4000 करोड़ की जमीन के लीजबैक मामले में वरिष्ठ पीसीए अधिकारी हरीश चंद्र बर्खास्त, नोएडा प्राधिकरण के तत्कालीन सचिव पर नियमों के विपरीत जमीन लीजबैक कराने और भ्रामक रिपोर्ट देने के आरोप विभागीय जांच में सिद्ध
लखनऊ। नोएडा प्राधिकरण से जुड़े करीब 4000 करोड़ रुपये की बाजार कीमत वाली जमीन के लीजबैक मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी हरीश चंद्र को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया है। शासन की विभागीय जांच में उनके कार्यकाल के दौरान जमीन के लीजबैक में गंभीर अनियमितताएं, तथ्यों को छिपाने और भ्रामक रिपोर्ट प्रस्तुत करने से जुड़े आरोप सिद्ध पाए गए। नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने 28 सितंबर को उनकी बर्खास्तगी का आदेश जारी किया।
हरीश चंद्र 1997 बैच के पीसीएस अधिकारी हैं। वह नोएडा प्राधिकरण में सचिव पद पर तैनात रह चुके हैं। यह मामला नोएडा के शाहदरा गांव से जुड़ी उस जमीन के लीजबैक से संबंधित है, जिसे प्राधिकरण ने अधिग्रहित कर अपने कब्जे में लिया था। यह जमीन सेक्टर-140ए, 141, 142 और 143 के आसपास बताई गई है।
3.81 लाख वर्गमीटर जमीन के लीजबैक पर उठे सवाल
विभागीय जांच में करीब 3,81,527 वर्गमीटर जमीन के लीजबैक को जांच के दायरे में रखा गया। जांच रिपोर्ट में इस जमीन का बाजार मूल्य करीब 4000 करोड़ रुपये आंका गया था। कुछ रिपोर्टों में जांच से संबंधित भूमि का क्षेत्रफल करीब 4,00,447 वर्गमीटर भी दर्ज किया गया है। इसलिए 4000 करोड़ रुपये को जमीन के अनुमानित बाजार मूल्य के रूप में देखा जाना चाहिए, इसे सीधे नकद घोटाले की रकम नहीं माना जाना चाहिए।
जांच के अनुसार शाहदरा गांव की आबादी के निस्तारण के लिए सर्वे कराया गया था। आरोप था कि आबादी के निर्धारण में उपलब्ध सैटेलाइट इमेज का इस्तेमाल नहीं किया गया और सर्वे रिपोर्ट में ऐसे भू-स्वामियों, निजी कंपनियों तथा गांव के बाहर रहने वाले लोगों को भी शामिल किया गया, जिनकी पात्रता पर सवाल उठे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां संबंधित समितियों और अधिकारियों के सामने पूरी तरह नहीं रखी गईं।
बाहरी लोगों और निजी कंपनियों को जमीन देने का मामला
जांच में यह भी सामने आया कि लीजबैक की प्रक्रिया में शाहदरा गांव के बाहर के लोगों और निजी कंपनियों के नाम जमीन किए जाने के आरोप थे। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक एस्टर इलेक्ट्रिक प्राइवेट लिमिटेड, महानंदा इलेक्ट्रॉनिक प्राइवेट लिमिटेड और प्रयास गारमेंट लिमिटेड से संबंधित जमीन और राजस्व अभिलेखों की जानकारी भी जांच में सामने आई।
जांच रिपोर्ट के अनुसार लीजबैक से संबंधित समितियों के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट में जमीन और संबंधित पक्षों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया। इसी आधार पर हरीश चंद्र की भूमिका को विभागीय जांच में गंभीर अनियमितताओं से जोड़ा गया।
2013 में शुरू हुई थी विभागीय कार्रवाई
इस मामले में कार्रवाई नई नहीं है। उपलब्ध शासनादेश संबंधी रिपोर्टों के अनुसार हरीश चंद्र के खिलाफ विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई की प्रक्रिया 2013 में शुरू हुई थी। 27 सितंबर 2013 को गंभीर अनियमितताओं के आरोपों की जांच के लिए मेरठ के मंडलायुक्त को जांच सौंपी गई थी। इसके बाद विभागीय जांच आगे बढ़ी और आरोपों पर प्रक्रिया लंबे समय तक चली।
शासन के आदेश में लोक सेवा आयोग, प्रयागराज की 6 जनवरी 2022 की सहमति और इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के 3 सितंबर 2026 के आदेश में सामने आए तथ्यों को भी बर्खास्तगी की कार्रवाई के आधार में शामिल किया गया है। इसके बाद शासन ने विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई में सिद्ध आरोपों के आधार पर सेवा समाप्त करने का फैसला किया।
लीजबैक नियमों के पालन पर था पूरा विवाद
मामले का मूल विवाद नोएडा प्राधिकरण की जमीन के लीजबैक और आबादी निस्तारण की प्रक्रिया से जुड़ा था। जांच में नियमों के मुताबिक पात्रता, जमीन के क्षेत्रफल और संबंधित लाभार्थियों की स्थिति की जांच में कथित गड़बड़ियों को प्रमुख आधार बनाया गया। रिपोर्टों के अनुसार एक परिवार के लिए लीजबैक की सीमा 450 वर्गमीटर तक निर्धारित थी, जबकि जांच के दायरे में इससे काफी बड़े भूखंडों और बाहरी लोगों तथा निजी कंपनियों को जमीन दिए जाने की बात सामने आई।
सरकार की कार्रवाई का आधार विभागीय जांच में सिद्ध आरोप हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि करीब 4000 करोड़ रुपये का आंकड़ा संबंधित जमीन के अनुमानित बाजार मूल्य से जुड़ा है।