आकाश-ईशान के बाद अब भतीजी दीपिका आनंद पर मायावती की नजर, बसपा की कमान सौंपने का संकेत, परिवारवाद के खिलाफ कांशीराम की राह पर चलने का दावा, लेकिन नेतृत्व के लिए परिवार से ही नया चेहरा तलाश रहीं बसपा सुप्रीमो

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी में उत्तराधिकारी को लेकर चल रही उठापटक ने शनिवार को अचानक नया मोड़ ले लिया। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने संकेत दिया कि भविष्य में उनके भाई आनंद कुमार की मदद के लिए उनकी इकलौती बेटी दीपिका आनंद को आगे लाया जा सकता है। इतना ही नहीं, उन्होंने साफ कर दिया कि उनके दोनों भतीजों आकाश आनंद और ईशान आनंद को भविष्य में पार्टी की कमान नहीं दी जाएगी। मायावती के इस बयान ने बसपा के उत्तराधिकार की पूरी तस्वीर बदल दी है।

Sep 12, 2026 - 17:40
 0
आकाश-ईशान के बाद अब भतीजी दीपिका आनंद पर मायावती की नजर, बसपा की कमान सौंपने का संकेत, परिवारवाद के खिलाफ कांशीराम की राह पर चलने का दावा, लेकिन नेतृत्व के लिए परिवार से ही नया चेहरा तलाश रहीं बसपा सुप्रीमो

मायावती ने कहा कि वह बसपा संस्थापक कांशीराम की तरह परिवारवाद के खिलाफ हैं। उनके अनुसार, एक महिला होने के नाते उन्होंने अपने छोटे भाई आनंद कुमार को साथ रखा था, लेकिन अब वह किसी तरह के पारिवारिक मोह में नहीं पड़ेंगी। उन्होंने संकेत दिया कि दीपिका आनंद को भी कोई जिम्मेदारी केवल रिश्ते के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी ईमानदारी और कार्यक्षमता के आधार पर दी जाएगी। ताजा बयान में मायावती ने यह भी संकेत दिया कि यदि दीपिका भविष्य में यह जिम्मेदारी संभालने के योग्य साबित नहीं होतीं तो आनंद कुमार की सहमति से किसी मिशनरी कार्यकर्ता को बसपा की कमान सौंपी जा सकती है।

आकाश से ईशान और अब दीपिका तक बदली तस्वीर

मायावती के इस रुख को पिछले एक सप्ताह के घटनाक्रम से जोड़कर देखा जाए तो बसपा के भीतर उत्तराधिकार की दिशा तेजी से बदलती दिखाई देती है। कुछ ही दिन पहले तक आकाश आनंद को मायावती का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जा रहा था। लेकिन सितम्बर में उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारियों से हटाने के बाद 10 सितंबर को पार्टी से भी पूरी तरह अलग कर दिया गया। मायावती ने इसके पीछे पार्टी के बजाय पारिवारिक हित को प्राथमिकता देने और उनके निर्देशों का पालन नहीं करने जैसे आरोप लगाए।

आकाश के बाहर होने के बाद स्वाभाविक रूप से नजर उनके छोटे भाई ईशान आनंद पर गई। मायावती ने ईशान को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़कर अन्य राज्यों के लिए प्रमुख सेक्टर प्रभारी की जिम्मेदारी भी दी थी। इसे ईशान को संगठन में स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा गया।

लेकिन शनिवार के बयान ने इस संभावना को भी लगभग खत्म कर दिया। मायावती ने संकेत दिया कि उनके दोनों भतीजों को भविष्य में पार्टी की सर्वोच्च जिम्मेदारी नहीं मिलेगी। यानी जिस ईशान आनंद को आकाश के बाद आगे बढ़ाए जाने की संभावना दिखाई दे रही थी, उनके लिए भी उत्तराधिकार का रास्ता बंद होता नजर आ रहा है।

दीपिका के नाम ने पूरी रणनीति क्यों बदल दी

दीपिका आनंद का नाम सामने आना इसलिए अहम है क्योंकि वह आकाश और ईशान की बहन हैं और मायावती के भाई आनंद कुमार की इकलौती बेटी हैं। वह इस समय विधि की पढ़ाई कर रही हैं। ऐसे में मायावती ने उनके राजनीतिक अनुभव के बजाय भविष्य में उनकी योग्यता, ईमानदारी और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता को कसौटी बनाने की बात कही है।

यहां मायावती का संदेश दो स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। पहला, वह अपने परिवार को पार्टी का स्थायी उत्तराधिकार तंत्र बनाने के आरोप से बचना चाहती हैं। दूसरा, वह यह विकल्प खुला रखना चाहती हैं कि परिवार का कोई सदस्य यदि वास्तव में संगठन और बहुजन आंदोलन के प्रति प्रतिबद्धता साबित करता है तो उसे केवल रिश्तेदारी के कारण बाहर भी नहीं किया जाएगा।

यानी मायावती ने दरवाजा पूरी तरह परिवार के लिए बंद नहीं किया है, बल्कि रिश्ते की जगह योग्यता को प्रवेश की शर्त बनाने का संकेत दिया है।

