क्या हमारे स्कूल सिर्फ़ कॉकरोच फैक्ट्री ही रहेंगे, या बदलाव की नर्सरी बनेंगे?
भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था बुनियादी चुनौतियों से जूझ रही है। सरकारी स्कूलों से छात्रों का लगातार निजी स्कूलों की ओर रुख, एकल शिक्षक वाले विद्यालयों की बड़ी संख्या, कमजोर सीखने की क्षमता, बढ़ते ड्रॉपआउट, शिक्षा में असमानता और घटते सरकारी निवेश ने शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था, रटने की प्रवृत्ति और जीवनोपयोगी कौशलों की कमी के कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थी प्रमाणपत्र तो हासिल कर रहे हैं, लेकिन ज्ञान, आत्मविश्वास और व्यावहारिक क्षमता से वंचित रह जाते हैं। बदलते समय में भारत को केवल अधिक स्कूलों या परीक्षाओं की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जो बच्चों को बेहतर नागरिक, सक्षम पेशेवर और जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार कर सके।
-बृज खंडेलवाल-
जैन जी का आंदोलन तो फिलहाल समाप्त हो गया है, लेकिन गालियों के रूप में जो मलवा सोशल मीडिया पर बिखर चुका है, उस से अनेक असहज सवालात अंतरिक्ष भ्रमण कर रहे हैं!
अगर हमारे स्कूल सचमुच शिक्षा के मंदिर हैं, तो उनसे निकल रही पीढ़ी संवाद, सहिष्णुता और तर्क के बजाय इतनी जल्दी नफ़रत और अपशब्दों की भाषा क्यों सीख रही है?
अगर करोड़ों रुपये खर्च करके स्कूल खड़े किए जाएँ, लेकिन बच्चा एक साधारण पैराग्राफ भी न पढ़ सके, तो ऐसी शिक्षा का क्या अर्थ है?
अगर सरकारी स्कूल सचमुच बेहतर हैं, तो लाखों माता-पिता हर साल उन्हें छोड़कर निजी स्कूलों की शरण में क्यों जा रहे हैं?
और अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था सही रास्ते पर है, तो हाल ही में हजारों युवा जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा में गड़बड़ियों के खिलाफ न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग लेकर सड़कों पर क्यों उतर आए?
ये तीन अलग-अलग सवाल नहीं हैं। ये एक ही बीमारी के तीन लक्षण हैं। बीमारी हमारे स्कूलों की इमारतों में नहीं, हमारी शिक्षा की बुनियाद में है। "सवाल सिर्फ स्कूलों का नहीं, उस समाज का है जिसे हमारे स्कूल गढ़ रहे हैं।"
यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 की ताज़ा रिपोर्ट इस बेचैन करने वाली सच्चाई की पुष्टि करती है। भारत की स्कूली शिक्षा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कुछ उपलब्धियां दिखती हैं, लेकिन उनसे कहीं बड़े संकट भी सामने आते हैं। एक तरफ सुधार होता है, दूसरी तरफ व्यवस्था की कोई और कमजोरी उसे पीछे धकेल देती है।
देश में कुल छात्र संख्या 24.80 करोड़ से घटकर 24.72 करोड़ रह गई। अकेले सरकारी स्कूलों से लगभग 86 लाख बच्चे कम हुए, जबकि निजी स्कूलों में 88 लाख से अधिक नए छात्र जुड़े। माता-पिता अपने फैसले से साफ संदेश दे रहे हैं। एक ही वर्ष में 8,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो गए। अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की संख्या भी घटी। आज भी एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जहां लगभग 34 लाख बच्चों को एक साथ कई कक्षाओं में पढ़ाया जाता है।
लेकिन सबसे बड़ा संकट स्कूल की इमारतों में नहीं, कक्षाओं के भीतर है। एएसईआर 2024 बताता है कि महामारी के बाद कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन हालात अभी भी चिंताजनक हैं। कक्षा तीन के केवल लगभग एक चौथाई बच्चे ही कक्षा दो का पाठ ठीक से पढ़ सकते हैं। लगभग दो-तिहाई बच्चे साधारण घटाव तक नहीं कर पाते। पारख (PARAKH) और नीति आयोग की रिपोर्टें बताती हैं कि कक्षा छह के अनेक विद्यार्थी साधारण भिन्न और रोजमर्रा की गणितीय समझ में भी कमजोर हैं। आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते पढ़ने की क्षमता भी पहले से गिर चुकी है।
