यूपी बीजेपी के 128 विधायक ‘डेंजर जोन’ में, टिकट कटने की आहट, दिग्गजों और मंत्रियों की भी बढ़ी टेंशन

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के भीतर बड़े संगठनात्मक बदलाव की चर्चा तेज है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के 403 विधानसभा क्षेत्रों में कराए गए कथित आंतरिक सर्वे में करीब 128 मौजूदा विधायकों के खिलाफ जन-नाराजगी सामने आई है। कानपुर-बुंदेलखंड, अवध और ब्रज क्षेत्र को सबसे ज्यादा संवेदनशील बताया जा रहा है। पार्टी कथित तौर पर कार्यकर्ताओं से दूरी, विकास कार्यों की स्थिति, विवादित छवि और स्थानीय स्तर पर कमजोर पकड़ को टिकट काटने के प्रमुख आधारों में शामिल कर सकती है। वहीं ‘4-C’ रणनीति के जरिए संगठन, कैडर, सामाजिक समीकरण और नए चेहरों पर जोर देने की तैयारी की चर्चा है। हालांकि, अंतिम टिकट वितरण पर फैसला पार्टी नेतृत्व द्वारा चुनावी परिस्थितियों के आकलन के बाद ही होगा।

Sep 9, 2026 - 22:02
Sep 9, 2026 - 22:03
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यूपी बीजेपी के 128 विधायक ‘डेंजर जोन’ में, टिकट कटने की आहट, दिग्गजों और मंत्रियों की भी बढ़ी टेंशन

403 सीटों पर कराए गए गोपनीय सर्वे से मची हलचल, कानपुर-बुंदेलखंड, अवध और ब्रज में सबसे ज्यादा एंटी-इनकंबेंसी के संकेत, जीत की क्षमता बनेगी टिकट का सबसे बड़ा पैमाना

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल भले ही अभी पूरी तरह नहीं बजा हो, लेकिन सत्ता के गलियारों में चुनावी तैयारियां तेज हो चुकी हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के बाद भारतीय जनता पार्टी अब 2027 की लड़ाई में किसी भी स्तर पर जोखिम लेने के मूड में नजर नहीं आ रही है। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर जनता का मूड भांपने के लिए व्यापक आंतरिक सर्वे कराया है।

सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, इस कथित गोपनीय सर्वे में करीब 128 मौजूदा बीजेपी विधायकों के खिलाफ मजबूत जन-नाराजगी के संकेत मिले हैं। यदि पार्टी इसी आकलन के आधार पर आगे बढ़ती है तो 2027 में बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के टिकट कट सकते हैं। इनमें केवल सामान्य विधायक ही नहीं, बल्कि कई प्रभावशाली चेहरे और मंत्री भी कथित तौर पर पार्टी की आंतरिक समीक्षा के दायरे में बताए जा रहे हैं। हालांकि, टिकट को लेकर अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व और पार्टी की चुनावी रणनीति के तहत बाद में होगा। ऐसे में सर्वे में सामने आए आंकड़ों को फिलहाल संभावित राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

2024 के झटके के बाद बीजेपी ने बदली रणनीति

2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए कई राजनीतिक समीकरण बदल दिए। विपक्षी गठबंधन और समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण ने बीजेपी के सामने नई चुनौती खड़ी की। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के भीतर अब इस बात पर गंभीर मंथन है कि केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता के सहारे प्रत्येक विधानसभा सीट पर जीत सुनिश्चित नहीं की जा सकती। स्थानीय विधायक की छवि, जनता से संपर्क, कार्यकर्ताओं के साथ संबंध और क्षेत्र में विकास कार्यों की स्थिति भी चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि बीजेपी कथित तौर पर ‘विनेबिलिटी’ यानी जीतने की क्षमता को टिकट वितरण का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना बनाने की तैयारी में है।

किस क्षेत्र में कितने विधायकों पर खतरा?

