हैप्पी टीचर्स डे के दिखावे से आगे बढ़िए! मास्टरजी की छड़ी गई, मगर बदतमीजी क्यों आ गई? बेबाक होना अच्छी बात है, बेलगाम होना नहीं
स्कूलों में बढ़ती अनुशासनहीनता शिक्षकों के सम्मान, बच्चों के व्यवहार और शिक्षा के माहौल के लिए गंभीर चुनौती बन रही है। शारीरिक दंड उचित नहीं, लेकिन स्पष्ट नियम और उनके उल्लंघन पर तय कार्रवाई जरूरी है। बच्चों को अधिकारों के साथ जिम्मेदारी, सवाल के साथ शालीनता और स्वतंत्रता के साथ अनुशासन का महत्व समझाना होगा। शिक्षक, अभिभावक और स्कूल मिलकर ऐसा वातावरण बनाएं, जहां शिक्षक की गरिमा और विद्यार्थियों के सीखने का अधिकार दोनों सुरक्षित रहें।
-बृज खंडेलवाल-
कभी स्कूल में मास्टरजी की एक नजर पड़ती थी और पूरी कक्षा शांत हो जाती थी। आज कई शिक्षक कहते हैं, “बच्चो, प्लीज शोर मत करो।” और पीछे से आवाज आती है, “शीला मैम आप हमें ट्रॉमा, स्ट्रेस मत दो!”
रिटायर्ड मास्साब शर्माजी बता रहे थे, "एक बार एक स्टूडेंट होम असाइनमेंट करके नहीं लाया, पूछने पर बोला: "तो क्या हुआ?" मैंने बात इग्नोर करने में भलाई समझी। लेकिन उसके बाद, हर टोकने के सवाल पर उत्तर मिलने लगा: तो क्या हुआ? उस दिन अगर सख्त कदम लिया होता तो ये समस्या नहीं झेलनी पड़ती।"
वाह! शिक्षा ने सचमुच लंबी छलांग लगाई है। लेकिन यह मजाक जितना दिलचस्प है, हकीकत उतनी ही चिंताजनक है। पिछले दिनों, देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए कई मामलों ने कक्षा में घटते अनुशासन और शिक्षकों के प्रति कम होते सम्मान पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
आंध्र प्रदेश में दसवीं के एक छात्र ने बहस के बाद शिक्षक को कक्षा में मुक्का मार दिया। केरल में फुटबॉल मैच के विवाद के बाद छात्रों के एक समूह ने शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों पर हमला किया।
उत्तर प्रदेश में छेड़छाड़ के आरोप के बाद एक छात्रा और उसके परिवार ने कोचिंग शिक्षक की सार्वजनिक रूप से पिटाई की। राजस्थान में एक छात्र ने पहले हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई से नाराज होकर शिक्षक पर सड़क पर हमला कर दिया।
कन्नूर, केरल में परीक्षा के दौरान दो छात्रों ने शिक्षक को पीट दिया। दिल्ली का 2016 का मामला तो और भी भयावह था। परीक्षा और अनुशासन से जुड़े विवाद के बाद दो छात्रों ने शिक्षक मुकेश कुमार पर चाकू से हमला किया और बाद में उनकी मौत हो गई।
हर मामले की परिस्थितियां अलग थीं। कुछ मामलों में शिक्षकों पर दुर्व्यवहार के आरोप भी लगे, जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। लेकिन शिकायत, गुस्सा या असहमति किसी को हिंसा का लाइसेंस नहीं दे सकती।
सवाल यह है कि आखिर हम यहां तक पहुंचे कैसे? पुराने जमाने में शिक्षक के हाथ में छड़ी होती थी। आज शिक्षक के हाथ में नियमों की मोटी फाइल होती है।
छड़ी चलाना तो दूर, कई बार ऊंची आवाज में बोलना भी जोखिम भरा हो गया है। अभिभावक नाराज हो सकते हैं। प्रशासन सवाल पूछ सकता है। सोशल मीडिया तो पहले से तैयार बैठा है। “देखिए, शिक्षक ने बच्चे को डांट दिया!”