यानी बच्चे कक्षा तो पास कर रहे हैं, लेकिन सीख नहीं रहे। उनके हाथ में प्रमाणपत्र है, पर आत्मविश्वास नहीं। अंक हैं, लेकिन ज्ञान नहीं।
स्कूलों में बिजली, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाएं बढ़ी हैं। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन हजारों स्कूलों में आज भी खेल का मैदान नहीं है, दिव्यांगों के लिए सुविधाएं नहीं हैं, कंप्यूटर काम नहीं करते और इंटरनेट केवल कागज़ों में मौजूद है।
शिक्षा पर सरकारी खर्च भी चिंता बढ़ाता है। पिछले एक दशक में केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी लगातार घटी है। कम निवेश का सीधा असर शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है। इमारतें जल्दी बन सकती हैं, लेकिन भरोसा धीरे-धीरे बनता है।
देश की स्कूली शिक्षा पांच बड़ी बीमारियों से जूझ रही है। सबसे बड़ी बीमारी है कमजोर सीखने की क्षमता। बच्चे वर्षों तक स्कूल जाते हैं, लेकिन पढ़ना, लिखना और साधारण गणित तक ठीक से नहीं सीख पाते।
दूसरी समस्या है बीच रास्ते पढ़ाई छोड़ देना। पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाले लगभग आधे बच्चे बारहवीं तक पहुंच ही नहीं पाते। हर स्तर पर स्कूल बदलने की मजबूरी ड्रॉपआउट का खतरा बढ़ाती है।
तीसरी चुनौती है शिक्षकों की भारी कमी। एक लाख से अधिक स्कूल आज भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।
चौथी समस्या है शिक्षा व्यवस्था का बिखराव। प्राथमिक स्कूल बहुत हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल अपेक्षाकृत कम। बच्चों को बार-बार स्कूल बदलना पड़ता है, जिससे पढ़ाई की निरंतरता टूट जाती है।
पांचवीं चुनौती है गहरी असमानता। राज्यों, आय वर्गों और सामाजिक समूहों के बीच शिक्षा की गुणवत्ता में भारी अंतर है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों की सीखने की क्षमता अब भी पीछे है।
समस्या यहीं खत्म नहीं होती। देश में दर्जनों शिक्षा बोर्ड, अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां चल रही हैं। सीबीएसई, सीआईएससीई, एनआईओएस, राज्य बोर्ड, संस्कृत बोर्ड, मदरसा बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय बोर्ड; सब अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। यह विविधता कम और भ्रम ज्यादा पैदा करती है।
भारत का एक छात्र लगभग पच्चीस वर्ष तक किसी न किसी परीक्षा की तैयारी करता रहता है। स्कूल, कॉलेज, प्रतियोगी परीक्षा, नौकरी। लेकिन जीवन जीने की कला, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और समस्या समाधान जैसे कौशल अक्सर पीछे छूट जाते हैं।
नीट को लेकर जंतर-मंतर पर जो गुस्सा दिखाई दिया, वह अचानक नहीं फूटा। उसकी शुरुआत उन कक्षाओं में हुई थी जहां समझने से ज्यादा रटाया गया। उन कोचिंग सेंटरों में हुई, जहां स्कूलों से ज्यादा भरोसा पैदा हो गया। उन घरों में हुई, जहां माता-पिता अपनी सारी जमा-पूंजी एक अनिश्चित भविष्य पर दांव लगाने को मजबूर हैं।
भारत कभी नालंदा और तक्षशिला जैसी विश्वविख्यात शिक्षा परंपरा का केंद्र था। आज भी आईआईटी और कुछ चुनिंदा संस्थान दुनिया में सम्मान पाते हैं। लेकिन पूरी शिक्षा व्यवस्था अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी, जिसकी एक उभरती महाशक्ति से उम्मीद की जाती है।
भारत को केवल अधिक स्कूलों की जरूरत नहीं है। बेहतर स्कूलों की जरूरत है। केवल अधिक दाखिलों की नहीं, बेहतर सीखने की जरूरत है। केवल अधिक परीक्षाओं की नहीं, बेहतर शिक्षा की जरूरत है। जेन ज़ी अपना फैसला सुना चुकी है। वह सड़कों पर उतर चुकी है। अब परीक्षा सरकार, नीति-निर्माताओं और पूरे समाज की है।
देश का हर छात्र आज सिर्फ एक सवाल पूछ रहा है— क्या हमारी शिक्षा हमें जिंदगी के लिए तैयार करेगी, या सिर्फ अगली परीक्षा के लिए? यही सवाल भारत के भविष्य का भी फैसला करेगा।