योगी पर सपा का ‘डिजिटल वार’ कहीं उलटा न पड़ जाए? बेतुके वीडियो-पोस्टरों से घेरने की कोशिश समर्थकों में बढ़ा सकती है एकजुटता

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 की लड़ाई अभी लंबी है। आने वाले महीनों में डिजिटल प्रचार और आक्रामक होगा। लेकिन सपा के सामने सबसे बड़ा रणनीतिक सवाल यही रहेगा—योगी की छवि पर हमला करना ज्यादा फायदेमंद है या उनकी सरकार के कामकाज को कठघरे में खड़ा करना? यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति में हर हमला निशाने पर नहीं लगता। कभी-कभी विरोधी को कमजोर करने के लिए चलाया गया तीर उसी की ढाल को और मजबूत कर देता है।

Sep 3, 2026 - 14:11
Sep 3, 2026 - 14:12
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योगी पर सपा का ‘डिजिटल वार’ कहीं उलटा न पड़ जाए? बेतुके वीडियो-पोस्टरों से घेरने की कोशिश समर्थकों में बढ़ा सकती है एकजुटता
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक लड़ाई का एक नया मैदान तैयार हो गया है। अब सभाओं और बयानों के साथ सोशल मीडिया पर वीडियो, पोस्टर और डिजिटल सामग्री के जरिए एक-दूसरे की छवि पर प्रहार किया जा रहा है। भाजपा का आईटी सेल जहां सपा और कांग्रेस को निशाना बनाने वाले वीडियो सामने ला रहा है, वहीं समाजवादी पार्टी भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को केंद्र में रखकर जवाबी अभियान चला रही है।

लेकिन सपा के इस डिजिटल आक्रामक रुख के साथ एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या योगी आदित्यनाथ पर व्यक्तिगत और प्रतीकों के सहारे किए जा रहे हमले वास्तव में उनकी छवि कमजोर करेंगे या उलटे उनके लिए सहानुभूति और समर्थन बढ़ा सकते हैं?

योगी को लेकर आपत्तिजनक वीडियो से गरमाई सियासत

हाल में समाजवादी पार्टी की ओर से एक ऐसा वीडियो सामने आया, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि को आपत्तिजनक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। वीडियो में उन्हें गांजे का नशा करते और भौंडे अंदाज में नृत्य करते हुए दिखाने की कोशिश की गई है। इसे लेकर भाजपा समर्थक खेमे में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है।

इस तरह की सामग्री का राजनीतिक उद्देश्य योगी आदित्यनाथ की उस छवि को चुनौती देने की कोशिश माना जा सकता है, जो पिछले वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनके साथ मजबूती से जुड़ चुकी है। लेकिन यही इस रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा भी है। किसी नेता के खिलाफ बनाया गया वीडियो तभी राजनीतिक रूप से प्रभावी हो सकता है, जब वह जनता के बीच उस नेता की स्थापित धारणा को बदलने में सफल हो।

यदि जनता वीडियो को वास्तविकता के बजाय राजनीतिक उपहास और व्यक्तिगत हमला मान लेती है, तो उसका प्रभाव उलटा भी हो सकता है।

नीतियों पर हमला छोड़ निजी छवि को निशाना बनाना कितना कारगर?

योगी आदित्यनाथ के करीब साढ़े नौ साल के कार्यकाल में उनके समर्थकों के बीच उनकी पहचान एक सख्त प्रशासक और हिंदुत्व के प्रमुख चेहरे के रूप में बनी है। कानून-व्यवस्था, अपराध और माफिया के खिलाफ कार्रवाई तथा सरकार की कार्यशैली उनके राजनीतिक प्रचार का प्रमुख हिस्सा रही है। दूसरी तरफ विपक्ष इन्हीं मुद्दों पर सरकार को घेरता रहा है।

ऐसे में सपा के सामने एक रणनीतिक चुनौती है। यदि योगी सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, किसानों, युवाओं, कानून-व्यवस्था, शिक्षा या विकास जैसे मुद्दों पर घेरा जाता है, तो वह सीधे शासन के प्रदर्शन को बहस के केंद्र में लाता है। लेकिन जब राजनीतिक हमला व्यक्तिगत छवि को मजाक और आपत्तिजनक प्रस्तुति के जरिए निशाना बनाने तक सीमित हो जाता है, तो बहस का केंद्र सरकार की नीतियों से हटकर खुद योगी बन जाते हैं।

यहीं सपा की रणनीति पर सवाल उठता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाकर किए जा रहे इस तरह के प्रचार से कहीं ऐसा न हो कि विपक्ष उन्हें कमजोर करने के बजाय उनके समर्थकों को और मजबूती से उनके पक्ष में खड़ा कर दे। यानी सपा का हमला ही योगी के लिए राजनीतिक फायदा बन जाए।

राम मंदिर पर पोस्टर ने खोल दिया दूसरा मोर्चा

सीएम योगी के वीडियो के साथ ही लखनऊ स्थित सपा कार्यालय के बाहर लगाया गया राम मंदिर से जुड़ा एक पोस्टर भी विवाद का विषय बन गया है। पोस्टर में भगवान श्रीराम को नाराज मुद्रा में दिखाया गया है और सामने जनेऊ तथा चोटी वाले ब्राह्मणों को हाथ जोड़े दिखाया गया है। पोस्टर के जरिए राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी को लेकर संदेश देने की कोशिश की गई है।

सपा का उद्देश्य मंदिर में चढ़ावे से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को राजनीतिक मुद्दा बनाना हो सकता है, लेकिन इस संदेश को जिस तरह ब्राह्मण प्रतीकों के साथ पेश किया गया, उसने भी ब्राह्मण समाज की नाराजगी बढ़ा दी है।

