ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा सियासी झटका! विपक्षी एकता की बैठक के बीच टीएमसी के 20 सांसदों ने दिखाए बागी तेवर, मोदी सरकार को समर्थन, 60 विधायकों के बाद अब संसद में भी दरकी पार्टी, ‘ऑपरेशन बंगाल’ ने बदले समीकरण
दिल्ली में विपक्षी बैठक के समानांतर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर टीएमसी सांसदों की मौजूदगी, बाद में शताब्दी रॉय के घर पर लगभग 20 सांसदों की बैठक, सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा और पहले 60 विधायकों की अलग राजनीतिक लाइन और अब 20 सांसदों द्वारा मोदी सरकार को समर्थन देने का ऐलान, ये सभी घटनाएं संकेत दे रही हैं कि टीएमसी के भीतर असंतोष अब संगठित रूप ले चुका है। ममता बनर्जी को अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी संगठनात्मक चुनौती का सामना कर रही हैं।
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में समय और स्थान का अपना संदेश होता है। दिल्ली में जिस दिन ममता बनर्जी के अनुरोध पर इंडिया गठबंधन की बैठक हो रही थी और विपक्ष मोदी सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा था, उसी समय कुछ दूरी पर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर टीएमसी के दर्जन भर से अधिक सांसदों की मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी। राजनीतिक दृष्टि से यह महज संयोग नहीं माना जाएगा। शाम होते-होते टीएमसी के बागी सांसदों की संख्या 20 हो गई। इन सांसदों द्वारा एनडीए सरकार को समर्थन का दावा भी कर दिया गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बैठक में केवल सांसदों की मौजूदगी ही चर्चा का विषय नहीं बनी, बल्कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की उपस्थिति ने भी संकेत दिया कि ऒपरेशन टीएमसी की पटकथा लिखी जा चुकी है।
भूपेंद्र यादव के आवास से शताब्दी रॉय के घर तक- बगावत की दूसरी कड़ी
राजनीतिक घटनाक्रम का दूसरा और शायद अधिक महत्वपूर्ण चरण तब सामने आया, जब बाद में टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय के आवास पर बागी सांसदों की बैठक हुई। बताया जा रहा है कि इस बैठक में काकोली घोष, अबू ताहिर, बापी हलदार, असित कुमार, जगदीश बसुनिया समेत लगभग 20 सांसद मौजूद थे।
यदि यह संख्या सही है, तो इसका अर्थ है कि टीएमसी के कुल 29 सांसदों में से लगभग दो-तिहाई सांसद एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं। भारतीय राजनीति में दो-तिहाई संख्या केवल गणित नहीं होती, बल्कि शक्ति का प्रदर्शन भी होती है। यही वह संख्या है जो किसी भी राजनीतिक दल के भीतर नेतृत्व परिवर्तन, अलग गुट या नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा को गंभीर बना देती है।
शाम होते-होते टीएमसी की सांसद काकोली घोष ने दावा किया है कि पार्टी के 20 सांसदों ने एनडीए सरकार को अपना समर्थन दे दिया है। पार्टी ने संसद में अपनी सीटें अलग करने के लिए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र भी लिख दिया है।
सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा असंतोष का सार्वजनिक संकेत
टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय का पार्टी से इस्तीफा इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक गंभीर बना देता है। अक्सर राजनीतिक असंतोष बंद कमरों तक सीमित रहता है, लेकिन जब कोई वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देता है, तो वह संकेत होता है कि मतभेद अब संगठनात्मक संकट का रूप ले चुके हैं।
विशेष रूप से तब, जब उनका नाम भी उन नेताओं में लिया जा रहा हो जो भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई बैठक में मौजूद थे। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि असंतुष्ट खेमा केवल नाराज नहीं है, बल्कि अगली राजनीतिक चाल की तैयारी में भी जुटा है।
विधायकों के बाद सांसद, क्या यह टीएमसी में असंतोष की दूसरी लहर?
दिल्ली में चले आज के घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे पहले नव-निर्वाचित टीएमसी विधायकों में से लगभग 60 विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुनकर पार्टी नेतृत्व को झटका दे चुके हैं। विधायकों के बाद अब सांसदों का बड़ा वर्ग भी अलग राह चुन चुका है तो यह किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर लंबे समय से पनप रहे असंतोष का संकेत है जो पार्टी की बुरी हार के बाद फूटकर सामने आ रहा है।
राजनीतिक दलों में असहमति सामान्य होती है, लेकिन जब असंतोष विधानसभा से निकलकर संसद तक पहुंच जाए, तब वह नेतृत्व के अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है।
महुआ मोइत्रा का हमला बताता है कि खतरा कितना बड़ा है
टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा का बागी सांसदों को गद्दार कहना केवल राजनीतिक बयान नहीं है। यह उस बेचैनी का संकेत है जो टीएमसी नेतृत्व के भीतर दिखाई दे रही है। महुआ का यह कहना कि हिम्मत है तो भाजपा के टिकट पर जीतकर दिखाएं, इस बात का प्रमाण है कि पार्टी अब इस घटनाक्रम को गंभीर चुनौती के रूप में देख रही है।
भाजपा की रणनीति- विपक्ष को कमजोर करना
यदि इन बैठकों का परिणाम किसी बड़े राजनीतिक पुनर्संयोजन के रूप में सामने आता है, तो यह भाजपा के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता होगी। चुनावी हार-जीत से अलग, किसी मजबूत क्षेत्रीय दल के भीतर सेंध लगाना और उसके प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ना राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन बदल सकता है। भूपेंद्र यादव जैसे संगठनात्मक रणनीतिकार की मौजूदगी इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है।
सबसे बड़ा सवाल- क्या टीएमसी खंड-खंड हो चुकी है?
भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठक, उसके बाद शताब्दी रॉय के घर पर लगभग 20 सांसदों की मौजूदगी और बाद में इनका एनडीए सरकार को समर्थन, सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा, पहले 60 विधायकों की अलग राजनीतिक लाइन और महुआ मोइत्रा की तीखी प्रतिक्रिया, इन सभी घटनाओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
ये घटनाएं मिलकर संकेत देती हैं कि ममता का किला दरक रहा है। ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा झटका ये है कि ये सब कुछ उस समय हुआ जब वे स्वयं दिल्ली में मौजूद थीं। वे अपनी आंखों के सामने पार्टी को अपने हाथों से फिसलती देख रही थीं।