पंजाब कांग्रेस में बड़ा फेरबदल, सचिन पायलट को मिली कमान, भूपेश बघेल की छुट्टी
पंजाब कांग्रेस में हाईकमान ने बड़ा बदलाव करते हुए सचिन पायलट को नया प्रभारी महासचिव नियुक्त किया है। पायलट ने भूपेश बघेल की जगह ली है, जिन्हें अब असम का प्रभारी बनाया गया है। बघेल को हटाने की मांग को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का खेमा लगातार मुखर था। पंजाब में कांग्रेस के कार्यक्रमों के दौरान बघेल के खिलाफ 'गो बैक' के नारे और पोस्टर तक सामने आए थे। 3 और 4 सितंबर को दिल्ली में हुई कांग्रेस की अहम बैठकों के बाद यह फैसला लिया गया। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पायलट के सामने पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी खत्म कर संगठन को एकजुट करने और पार्टी को मजबूत करने की बड़ी चुनौती होगी।
राहुल गांधी की बैठक के बाद बदला प्रभारी, 2027 के चुनाव से पहले संगठन को एकजुट करने की जिम्मेदारी, बघेल को असम भेजा गया
चंडीगढ़/नई दिल्ली। पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से चल रही गुटबाजी के बीच कांग्रेस हाईकमान ने बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का नया प्रभारी महासचिव नियुक्त किया है। पायलट को यह जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की जगह दी गई है। बघेल को अब असम कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया है।
पायलट की नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब पंजाब में कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है और पार्टी के भीतर प्रदेश संगठन, नेतृत्व और गुटबाजी को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे। माना जा रहा है कि हाईकमान ने पायलट के जरिए पंजाब कांग्रेस में नई ऊर्जा भरने और अलग-अलग खेमों के बीच तालमेल बनाने का प्रयास किया है।
चन्नी गुट के विरोध के बीच बदला प्रभारी
पंजाब कांग्रेस में भूपेश बघेल को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और उनके समर्थकों की नाराजगी लगातार सामने आती रही थी। चन्नी गुट का आरोप था कि प्रदेश प्रभारी होने के बावजूद बघेल पंजाब की जमीनी राजनीतिक स्थिति और संगठन के भीतर चल रही खींचतान की सही तस्वीर हाईकमान तक नहीं पहुंचा सके। चन्नी गुट लगातार यह मांग कर रहा था कि यदि 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मजबूत प्रदर्शन करना है तो प्रदेश में नेतृत्व और संगठन की रणनीति में बदलाव किया जाए। इसी बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की दोबारा ताजपोशी के बाद भी पार्टी के भीतर खेमेबाजी और ज्यादा खुलकर सामने आई। चन्नी समर्थकों ने वड़िंग और बघेल दोनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।
रैलियों में लगे 'बघेल गो बैक' के नारे
पंजाब में कांग्रेस के 'हर बूथ, कांग्रेस मजबूत' अभियान के दौरान पार्टी की अंदरूनी कलह सार्वजनिक मंचों तक पहुंच गई। 31 जुलाई से 8 अगस्त के बीच चले अभियान में कई जगहों पर चन्नी गुट के नेताओं और समर्थकों की नाराजगी देखने को मिली। 31 जुलाई को फतेहगढ़ साहिब से अभियान की शुरुआत हुई, लेकिन चन्नी और उनके समर्थक कार्यक्रम से दूरी बनाए रहे। इसके बाद 1 अगस्त को संगरूर में बघेल की मौजूदगी में चन्नी समर्थकों ने हंगामा किया। विरोध के दौरान वड़िंग के खिलाफ और चन्नी के समर्थन में नारेबाजी हुई। पटियाला में भी चन्नी को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाने की मांग उठी।
इसके बाद मुक्तसर, बठिंडा और बरनाला में भी विरोध के स्वर तेज हुए। वड़िंग के गृह जिले मुक्तसर में बघेल के खिलाफ 'गो बैक' के पोस्टर लगाए गए। सबसे तीखा विरोध 6 अगस्त को लुधियाना में देखने को मिला। यहां चन्नी गुट के समर्थक 'बघेल गो बैक' लिखी टी-शर्ट पहनकर कार्यक्रम में पहुंचे। दोनों गुटों के समर्थकों के बीच तीखी नोकझोंक और झड़प की स्थिति बनी और मामला हाथापाई तक पहुंच गया। पंजाब कांग्रेस के इतिहास में यह पहली बार बताया गया कि किसी प्रदेश प्रभारी के खिलाफ इस तरह खुले तौर पर 'गो बैक' अभियान चलाया गया।
3 और 4 सितंबर की बैठकों के बाद हुआ फैसला
संगठन में बदलाव को लेकर कांग्रेस हाईकमान में भी मंथन चल रहा था। 3 सितंबर को दिल्ली में राहुल गांधी की टीम के साथ पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल, प्रदेश अध्यक्ष राजा वड़िंग, प्रताप सिंह बाजवा समेत अन्य नेताओं की बैठक हुई। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी और संगठन की स्थिति पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक के बाद राहुल गांधी की टीम ने पंजाब की स्थिति को लेकर रिपोर्ट हाईकमान के सामने रखी। इसके अगले दिन 4 सितंबर को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल की बैठक हुई। इसी बैठक के बाद बघेल को पंजाब के प्रभारी पद से हटाने और उनकी जगह सचिन पायलट को जिम्मेदारी देने का फैसला होने की बात सामने आई।
राणा गुरजीत की पायलट से मुलाकात ने बढ़ाई हलचल