राम मंदिर केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा विषय है। ऐसे में मंदिर से जुड़े किसी कथित भ्रष्टाचार को उजागर करने और भगवान राम तथा ब्राह्मण समाज के प्रतीकों का इस्तेमाल करते हुए पोस्टर अभियान चलाने के बीच राजनीतिक अंतर है। सपा के लिए जोखिम इसी अंतर में छिपा है।

जिस मुद्दे के जरिए भाजपा और मंदिर व्यवस्था पर सवाल उठाने की कोशिश की जा रही है, वही मुद्दा यदि धार्मिक भावनाओं से जोड़कर देखा जाने लगे तो राजनीतिक संदेश का निशाना बदल सकता है।

संसद में पप्पू यादव का प्रदर्शन भी दे चुका है संकेत

राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर विपक्ष की ओर से संसद के मानसून सत्र में किया गया प्रदर्शन भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। निर्दलीय सांसद पप्पू यादव साधु का वेश धारण कर प्रतीकात्मक तरीके से राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का अभिनय करते नजर आए थे। इस प्रदर्शन में समाजवादी पार्टी के सांसदों की भागीदारी भी दिखाई दी थी।

विपक्ष ने इसके जरिए मंदिर के चढ़ावे को लेकर कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाने का प्रयास किया, लेकिन प्रदर्शन का तरीका खुद चर्चा और आलोचना का विषय बन गया। यानी मुद्दा उठाने से ज्यादा ध्यान इस बात पर चला गया कि उसे किस अंदाज में उठाया गया।

राजनीतिक संचार की यही सबसे बड़ी चुनौती है। संदेश यदि मूल मुद्दे से हटकर उसके प्रस्तुतिकरण पर बहस शुरू करा दे तो विपक्ष को अपेक्षित राजनीतिक लाभ मिलने के बजाय नुकसान ही उठाना पड़ता है।

सपा अनजाने में योगी के पक्ष में ही तो माहौल बना रही?

यहीं इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू सामने आता है। योगी आदित्यनाथ के समर्थकों के बीच उनकी एक खास छवि पहले से मौजूद है। यदि उनके विरोध में बनाए गए वीडियो या पोस्टर समर्थकों को यह संदेश देते हैं कि मुख्यमंत्री पर व्यक्तिगत, अपमानजनक या धार्मिक आधार पर हमला किया जा रहा है, तो स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया और बड़े समर्थन में भी बदल सकती है।

राजनीति में विरोधी की छवि बिगाड़ने का प्रयास कई बार तभी सफल होता है, जब जनता उस नई छवि को स्वीकार करे। लेकिन मजबूत राजनीतिक पहचान वाले नेताओं के मामले में लगातार व्यक्तिगत हमले कभी-कभी उनके समर्थकों को और अधिक संगठित कर देते हैं।

यही सपा की चिंता का कारण बन सकता है। योगी को कमजोर करने के लिए बनाया गया कंटेंट यदि योगी समर्थकों को और मजबूती से उनके पीछे खड़ा कर दे, तो सपा का हमला राजनीतिक रूप से ‘बैकफायर’ कर सकता है।

भाजपा के हमलों का जवाब देना या वही भाषा अपनाना?

सपा के पास यह तर्क जरूर है कि भाजपा का आईटी सेल भी विपक्षी नेताओं को निशाना बनाकर लगातार डिजिटल सामग्री तैयार करता है। इसलिए जवाब देना उसकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। लेकिन यहां सवाल जवाब देने का नहीं, जवाब की भाषा और माध्यम का है।

भाजपा के हमले का जवाब राजनीतिक मुद्दों से दिया जाए तो बहस सरकार और विपक्ष की नीतियों के बीच रह सकती है। लेकिन जब मुकाबला व्यक्तिगत उपहास, आपत्तिजनक वीडियो और धार्मिक प्रतीकों वाले पोस्टर तक पहुंच जाता है, तो दोनों दलों के समर्थकों के बीच ध्रुवीकरण तो बढ़ सकता है, मगर सामान्य मतदाता के सामने वास्तविक मुद्दे पीछे छूटने का खतरा भी पैदा हो जाता है।

2027 के चुनाव में अभी कुछ महीने बाकी हैं। इसलिए दोनों दलों के लिए यह समय अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने का है। सवाल यह है कि सपा योगी विरोध को किस दिशा में ले जाती है—शासन की कमियों के सवाल तक या व्यक्तिगत और धार्मिक प्रतीकों पर केंद्रित डिजिटल लड़ाई तक।

वायरल वीडियो से वोट तक का सफर आसान नहीं

सोशल मीडिया पर किसी वीडियो का वायरल होना और उसका चुनावी लाभ में बदलना दो अलग बातें हैं। डिजिटल सामग्री कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है, लेकिन मतदाता का अंतिम निर्णय स्थानीय मुद्दों, सरकार के काम, उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक माहौल जैसे कई कारकों से प्रभावित होता है।

इसलिए सपा के सामने असली चुनौती केवल योगी विरोधी वीडियो को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की नहीं है। चुनौती यह है कि क्या वह इन वीडियो और पोस्टरों के जरिए योगी की स्थापित राजनीतिक छवि में वास्तविक सेंध लगा पाएगी?

अगर इसका जवाब नकारात्मक रहा और इसके बजाय भाजपा को यह कहने का अवसर मिल गया कि विपक्ष के पास सरकार के खिलाफ ठोस मुद्दे नहीं हैं, इसलिए वह व्यक्तिगत हमलों पर उतर आया है, तो यही रणनीति सपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।

SP_Singh AURGURU Editor