भारत की बड़ी छलांग, मगर मंजिल अभी दूर! गरीबी पर चोट, विकास की रफ्तार और खुशहाली की अधूरी कहानी

भारत ने पिछले सात दशकों में गरीबी, अभाव और बुनियादी सुविधाओं की कमी से निकलकर विकास की लंबी यात्रा तय की है। विश्व बैंक के आंकड़े गरीबी में बड़ी गिरावट की पुष्टि करते हैं, लेकिन असली खुशहाली तभी आएगी, जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और कोई पीछे न छूटे।

Nov 1, 2026 - 04:49
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भारत की बड़ी छलांग, मगर मंजिल अभी दूर! गरीबी पर चोट, विकास की रफ्तार और खुशहाली की अधूरी कहानी
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-बृज खंडेलवाल-

आगरा के पास उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे में 1970 के दशक में स्कूल मास्टर रघुनाथ प्रसाद सुबह अंधेरे में उठते थे। घर में न बिजली का भरोसा था, न नल में पानी आता था। लालटेन की रोशनी में बच्चे पढ़ते थे। राशन की दुकान पर लाइन लगती थी। साइकिल या बैलगाड़ी ही सफर का सहारा थी। बीमारी में डॉक्टर मिल जाए, तो गनीमत समझिए। टेलीफोन किसी बड़े साहब के घर दिखता था।

अब उनके तीस साल के पोते मोहन कुमार की दुनिया देखिए। हाथ में स्मार्टफोन, जेब में डिजिटल भुगतान, घर में एसी, रसोई में गैस और दरवाजे पर मोटरसाइकिल या कार। वह एक आईटी कंपनी में काम करता है। वीडियो कॉल पर  बात करता है। ऑनलाइन टिकट बुक करता है और कुछ सेकंड में पैसे भेज देता है। इलाज के लिए आधुनिक अस्पताल हैं। एक्सप्रेसवे और बेहतर सड़कों ने दूरियां घटा दी हैं।

दादा के लिए बैंक जाना, बिजली पाना और पक्का मकान बनाना जिंदगी की बड़ी उपलब्धियां थीं। पोते के लिए ये रोजमर्रा की सुविधाएं हैं। जिस दुनिया की कल्पना रघुनाथ प्रसाद नहीं कर सकते थे, उसमें मोहन कुमार सांस ले रहा है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, भारत के बदलते चेहरे की तस्वीर है। सत्तर साल में देश ने कितनी लंबी छलांग लगाई है!

अब सवाल उठता है क्या 140 करोड़ लोगों का देश एक पीढ़ी में अपनी तकदीर बदल सकता है? क्या गरीबी, भुखमरी और बदहाली से लड़ते हुए भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बन सकता है? भारत की हालिया यात्रा उम्मीद जगाती है। बदलाव की कहानी सामने है। मगर अभी जश्न मनाने के साथ आत्ममंथन भी जरूरी है।

विश्व बैंक के ताजा आंकड़े भारत के लिए बड़ी खुशखबरी लाए हैं। साल 2011 में देश की 27.1 प्रतिशत आबादी बेहद गरीब थी। 2023 तक यह आंकड़ा घटकर 2.6 प्रतिशत रह गया। रोजाना 4.20 डॉलर की ऊंची गरीबी सीमा पर भी तस्वीर बदली है। गरीबी 57.7 प्रतिशत से गिरकर 16.1 प्रतिशत पर आ गई। यानी बारह वर्षों में करीब 49.6 करोड़ लोग इस गरीबी रेखा से ऊपर उठे। विश्व बैंक इसे दुनिया में गरीबी घटने की सबसे तेज रफ्तार में गिनता है।

आजादी के समय लगभग 45 प्रतिशत भारतीय गरीबी में जी रहे थे। 2009-10 में सरकारी अनुमान 29.8 प्रतिशत था। 2011-12 में यह घटकर 21.9 प्रतिशत हुआ। 2014 में मोदी सरकार ने कमान संभाली। अर्थव्यवस्था में संभावनाएं थीं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी थी। बैंकिंग, सड़क, बिजली, पानी और रोजगार की हालत सुधारना बड़ी चुनौती थी।

मोदी सरकार ने विकास की नई रणनीति अपनाई। बुनियादी ढांचे, डिजिटल तकनीक, बैंकिंग और जनकल्याण योजनाओं पर जोर दिया। सरकारी मदद सीधे लोगों तक पहुंचाने की कोशिश हुई।