कांशीराम के नाम से अपनी राजनीति को फिर परिभाषित करने की कोशिश

मायावती का कांशीराम का उल्लेख भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। बसपा की स्थापना से लेकर उसके विस्तार तक कांशीराम ने संगठन को व्यक्ति और परिवार के बजाय आंदोलन और मिशन से जोड़ने पर जोर दिया था। मायावती अब उसी विरासत को अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हुए यह संदेश देना चाहती हैं कि बसपा किसी परिवार की निजी राजनीतिक संपत्ति नहीं है।

लेकिन यही वह बिंदु है जहां उनके सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भी खड़ी होती है। पिछले कुछ वर्षों में आकाश आनंद को उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाया गया, फिर उन्हें हटाया गया और दोबारा जिम्मेदारी दी गई। अब ईशान को संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका देने के तुरंत बाद उत्तराधिकार से बाहर रखने और दीपिका का विकल्प सामने आने से पार्टी में नेतृत्व को लेकर असमंजस की तस्वीर भी बनती है। आकाश को लेकर पिछले दो वर्षों में कई बार जिम्मेदारियां बदली गई हैं, जिससे उत्तराधिकार का सवाल लगातार चर्चा में रहा है।

आकाश प्रकरण ने परिवारवाद की बहस को और तेज किया

आकाश आनंद का मामला केवल एक व्यक्ति को पार्टी से बाहर करने तक सीमित नहीं रहा। उनके ससुर और बसपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ के साथ पैदा हुए विवाद ने इसे पारिवारिक प्रभाव बनाम संगठनात्मक अनुशासन का मुद्दा बना दिया। अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी मायावती ने आकाश को पार्टी में बनाए रखने के बजाय उन्हें पूरी तरह अलग कर दिया।

मायावती ने आकाश पर पार्टी हित से ऊपर पारिवारिक रिश्ते को रखने का आरोप भी लगाया। यही घटनाक्रम अब उनके परिवारवाद-विरोधी नए रुख की पृष्ठभूमि बन गया है।

भविष्य की कमान परिवार से बाहर जाने का विकल्प भी खुला

मायावती के शनिवार के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद दीपिका से भी आगे का है। उन्होंने संकेत दिया कि यदि दीपिका भी अपनी योग्यता साबित नहीं कर पातीं तो आनंद कुमार की सहमति से किसी मिशनरी कार्यकर्ता को पार्टी की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि उन्होंने उत्तराधिकारी के लिए परिवार को अनिवार्य विकल्प मानने से इनकार किया है।

यह बयान बसपा की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में और महत्वपूर्ण हो जाता है। पार्टी को आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में संगठन को नए सिरे से खड़ा करना है। ऐसे समय में मायावती के सामने एक तरफ संगठन में नई पीढ़ी को जगह देने की चुनौती है तो दूसरी तरफ पुराने कैडर और बहुजन आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाने की जरूरत है कि पार्टी का नेतृत्व केवल पारिवारिक उत्तराधिकार का विषय नहीं है।

2027 के लिए युवाओं पर दांव

मायावती ने 2027 के विधानसभा चुनाव में युवाओं को अधिक टिकट देने का संकेत देकर इस पूरी कवायद को एक और राजनीतिक आयाम दे दिया है। इसका मतलब केवल उत्तराधिकारी तलाशना नहीं, बल्कि संगठन और चुनावी राजनीति दोनों में नई पीढ़ी को आगे लाना हो सकता है। आकाश के बाहर होने और ईशान की सीमित संगठनात्मक भूमिका के बीच युवा चेहरों को टिकट देने की रणनीति बसपा के लिए नए सामाजिक और राजनीतिक आधार की तलाश भी बन सकती है।

हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि युवाओं को टिकट देने की बात कितनी व्यापक होती है और क्या पार्टी इसके साथ अपने संगठन में भी वास्तविक पीढ़ीगत बदलाव करती है।

सवाल अब दीपिका के नाम से ज्यादा बसपा के भविष्य का

दीपिका आनंद को आगे बढ़ाने का संकेत फिलहाल उत्तराधिकारी की औपचारिक घोषणा नहीं है। मायावती ने उनकी योग्यता और कार्यक्षमता को शर्त बनाया है। इसलिए इसे अभी संभावित विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए, अंतिम उत्तराधिकार घोषणा के रूप में नहीं।

फिर भी इतना साफ है कि आकाश आनंद के बाद जिस ईशान आनंद को अगला चेहरा माना जा रहा था, मायावती ने उस संभावना पर भी ब्रेक लगा दिया है। अब दीपिका का नाम सामने लाकर उन्होंने बसपा के भीतर उत्तराधिकार की बहस को भाई के बेटों से भाई की बेटी तक पहुंचा दिया है।

और इससे भी बड़ा संदेश यह है कि मायावती अब यह साबित करना चाहती हैं कि बसपा की अगली कमान रिश्तेदारी से नहीं, योग्यता और मिशन से तय होगी। यही दावा आने वाले समय में उनके परिवारवाद-विरोधी रुख की सबसे बड़ी परीक्षा भी बनेगा।

SP_Singh AURGURU Editor