दिल्ली में एक मंच पर इंडिया ब्लॉक, निशाने पर चुनाव आयोग और मोदी सरकार

दिल्ली के रामलीला मैदान में INDIA ब्लॉक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और कथित वोट चोरी के विरोध में बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव समेत विपक्ष के कई बड़े नेता एक मंच पर पहुंचे। राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को CEC पद से हटाने और जेल भेजे जाने की बात कही। ममता ने बंगाल में लोकतंत्र और अधिकारों के हनन का आरोप लगाया, जबकि अखिलेश ने उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा पर निशाना साधा। खड़गे का अलग गाड़ी से पहुंचना भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना। राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह रैली विपक्ष की एकजुटता, साझा एजेंडे और आगामी चुनावों की रणनीति का संकेत है। हालांकि इस एकजुटता की असली परीक्षा चुनावी मैदान में होगी।

Nov 1, 2026 - 23:02
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दिल्ली में एक मंच पर इंडिया ब्लॉक, निशाने पर चुनाव आयोग और मोदी सरकार
खुली बस में सवार होकर रामलीला मैदान की ओर जाते राहुल गांधी, प्रियंका, अखिलेश यादव आदि विपक्षी दलों के नेता।

रामलीला मैदान में सोनिया, राहुल, प्रियंका, ममता, अखिलेश और तेजस्वी समेत विपक्षी दिग्गजों का जमावड़ा 

राहुल की चेतावनी- ज्ञानेश कुमार CEC पद से हटेंगे और जेल जाएंगे

खड़गे का अलग गाड़ी से पहुंचना भी बना सियासी चर्चा का विषय 

नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक बार फिर चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और कथित वोट चोरी का मुद्दा विपक्षी एकजुटता का बड़ा आधार बनकर उभरा है। अलग-अलग विचारधारा, अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग राजनीतिक हितों वाली पार्टियां रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक मंच पर नजर आईं। मकसद एक था- मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक दबाव बनाना।

INDIA ब्लॉक की इस रैली को केवल विरोध प्रदर्शन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनावों से लेकर 2029 के लोकसभा चुनाव तक विपक्ष की राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश भी दिखाई देती है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राजद, नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और वामपंथी दलों के नेताओं की मौजूदगी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं के सवाल पर विपक्ष एक साझा मोर्चा बना सकता है।

शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जनमहाभियोग का प्रस्ताव पारित किया। इसके अगले दिन रामलीला मैदान में बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया गया। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और सुप्रिया सुले सहित कई प्रमुख चेहरे मौजूद रहे। करीब चार घंटे चले कार्यक्रम में आठ नेताओं ने भाषण दिए। पिछले 25 दिनों में SIR और चुनाव आयोग के विरोध में विपक्ष की यह सातवीं बड़ी एकजुटता थी। इससे पहले 6 से 13 अक्टूबर के बीच भी छह बार विरोध प्रदर्शन किए गए थे। लगातार हो रहे इन कार्यक्रमों से स्पष्ट है कि विपक्ष इस मुद्दे को किसी एक दिन की राजनीतिक गतिविधि तक सीमित नहीं रखना चाहता।

राहुल गांधी का सबसे आक्रामक हमला, ज्ञानेश कुमार को सीधे दी चुनौती

रैली का सबसे चर्चित भाषण राहुल गांधी का रहा। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि वह CEC के पद से हटेंगे और जेल जाएंगे। राहुल ने आरोप लगाया कि देश की जनता की आवाज को दबाने और उसके मतदान के अधिकार को प्रभावित करने की कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार रात में सो नहीं पाते होंगे, क्योंकि उन्होंने देश की आवाज दबाने का अपराध किया है। राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधते हुए कहा कि वे भी चैन से नहीं सो पा रहे होंगे।

राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा कि यह किसी एक राजनीतिक दल या नेता का आंदोलन नहीं है, बल्कि देश के लोकतंत्र और संविधान को बचाने की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि विपक्ष नफरत की राजनीति नहीं करता, बल्कि मोहब्बत का संदेश देता है। मोदी, शाह और ज्ञानेश कुमार से उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है, लेकिन संविधान और लोकतंत्र पर हमला स्वीकार नहीं किया जाएगा।