नतीजा यह है कि कुछ जगह शिक्षक अनुशासन लागू करने से पहले दस बार सोचते हैं। दूसरी तरफ कुछ बच्चे यह समझने लगते हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं सकता।
लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। शारीरिक दंड शिक्षा का आदर्श तरीका नहीं है। बच्चे को पीटना, अपमानित करना या डराना शिक्षा नहीं, ज्यादती है।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि शिक्षक के हाथ पूरी तरह बांध दिए जाएं। कक्षा में नियम होंगे तो नियम तोड़ने पर उचित परिणाम भी होना चाहिए।
“अनुशासन स्वतंत्रता का दुश्मन नहीं, उसकी बुनियाद है।”
समय पर नहीं आए? जवाब देना होगा।
कक्षा में बदतमीजी की? कार्रवाई होगी।
दूसरों को पढ़ने नहीं दिया? अभिभावकों को बुलाया जाएगा।
बार-बार नियम तोड़े? निर्धारित अनुशासनात्मक कदम उठेंगे।
यह सब शिक्षक की निजी सनक से नहीं, बल्कि स्पष्ट और पारदर्शी नियमों के तहत होना चाहिए। वरना नियम दीवार पर टंगे खूबसूरत पोस्टर बनकर रह जाएंगे।
एक और सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं, उनका भी अधिकार है। कुछ शरारती बच्चों की अराजकता पूरी कक्षा को बंधक नहीं बना सकती।
शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल आने का अधिकार नहीं है। उसमें शांत वातावरण में सीखने का अधिकार भी शामिल है।
हम बच्चों से कहते हैं, “अपनी बात खुलकर कहो।” बहुत अच्छी बात है। लेकिन साथ में यह भी सिखाना होगा, “दूसरे की बात सुनो।” हम कहते हैं, “अपने अधिकार पहचानो।” उन्हें यह भी बताना होगा, “अपने कर्तव्य मत भूलो।”
हम कहते हैं, “सवाल पूछो।” उन्हें यह भी समझाना होगा कि सवाल और बदतमीजी में फर्क होता है। यही फर्क आज कई जगह धुंधला पड़ रहा है।
आधुनिकता का मतलब बेलगाम होना नहीं। आत्मविश्वास अच्छी चीज है, अहंकार नहीं। सवाल करना बुद्धिमानी है, हर नियम को ठुकराना नहीं।
जो बच्चा स्कूल में लाइन तोड़ना सामान्य समझता है, वह आगे चलकर ट्रैफिक नियम भी तोड़ सकता है। जो शिक्षक का अपमान करना अपना अधिकार समझता है, वह कल संस्थाओं का सम्मान भी भूल सकता है।
छोटी आदतें ही आगे चलकर बड़े नागरिक चरित्र का निर्माण करती हैं।
मास्टरजी दोस्त नहीं, मार्गदर्शक भी हैं
आज शिक्षा में शिक्षक को बच्चों का “दोस्त” बनाने पर बहुत जोर दिया जाता है। दोस्ताना माहौल अच्छा है, लेकिन शिक्षक की भूमिका केवल दोस्त की नहीं है।
शिक्षक मार्गदर्शक है। वह सिर्फ किताब नहीं पढ़ाता, व्यवहार भी सिखाता है।
स्कूल परीक्षा पास करने की फैक्ट्री नहीं है। वह नागरिक बनाने की वर्कशॉप भी है।
बच्चों में आत्मसंयम, समय की पाबंदी, जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सम्मान पैदा करना भी शिक्षा का हिस्सा है।
माता-पिता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। घर में हर मांग पूरी करके स्कूल से अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी है।
जिस बच्चे को घर में कभी “नहीं” सुनने की आदत नहीं, वह स्कूल में नियम क्यों मानेगा?
फिर आता है मोबाइल और सोशल मीडिया का सवाल।
आज बच्चे ऐसी दुनिया में पल रहे हैं जहां हर मिनट मनोरंजन उपलब्ध है। कुछ सेकंड में वीडियो बदल जाता है। एक क्लिक में नया कंटेंट सामने आ जाता है।
ऐसे माहौल में धैर्य, एकाग्रता और इंतजार जैसे पुराने गुण कमजोर पड़ रहे हैं।
स्कूल को ऐसे समय में और मजबूत अनुशासन चाहिए, कम नहीं।
क्योंकि किताब पढ़ने के लिए धैर्य चाहिए। शिक्षक को सुनने के लिए एकाग्रता चाहिए। परीक्षा के लिए आत्मसंयम चाहिए। और जीवन में सफल होने के लिए इन तीनों की जरूरत पड़ती है।
पुराने मास्टरजी की छड़ी शायद वापस न आए। लेकिन उसकी आत्मा जरूर लौटनी चाहिए।
मर्यादा।
जवाबदेही।
समय की पाबंदी।
नियमों का सम्मान।
और अपने कर्म के परिणाम का बोध।
मास्टरजी को तानाशाह मत बनाइए।
लेकिन उन्हें इतना कमजोर भी मत बनाइए कि बच्चे ही कक्षा के हाकिम बन जाएं।
कक्षा लोकतंत्र की चुनावी रैली नहीं है। वहां शिक्षक नेतृत्व करता है और विद्यार्थी सीखते हैं।
डर से शिक्षा नहीं होती। लेकिन हर कर्म का परिणाम होता है, यह समझाना भी शिक्षा का ही हिस्सा है।
शिक्षक का रौब नहीं, उसकी गरिमा लौटाइए। उसकी आवाज में फिर से वह विश्वास लाइए कि वह बिना डर के अनुशासन कायम कर सकता है।
वरना कल का नागरिक स्कूल से यही सीखकर निकलेगा:
“नियम दूसरों के लिए होते हैं, मेरे लिए नहीं।”
और फिर हम हैरान होंगे कि ट्रैफिक क्यों नहीं सुधरता। कतारें क्यों नहीं बनतीं। सार्वजनिक संपत्ति की कद्र क्यों नहीं होती।
इसलिए इस शिक्षक दिवस पर सिर्फ “हैप्पी टीचर्स डे” कहना काफी नहीं है।
मास्टरजी को सम्मान दीजिए।
बच्चों को अधिकार दीजिए।
लेकिन अनुशासन को भी उसका अधिकार दीजिए।
क्योंकि अच्छे स्कूल केवल अच्छे विद्यार्थी नहीं बनाते।
वे अच्छे नागरिक बनाते हैं।