4 सितंबर को दिल्ली में संगठन से जुड़ी बैठक में चन्नी गुट के नेता राणा गुरजीत सिंह भी शामिल हुए। उनकी केसी वेणुगोपाल से मुलाकात हुई। इसके बाद उन्होंने सचिन पायलट से भी मुलाकात की। राणा गुरजीत के मुताबिक, मुलाकात के दौरान पंजाब की राजनीतिक स्थिति को लेकर बातचीत हुई थी, लेकिन उस समय उन्हें जानकारी नहीं थी कि पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया जाने वाला है। उन्होंने पायलट से कहा कि पंजाब के लोग उन्हें पसंद करते हैं।
चन्नी ने किया पायलट का स्वागत
सचिन पायलट की नियुक्ति के बाद पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उनका स्वागत किया। चन्नी ने हाईकमान के फैसले का भी स्वागत करते हुए कहा कि पंजाब कांग्रेस के प्रभारी महासचिव नियुक्त किए जाने पर सचिन पायलट का हार्दिक स्वागत है। चन्नी के इस रुख को राजनीतिक तौर पर अहम माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कई सप्ताह से उनका खेमा बघेल के खिलाफ मुखर था।
रंधावा बोले- पायलट की यूथ कनेक्ट पंजाब में आएगी काम
कांग्रेस नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा ने भी सचिन पायलट की नियुक्ति को पंजाब के लिए सकारात्मक बताया। उनका कहना है कि पायलट युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं और उनकी युवा नेता की छवि का फायदा पंजाब कांग्रेस को मिल सकता है। रंधावा ने पायलट की पंजाब से जुड़ी पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पायलट की मां पंजाबी हैं और वह पंजाबी भाषा को अच्छी तरह समझते हैं। उनके पिता दिवंगत राजेश पायलट के भी पंजाब से पुराने संबंध रहे हैं और प्रदेश के नेताओं के बीच उनका सम्मान रहा है। ऐसे में हाईकमान को उम्मीद है कि पायलट पंजाब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझने में दूसरे राज्यों से आने वाले नेताओं की तुलना में बेहतर स्थिति में रहेंगे।
राजस्थान मॉडल से पंजाब में जीत की उम्मीद
सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी सौंपने के पीछे उनका राजस्थान में संगठन खड़ा करने का अनुभव भी अहम माना जा रहा है। 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद पायलट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था। उस समय पार्टी के सामने संगठन को दोबारा खड़ा करने की बड़ी चुनौती थी। पायलट ने करीब पांच साल तक प्रदेश में लगातार संगठनात्मक स्तर पर काम किया और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। इसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में लौटी। पायलट खुद राजस्थान के उपमुख्यमंत्री बने, हालांकि बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ राजनीतिक मतभेदों के चलते उन्हें उपमुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। अब कांग्रेस हाईकमान पंजाब में भी पायलट के इसी संगठनात्मक अनुभव को आजमाना चाहता है।
26 साल की उम्र में बने सांसद
सचिन पायलट कांग्रेस के युवा और चर्चित नेताओं में शामिल हैं। उनके पिता राजेश पायलट कांग्रेस के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री रहे हैं। सचिन पायलट ने महज 26 वर्ष की उम्र में 2004 का लोकसभा चुनाव दौसा से जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी। बाद में वह केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री भी रहे। राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री के तौर पर भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। उनकी युवा छवि, संगठन पर पकड़ और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद को देखते हुए कांग्रेस हाईकमान को उम्मीद है कि वह पंजाब में पार्टी के अलग-अलग गुटों को एक मंच पर लाने में कामयाब हो सकते हैं।
अब राजा वड़िंग पर भी नजर
भूपेश बघेल के हटने के बाद अब पंजाब कांग्रेस में अगली नजर प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पर है। चन्नी गुट लंबे समय से वड़िंग के नेतृत्व को लेकर भी सवाल उठाता रहा है। ऐसे में पायलट की नियुक्ति के बाद यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या हाईकमान पंजाब कांग्रेस में केवल प्रभारी बदलकर रुक जाएगा या संगठन में आगे भी बड़े बदलाव होंगे। 2027 का विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती पंजाब में आम आदमी पार्टी के मुकाबले अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के साथ-साथ पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी को खत्म करने की है।
पायलट के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सचिन पायलट के लिए पंजाब की जिम्मेदारी आसान नहीं होगी। उन्हें एक तरफ चन्नी, वड़िंग, बाजवा समेत अलग-अलग नेताओं के राजनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाना होगा, वहीं दूसरी तरफ जमीनी कार्यकर्ताओं को दोबारा सक्रिय करना होगा। कांग्रेस हाईकमान की कोशिश है कि चुनाव से पहले पंजाब संगठन में ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें नेता आपसी खींचतान के बजाय पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दें। अब देखना यह होगा कि राजस्थान में संगठन को मजबूत करने का अनुभव रखने वाले पायलट पंजाब में कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी को कितना नियंत्रित कर पाते हैं।