राहुल ने अडाणी का मुद्दा उठाते हुए भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि देश के संसाधनों को कारोबारी मित्रों के हवाले करने का हिसाब लिया जाएगा और किसी को भागने नहीं दिया जाएगा। उनके इस बयान से साफ है कि कांग्रेस चुनाव आयोग के मुद्दे को केवल संस्थागत विवाद के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक और आर्थिक सवालों से जोड़कर आगे बढ़ाना चाहती है।

2024 के चुनाव को लेकर राहुल का गंभीर आरोप

राहुल गांधी ने अपने भाषण में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आंकड़ों का हवाला देते हुए 2024 के लोकसभा चुनाव की वैधता पर सवाल खड़े किए। उन्होंने दावा किया कि चुनाव के बाद 13.5 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। उनके मुताबिक सात में से एक मतदाता यानी करीब 15 प्रतिशत मतदाताओं को सूची से बाहर किया गया। राहुल ने यह भी दावा किया कि 2024 में वोट प्रतिशत का अंतर महज तीन प्रतिशत था और इसी आधार पर उन्होंने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के आंकड़ों से जुड़ा विषय है।

हालांकि, मतदाता सूची से नाम हटने और चुनाव की वैधता के बीच संबंध को लेकर राहुल के दावों की स्वतंत्र जांच और आंकड़ों का संदर्भ महत्वपूर्ण होगा। राजनीतिक रूप से यह बयान इसलिए अहम है, क्योंकि कांग्रेस अब वोट चोरी के आरोप को केवल चुनावी नारे के रूप में नहीं, बल्कि 2024 के जनादेश पर सवाल उठाने वाले मुद्दे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

खड़गे का अलग गाड़ी से पहुंचना, विपक्षी एकता के बीच नेतृत्व का सवाल

रैली के दौरान एक राजनीतिक घटनाक्रम ने अलग से ध्यान खींचा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे राहुल गांधी और INDIA ब्लॉक के अन्य नेताओं के साथ ओपन गाड़ी में सवार होकर मार्च में शामिल नहीं हुए। वह अपनी अलग कार से रामलीला मैदान पहुंचे। पहली नजर में यह सामान्य व्यवस्था या सुरक्षा संबंधी निर्णय लग सकता है, लेकिन विपक्षी राजनीति के मौजूदा संदर्भ में इस दृश्य की प्रतीकात्मक व्याख्या भी की जा रही है।

एक तरफ राहुल गांधी रैली के सबसे प्रमुख और आक्रामक वक्ता के रूप में सामने आए, तो दूसरी तरफ खड़गे ने अलग वाहन से पहुंचकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई। इसे कांग्रेस के भीतर किसी मतभेद का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि INDIA ब्लॉक के इस साझा आंदोलन में राजनीतिक नेतृत्व और सार्वजनिक चेहरे की भूमिका किस तरह तय हो रही है।

खड़गे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और विपक्षी एकजुटता की औपचारिक राजनीति में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। वहीं राहुल गांधी पार्टी के प्रमुख राजनीतिक अभियान और सरकार विरोधी विमर्श का चेहरा हैं। ऐसे में दोनों नेताओं की अलग-अलग मौजूदगी को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा सकता है, हालांकि इसके पीछे किसी मतभेद की पुष्टि नहीं होती।

ममता बनर्जी का आक्रामक अंदाज

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रैली में बेहद आक्रामक भाषण दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल में लोकतंत्र, अधिकार, नौकरियां और महिलाओं का सम्मान छीना गया है। ममता ने कहा कि उनकी पार्टी इस लड़ाई को छोड़ेगी नहीं और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगी। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया और मतगणना को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उनके भाषण में बंगाल की राजनीति का दर्द और आगामी चुनावी संघर्ष दोनों दिखाई दिए। ममता के लिए SIR का मुद्दा केवल राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची और चुनावी समीकरणों से सीधे जुड़ा हुआ है।

यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है। ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच कई राज्यों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है। इसके बावजूद रामलीला मैदान में दोनों का एक साथ खड़ा होना यह बताता है कि चुनाव आयोग के मुद्दे पर विपक्ष फिलहाल अपने आपसी मतभेदों को पीछे रखने की कोशिश कर रहा है।