पहले सरकारी सहायता कई दरवाजों से गुजरती थी। रास्ते में बिचौलिए अपना हिस्सा निकाल लेते थे। जनधन, आधार और मोबाइल की तिकड़ी ने इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश की। करोड़ों गरीब बैंक खातों से जुड़े। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से सब्सिडी सीधे खातों में पहुंचने लगी।

डिजिटल भुगतान ने तो रोजमर्रा की जिंदगी बदल दी। सब्जीवाला, रिक्शा चालक और छोटी दुकान वाला भी मोबाइल से पैसा लेने लगा। यूपीआई ने आम आदमी को डिजिटल अर्थव्यवस्था का भागीदार बनाया। 2025-26 में इसके जरिए 24 हजार करोड़ से ज्यादा लेनदेन हुए। इनका कुल मूल्य करीब 314 लाख करोड़ रुपये रहा। यह केवल तकनीक की कामयाबी नहीं है। यह आर्थिक भागीदारी का नया दरवाजा है।

गरीबों की जिंदगी बदलने वाली कई योजनाओं ने भी अहम भूमिका निभाई। उज्ज्वला योजना के तहत 10.5 करोड़ से ज्यादा रसोई गैस कनेक्शन दिए गए। धुएं से भरे चूल्हों की जगह साफ ईंधन पहुंचा। स्वच्छ भारत मिशन ने 12 करोड़ से ज्यादा घरेलू शौचालय बनवाए।

जल जीवन मिशन के तहत गांवों में नल से पानी पहुंचाने का दायरा बढ़ा। 2019 में केवल 3.2 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन मिले थे। मई 2026 तक यह संख्या 15.8 करोड़ से ऊपर पहुंच गई।

प्रधानमंत्री आवास योजना ने लाखों परिवारों को पक्की छत दी। इनमें कई मकान महिलाओं के नाम पर हैं। आयुष्मान भारत ने गरीब परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा दी। अब 70 साल से ऊपर के बुजुर्ग भी इसके दायरे में हैं। मुफ्त अनाज योजना करीब 81 करोड़ लोगों को सहारा दे रही है।

अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए सड़कों, रेल, बिजली, बंदरगाहों और हवाई अड्डों का विस्तार जरूरी है। सरकार ने बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाया। एक्सप्रेसवे, मेट्रो, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे और माल ढुलाई गलियारे देश की तस्वीर बदल रहे हैं। बेहतर सड़कें बाजारों को करीब लाती हैं। रेल विद्युतीकरण और नए माल गलियारे परिवहन को मजबूत बनाते हैं।

आर्थिक विकास की रफ्तार भी उत्साहजनक है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक 2025-26 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.6 प्रतिशत रही। पिछले साल यह 7.1 प्रतिशत थी। घरेलू मांग, निवेश और सेवा क्षेत्र ने इसमें योगदान दिया।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखना होगा। 2023 में करीब 7.5 करोड़ भारतीय अब भी बेहद गरीब थे। 4.20 डॉलर वाली सीमा के नीचे रहने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थी। उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक कई इलाके आज भी बदहाली से जूझ रहे हैं।

अब नजर भारत से आगे पूरी दुनिया पर डालिए। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया में आज भी 80 से 85 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में जी रहे हैं। 1990 से अब तक करीब 150 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। लेकिन कोरोना महामारी, युद्ध, महंगाई और महंगी ऊर्जा ने प्रगति की रफ्तार रोक दी है।

भारत ने लंबी छलांग लगाई है। मगर विकसित राष्ट्र बनने की असली परीक्षा अभी बाकी है। एक्सप्रेसवे और योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ शिक्षित नागरिक, स्वस्थ समाज, मजबूत उद्योग और सम्मानजनक रोजगार भी चाहिए।

विकास का असली पैमाना अमीरों की बढ़ती दौलत नहीं, गरीबों की घटती तादाद है। भारत को ही नहीं, पूरी दुनिया को ऐसा विकास चाहिए जिसमें कोई पीछे न छूटे। गरीबी से मुक्ति पहली मंजिल है। सम्मान, समान अवसर और खुशहाली असली मंजिल हैं।

SP_Singh AURGURU Editor