हर बच्चे के हाथ में एक हुनर, हर जिले के हुनर को मिले नई पीढ़ी

हर बच्चे में प्रतिभा होती है, जरूरत है उसे अपने हाथों से सीखने और बनाने का अवसर देने की। स्कूलों को स्थानीय उद्योग, कारीगरों और उद्यमियों से जोड़कर बच्चों को अपने जिले के हुनर से परिचित कराया जा सकता है। इससे शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और अवसर पैदा करने की शक्ति बनेगी।

Sep 6, 2026 - 12:47
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हर बच्चे के हाथ में एक हुनर, हर जिले के हुनर को मिले नई पीढ़ी

-पूरन डावर-

एक बात मैं लंबे समय से महसूस करता आया हूं—हमारे बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। कमी है तो केवल अवसर की। उन्हें किताबों की दुनिया से बाहर निकलकर अपने हाथों से सीखने, चीजों को समझने और कुछ नया बनाने का मौका थोड़ा और मिलना चाहिए।

अगर हर बच्चा स्कूल से किताबों का ज्ञान हासिल करने के साथ कम से कम एक ऐसा हुनर भी सीखकर निकले, जिस पर वह जीवनभर भरोसा कर सके, तो वह हुनर उसके भीतर आत्मविश्वास जगाने के साथ उसे अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत भी दे सकता है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना या नौकरी हासिल करना नहीं हो सकता। शिक्षा वह ताकत होनी चाहिए, जो बच्चे को अपने पैरों पर खड़ा होने, कुछ बनाने और जरूरत पड़े तो दूसरों के लिए भी अवसर पैदा करने का साहस दे।

किताब से आगे की शिक्षा

जो चीज हमारे शहर या जिले में बनती है, बच्चे उसे केवल किताब में पढ़ने तक सीमित क्यों रहें, वे उसे देखें, छुएं, समझें और अपने हाथों से बनाना भी सीखें।

जिस जिले में पीतल का काम होता है, वहां बच्चे जानें कि पीतल की वस्तु तैयार होने की पूरी प्रक्रिया क्या है। जहां कालीन बनते हैं, वहां वे बुनकरों के पास जाकर देखें कि एक धागा किस तरह खूबसूरत डिजाइन का रूप लेता है। जहां खाद्य प्रसंस्करण, चमड़ा, कांच, फर्नीचर, हस्तशिल्प या कोई दूसरा उद्योग स्थानीय अर्थव्यवस्था की पहचान है, वहां बच्चे उस काम को करीब से समझें। इससे उन्हें अपने आसपास की दुनिया को देखने का एक नया नजरिया मिलेगा।

फैक्ट्री बने बच्चों की प्रयोगशाला

इसके लिए हर जगह नई बिल्डिंग बनाने या नए इन्क्यूबेशन सेंटर खड़े करने की जरूरत नहीं है। हमारे आसपास पहले से मौजूद फैक्ट्रियां, कारीगर, छोटे उद्यमी और स्थानीय उद्योग ही बच्चों की व्यावहारिक कक्षा बन सकते हैं। जरूरत केवल इतनी है कि स्कूल और स्थानीय उद्योग के बीच एक मजबूत रिश्ता बनाया जाए। लोकल इंडस्ट्री को स्कूल से जोड़ें और स्कूल को फैक्ट्री से।

बच्चों को कारीगरों और उद्यमियों से मिलने दें। उन्हें कारखानों में ले जाएं। दिखाएं कि कोई उत्पाद वास्तव में बनता कैसे है। मशीनें कैसे काम करती हैं, कच्चा माल किस तरह तैयार उत्पाद में बदलता है, गुणवत्ता कैसे तय होती है और एक छोटा-सा उद्यम कितने लोगों के जीवन को रोजगार देता है—बच्चे इन सबको अपनी आंखों से देखें। क्योंकि जो ज्ञान आंखों से देखा जाता है और हाथों से करके सीखा जाता है, वह केवल किताब में पढ़े गए ज्ञान से कहीं अधिक गहराई से मन में उतरता है।

एक जिला, एक उत्पाद, एक शिक्षा

मेरे मन में एक सरल-सा विचार है— एक जिला • एक उत्पाद • एक शिक्षा। हर जिले की अपनी कोई पहचान होती है। कोई उत्पाद, कोई कला, कोई शिल्प, कोई उद्योग या कोई पारंपरिक हुनर वहां की पीढ़ियों की मेहनत से विकसित होता है। क्यों न उसी स्थानीय पहचान को बच्चों की शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए?

बच्चे अपने जिले के हुनर को जानें। उसके पीछे काम करने वाले लोगों से मिलें। उनकी मेहनत और तकनीक को समझें। फैक्ट्री या कार्यशाला में जाएं। सवाल पूछें। अपने हाथों से काम करके देखें और फिर उसी से प्रेरित होकर कुछ नया बनाने की कोशिश करें। सीखें। छुएं। करके देखें। फिर खुद बनाएं।

हुनर से बढ़ेगा आत्मविश्वास

हुनर केवल रोजगार का साधन नहीं है। हुनर आत्मविश्वास देता है। जब कोई बच्चा अपने हाथों से कोई चीज बनाता है और उसे सामने तैयार देखकर कहता है—'इसे मैंने बनाया है', तो उसके भीतर पैदा होने वाला आत्मविश्वास किसी परीक्षा के अंक से अलग होता है। यही आत्मविश्वास आगे चलकर उसे समस्या का समाधान खोजने, जोखिम उठाने और कुछ नया करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे नौकरी तलाशने वाले ही न बनें। वे जरूरत पड़ने पर अपने लिए काम पैदा कर सकें और दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर बना सकें।

एक छोटा-सा सपना

मेरा एक छोटा-सा सपना है—हर बच्चा स्कूल से कम से कम एक ऐसा हुनर लेकर निकले, जिस पर वह जिंदगी भर भरोसा कर सके। अगर हम ऐसा कर पाए, तो शिक्षा केवल नौकरी पाने का रास्ता नहीं रहेगी। वह आत्मनिर्भर बनने, कुछ बनाने और समाज के लिए नए अवसर पैदा करने की ताकत बन जाएगी।

हर बच्चे के हाथ में एक हुनर हो। और हर जिले के हुनर को मिले अपनी नई पीढ़ी। यही शिक्षा को जीवन से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।

(लेखक आगरा के प्रमुख शू एक्सपोर्टर, फुटवियर एवं लेदर उद्योग विकास परिषद के चेयरमैन और एफमेक के संयोजक हैं तथा कई अन्य औद्योगिक और व्यवसायिक संगठनों से जुड़े हुए हैं.)

SP_Singh AURGURU Editor