संस्कार भारती की 22वीं नमन काव्य गोष्ठी में गूंजे राष्ट्र, संस्कृति और संवेदना के स्वर, कविता का स्वर कंठ से निकले, मोबाइल से नहीं: बांकेलाल गौड़

आगरा। संस्कार भारती, आयोजन समिति आगरा पश्चिम, आगरा महानगर, ब्रज प्रान्त के तत्वावधान में जयपुर हाउस स्थित माधव भवन में 22वीं नमन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में संस्कार भारती के अखिल भारतीय अधिकारी एवं प्रचारक बांकेलाल गौड़ ने कवियों से काव्यपाठ की परंपरा को जीवंत बनाए रखने का आह्वान करते हुए कहा कि कवियों को कागज या मोबाइल देखकर कविता पढ़ने से बचना चाहिए और काव्य का प्रस्तुतीकरण स्मृति एवं भाव के साथ होना चाहिए।

Sep 29, 2026 - 21:33
 0
संस्कार भारती की 22वीं नमन काव्य गोष्ठी में गूंजे राष्ट्र, संस्कृति और संवेदना के स्वर, कविता का स्वर कंठ से निकले, मोबाइल से नहीं: बांकेलाल गौड़
संस्कार भारती की 22वीं नमन काव्य गोष्ठी में मौजूद कवि।

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्कार भारती के अखिल भारतीय अधिकारी एवं प्रचारक बांकेलाल गौड़, आचार्य यादराम सिंह कविकिंकर, वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार डॉ. ब्रज बिहारी लाल बिरजू, वरिष्ठ कवयित्री विजया तिवारी तथा प्रांतीय महामंत्री नन्द नन्दन गर्ग ने मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया।

ब्रजभाषा के वरिष्ठ कवि डॉ. ब्रज बिहारी लाल बिरजू ने सरस्वती वंदना का सस्वर गायन करते हुए कहा—

"कठिन अपने पराये की, यहां पहचान होती है।
मलिन मन-भावना से, कामना अनजान होती है।"

राष्ट्रीय ओज कवि मोहित सक्सेना ने कविता के माध्यम से वचन की महत्ता का वर्णन किया—

"विश्वमित्र पर टल सकता है मोह मेनका छवि का,
सब टल जाए किन्तु नहीं टल सकता वचन कवि का।"

राष्ट्रीय कवि हिरेंद्र नरवार 'हृदय' ने शहीद भगत सिंह के व्यक्तित्व को अपनी पंक्तियों में उकेरा—

"जो भारत आजाद कराने की सौगंध उठाता है,
वो भारत माँ का बेटा ही भगत सिंह कहलाता है।"

कवि संजय कुमार एडवोकेट ने विश्वास और साथ निभाने का संदेश दिया—

"जो आँख मिंच कर वो तुम्हारे साथ चलते,
उनका साथ भी कभी छोड़ना न चाहिए।"

आचार्य यादराम सिंह कविकिंकर ने अपने एकल काव्यपाठ से श्रोताओं को भावविभोर किया—

"आनन्द अनन्त भरे उर में, दिव्य करे मन वाणी को,
उस अनुभूति के अमृत कण, हे राम मिलें हर प्राणी को।"

ब्रजभाषा की वरिष्ठ कवयित्री मीना शर्मा ने समय और समाज की अनुभूतियों को स्वर दिया—

"सतयुग से कलयुग तक हम सब मन-वचन-कर्म से डटे रहे,
फिर हम सब क्यों कह रहे, फिर हम सब क्यों बह रहे।"

कवि रामेश्वर दयाल ने प्रकृति से सीखने का संदेश दिया—

"पेड़ों की शाखों से सीखा ऊपर ही उठते जाना है,
अगर लदी हो फलों से डाली तो थोड़ा सा झुक जाना है।"

कवयित्री मोहिनी भटनागर ने पितृपक्ष की भावनाओं को व्यक्त किया—

"आश्विन मास में मन में श्रद्धा के दीप जले,
भारत की धरती पर पितरों का आगमन हुआ।"

कवि रूपेश कुलश्रेष्ठ 'स्नेह' ने मानवीय संवेदनाओं को स्वर दिया—

"बार-बार क्यों दर्द एक ही मुझको छूकर जाता है,
जिसको जब भी चाहा मैंने, वही दगा दे जाता है।"

प्रकाश गुप्ता 'बेबाक' ने प्रेम की अनुभूतियों को व्यक्त किया—

"कैसे भूलोगी हमको बता दो प्रिय,
नैन का नीर आँचल भिगो जाएगा।"

पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. नीलम भटनागर ने आध्यात्मिक अनुभूति को कविता में पिरोया—

"जब मैं थी तब रचती थी कविता,
सद्गुरु के प्रेम से जीवन ही कविता बन गया।"

कवयित्री अलका शर्मा ने राष्ट्रभक्ति की भावना व्यक्त की—

"बलिदानों की इस भूमि को हरगिज़ नहीं झुकने देंगे,
मेरा शेर दहाड़ता आया था, मेरा शेर दहाड़ता आएगा।"

काव्य गोष्ठी में प्रभुदत्त उपाध्याय, रश्मि सिंह, आचार्य उमाशंकर पाराशर, डॉ. रमा रश्मि, डॉ. मंजू स्वाति, राकेश शर्मा दद्दू, डॉ. राजीव शर्मा निस्पृह, डॉ. कुसुम चतुर्वेदी, डॉ. रामेंद्र शर्मा रवि, काँची सिंघल 'ओस', अलका अग्रवाल, प्रणव कुमार कुलश्रेष्ठ तथा टूंडला सहित अनेक कवियों ने काव्यपाठ किया।

कार्यक्रम का संचालन संजय कुमार एडवोकेट एवं अलका शर्मा ने संयुक्त रूप से किया। संयोजन प्रभुदत्त उपाध्याय ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्कार भारती के कोषाध्यक्ष राजीव सिंघल ने व्यक्त किया।

इस अवसर पर पत्रकार डॉ. महेश धाकड़, नन्द किशोर, कुमार ललित, अमित भटनागर, हुकम सिंह सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

SP_Singh AURGURU Editor