अखिलेश यादव का यूपी कनेक्शन, 2027 के चुनाव की दिखाई झलक

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने भाषण में उत्तर प्रदेश की राजनीति को केंद्र में रखा। उन्होंने भाजपा पर चुनाव आयोग को हथियार बनाकर लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाया। अखिलेश ने कहा कि उत्तर प्रदेश में एक करोड़ 27 लाख हिंदू मतदाताओं के नाम काटे जाने की बात सामने आई है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ये सभी लोग भी पाकिस्तानी हैं? उनका यह बयान भाजपा की उस राजनीति पर कटाक्ष था, जिसमें विपक्षी दलों के मुताबिक मतदाता सूची के विवाद को धार्मिक और राजनीतिक पहचान से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

अखिलेश ने रामलीला मैदान का जिक्र करते हुए कहा कि यह रामजी की लीला का मैदान है और पाप करने वालों का अंत होता है। उन्होंने चंदा चोरी और चढ़ावा चोरी के आरोप लगाकर भाजपा पर हमला बोला। उनका सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से जुड़ा था। अखिलेश ने कहा कि उत्तर प्रदेश के लोग स्वागत करना जानते हैं तो विदाई भी अच्छी तरह करना जानते हैं। यह स्पष्ट संकेत था कि INDIA ब्लॉक की दिल्ली रैली को सपा अपने राज्य के चुनावी अभियान से भी जोड़ रही है। उत्तर प्रदेश में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई है। ऐसे में मतदाता सूची का विवाद आने वाले चुनाव में दोनों दलों के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है।

फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने उठाया जम्मू-कश्मीर का सवाल

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने अपने भाषण में देश की एकता और संविधान की समानता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को बार-बार पाकिस्तानी बताने की राजनीति बंद होनी चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि देश की आजादी और सुरक्षा के लिए मुसलमानों ने भी बलिदान दिया है। फारूक ने कहा कि हमें केवल भगवान से डरना चाहिए, किसी राजनीतिक ताकत से नहीं। उन्होंने सभी भारतीयों को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार देने की मांग की।

पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने भी केंद्र सरकार की नीतियों पर निशाना साधा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते देश की दिशा को लेकर सवाल नहीं उठाए गए तो हालात और गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के अनुभवों का उल्लेख करते हुए आशंका जताई कि कहीं पूरे देश को उसी तरह के हालात की ओर न धकेल दिया जाए। इन दोनों नेताओं की मौजूदगी से रैली को केवल उत्तर भारत या कांग्रेस केंद्रित आंदोलन के बजाय व्यापक विपक्षी मंच का स्वरूप देने की कोशिश दिखाई दी।

तेजस्वी यादव ने महाभारत का उदाहरण देकर साधा निशाना

राजद नेता तेजस्वी यादव ने अपने भाषण में रामलीला मैदान को महाभारत के कुरुक्षेत्र से जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर यहां रामलीला होती है, लेकिन वोट चोरी करने वालों के खिलाफ विपक्ष को महाभारत लड़नी पड़ रही है। तेजस्वी ने शकुनि और उसके पासे का उदाहरण देते हुए चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका भाषण बिहार की राजनीति और वहां हुए चुनावी विवादों की पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण रहा। बिहार में विपक्ष के लिए मतदाता सूची का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। ऐसे में तेजस्वी की मौजूदगी और उनका भाषण यह संकेत देता है कि राजद भी इस राष्ट्रीय अभियान को अपने राज्य की राजनीतिक लड़ाई से जोड़कर देख रही है।

खड़गे ने मोदी सरकार को घेरा

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सरकार युवाओं तथा महिलाओं के मतदान अधिकारों को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र और कई राज्यों की सरकारें चुनावी प्रक्रिया के जरिए सत्ता में बनी हुई हैं। खड़गे ने कहा कि सरकार चाहे ED और CBI जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल करे, विपक्ष डरने वाला नहीं है। उनके भाषण का मुख्य उद्देश्य विपक्षी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में संघर्ष का संदेश देना था। खड़गे ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग दोहराते हुए कहा कि विपक्ष लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेगा।

