहा है। उन्होंने एक बुजुर्ग नेता को बार-बार जेल भेजे जाने की कार्रवाई की निंदा की।
आजम खान की कानूनी टीम ने भी ईडी की कार्रवाई को चुनौती देने की बात कही है। ऐसे में इस मामले का अगला चरण अदालत में होने वाली सुनवाई और जांच एजेंसी की रिमांड मांग पर निर्भर करेगा।
2027 के चुनाव से पहले सपा के लिए नया राजनीतिक मुद्दा
आजम खान की गिरफ्तारी का असर उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है। आजम खान सपा के संस्थापक नेताओं में रहे हैं और रामपुर के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका लंबे समय से प्रभाव रहा है। अखिलेश यादव ने 22 अक्टूबर को रामपुर जेल जाकर उनसे मुलाकात की थी। चुनाव से पहले इस मुलाकात को पार्टी के भीतर आजम खान के महत्व और उनके समर्थकों तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश के रूप में देखा गया था।
अब रिहाई के तुरंत बाद ईडी की गिरफ्तारी ने सपा को भाजपा और केंद्र सरकार की एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाने का एक नया अवसर दे दिया है। अखिलेश आजम खान का यह आरोप कि उन्हें मुस्लिम होने और विश्वविद्यालय बनाने की सजा मिल रही है, अल्पसंख्यक राजनीति के संदर्भ में भी चर्चा को तेज कर सकता है।
हालांकि, इस घटनाक्रम का चुनावी असर अपने आप सपा के पक्ष में वोटों के रूप में बदल जाएगा, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। आजम खान की व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता, कानूनी स्थिति और रामपुर में उनके समर्थकों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। दो पैनकार्ड मामले में हाईकोर्ट ने सजा निलंबित की है, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई। इसलिए उनकी चुनाव लड़ने की पात्रता पर कानूनी बाधा बनी हुई है।
रामपुर में आजम परिवार का राजनीतिक प्रभाव भी चुनावी समीकरण का हिस्सा रहेगा। दूसरी ओर, सपा के सामने अपने मुस्लिम जनाधार को बनाए रखने की चुनौती है। असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता और आजम खान के समर्थकों की राजनीतिक अपेक्षाएं भी इस समीकरण को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए 2027 के चुनाव से पहले आजम खान की गिरफ्तारी को केवल एक कानूनी कार्रवाई या सियासी बयानबाजी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह घटनाक्रम सपा के लिए अपने समर्थक वर्ग के बीच राजनीतिक संवाद का नया मुद्दा है, जबकि भाजपा के लिए इसे कानून और जांच प्रक्रिया के आधार पर जवाब देने की चुनौती होगी। अंततः इसका चुनावी प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले महीनों में अदालतों की कार्यवाही, राजनीतिक दलों की रणनीति और रामपुर सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मतदाताओं की प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है।