क्या सचमुच बन रहा है मजबूत विपक्ष

इस रैली का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश INDIA ब्लॉक के प्रमुख नेताओं का एक साथ आना रहा। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच कई मुद्दों पर मतभेद रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा के अपने राजनीतिक हित हैं। बिहार में राजद की अलग चुनावी प्राथमिकताएं हैं। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के बीच भी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है। इसके बावजूद इन सभी दलों का एक मंच पर आना बताता है कि चुनाव आयोग और SIR का मुद्दा विपक्ष को साझा राजनीतिक आधार दे रहा है।

हालांकि, केवल रैली में एक साथ खड़े होने से विपक्षी एकता की स्थायी मजबूती साबित नहीं होती। असली परीक्षा तब होगी जब अलग-अलग राज्यों में सीटों का बंटवारा, नेतृत्व का सवाल और चुनावी रणनीति तय होगी। राहुल गांधी का आक्रामक रुख, ममता बनर्जी का बंगाल केंद्रित हमला, अखिलेश यादव का उत्तर प्रदेश का चुनावी संदेश और तेजस्वी का बिहार की राजनीति से जुड़ा भाषण यह दिखाता है कि हर नेता राष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल अपनी क्षेत्रीय राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए भी कर रहा है।

भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती या विपक्ष का चुनावी नैरेटिव?

रामलीला मैदान की रैली को भाजपा के लिए तत्काल चुनावी खतरे के रूप में देखना उचित नहीं होगा, लेकिन इसे विपक्ष की रणनीतिक तैयारी के संकेत के रूप में जरूर समझा जा सकता है। विपक्ष ने तीन बड़े मुद्दों को एक साथ जोड़ने की कोशिश की है।

1. चुनाव आयोग की निष्पक्षता: ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आरोपों और इस्तीफे की मांग के जरिए चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाना।

2. मतदाता सूची और वोट का अधिकार: SIR के माध्यम से नाम कटने के आरोपों को आम मतदाता, खासकर गरीब, युवा और वंचित वर्गों के अधिकारों से जोड़ना।

3. संविधान और लोकतंत्र: चुनावी विवाद को व्यापक संवैधानिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करना, ताकि अलग-अलग राज्यों के मतदाताओं को एक साझा राजनीतिक संदेश दिया जा सके।
दूसरी तरफ भाजपा के लिए चुनौती यह है कि विपक्ष के इन आरोपों का राजनीतिक और तथ्यात्मक जवाब दिया जाए। चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों पर पारदर्शिता और स्पष्ट जानकारी देना संस्थागत भरोसे के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगा।

रैली से ज्यादा महत्वपूर्ण है विपक्ष का साझा एजेंडा

दिल्ली की इस रैली का महत्व नेताओं की संख्या या मंच पर मौजूद बड़े चेहरों से आगे जाता है। पिछले 25 दिनों में सात बार एकजुट होकर विपक्ष ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि वह चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर लगातार दबाव बना सकता है। राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जेल तक जाने की चेतावनी देकर आंदोलन को आक्रामक दिशा दी। ममता बनर्जी ने बंगाल की चुनावी परिस्थितियों को सामने रखा। अखिलेश यादव ने 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव की भूमिका तैयार की, जबकि तेजस्वी यादव ने बिहार की राजनीतिक जमीन से इस मुद्दे को जोड़ा।

खड़गे का अलग गाड़ी से पहुंचना भी चर्चा में रहा, लेकिन रैली की असली राजनीतिक तस्वीर यह थी कि विपक्ष के अलग-अलग चेहरे अपने-अपने क्षेत्रीय हितों के बावजूद एक साझा मंच पर खड़े दिखाई दिए। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह एकजुटता सड़क से संसद, कानूनी लड़ाई और आगामी विधानसभा चुनावों तक कायम रह पाएगी? क्या विपक्ष अपने आरोपों को दस्तावेजी और कानूनी आधार पर साबित कर पाएगा? और क्या वह मतदाता सूची के मुद्दे को आम जनता के बीच व्यापक जनआंदोलन में बदल सकेगा?

फिलहाल रामलीला मैदान से विपक्ष ने भाजपा और चुनाव आयोग को राजनीतिक चुनौती देने की कोशिश की है। लेकिन इस शक्ति प्रदर्शन की वास्तविक सफलता का फैसला रैली में जुटी भीड़ नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में विपक्ष की संगठनात्मक एकजुटता, कानूनी कार्रवाई और चुनावी परिणाम करेंगे।