आंतरिक सर्वे से जुड़े सूत्रों के अनुसार, प्रदेश के अलग-अलग संगठनात्मक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के खिलाफ नाराजगी सामने आई है।

पश्चिम क्षेत्र: 71 सीटों में करीब 23 से 25 विधायकों के टिकट पर खतरे के संकेत।
ब्रज क्षेत्र: 65 सीटों में 24 से 26 सीटों पर नए चेहरों की संभावना।
अवध क्षेत्र: 82 सीटों में 26 से 28 विधायकों की स्थिति कमजोर बताई जा रही है।
कानपुर-बुंदेलखंड: 52 सीटों में 22 से 24 मौजूदा विधायकों के खिलाफ नकारात्मक फीडबैक।
काशी क्षेत्र: 72 सीटों में 19 से 21 सीटों पर बदलाव की संभावना।
गोरखपुर क्षेत्र: 62 सीटों में 18 से 22 सीटों पर नए विकल्प तलाशे जाने की चर्चा।

इन आंकड़ों में सबसे ज्यादा चर्चा कानपुर-बुंदेलखंड, अवध और ब्रज क्षेत्र की हो रही है। खासकर कानपुर-बुंदेलखंड में बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों को लेकर कथित असंतोष ने पार्टी संगठन की चिंता बढ़ाई है।

विधायकों से नाराजगी की वजह क्या?

पार्टी के आंतरिक फीडबैक में कथित तौर पर विधायकों के खिलाफ कई तरह की शिकायतें सामने आई हैं। इनमें सबसे प्रमुख कारण ये बताए जा रहे हैं—

1. कार्यकर्ताओं से दूरी

कई विधायकों पर आरोप है कि चुनाव जीतने के बाद उनका स्थानीय कार्यकर्ताओं से संपर्क कम हो गया। थाने, तहसील और प्रशासनिक स्तर पर कार्यकर्ताओं की शिकायतों को अपेक्षित महत्व नहीं मिलने की बात भी फीडबैक में सामने आने का दावा है।

2. स्थानीय विकास का कमजोर रिकॉर्ड

सड़क, जलभराव, छुट्टा पशु, बिजली और स्थानीय बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों को लेकर जनता की नाराजगी कई सीटों पर चुनावी नुकसान का कारण बन सकती है।

3. विवादित छवि और मनमानी के आरोप

कुछ विधायकों को लेकर स्थानीय जनता और अधिकारियों के साथ कथित तल्ख व्यवहार तथा ठेके-पट्टों में हस्तक्षेप जैसे आरोप भी पार्टी के लिए चिंता का विषय बताए जा रहे हैं।

4. मोदी-योगी के भरोसे रहने का जोखिम

पार्टी के भीतर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हर विधायक केवल मोदी-योगी के नाम और बीजेपी के संगठन के सहारे अपनी सीट बचा सकता है? संभावित सर्वे का संकेत यही माना जा रहा है कि अब पार्टी स्थानीय उम्मीदवार की स्वीकार्यता को भी उतना ही महत्व देगी।

‘4-C’ फॉर्मूले से 2027 की तैयारी?

उत्तर प्रदेश के बीजेपी प्रभारी विनोद तावड़े के हालिया लखनऊ दौरे को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, संगठन के स्तर पर चुनावी तैयारी के लिए ‘4-C’ रणनीति पर जोर दिया जा रहा है।

Coordination: सरकार, संगठन और संघ के बीच बेहतर समन्वय।

Cadre: नाराज और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को दोबारा बूथ स्तर पर सक्रिय करना।

Caste Balance: पीडीए की काट के लिए गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों सहित व्यापक सामाजिक समीकरण तैयार करना।

Change: कमजोर, विवादित या चुनावी रूप से पिछड़ रहे चेहरों की जगह नए और जीतने की क्षमता वाले प्रत्याशियों को मौका देना। 

अगर यह रणनीति जमीन पर लागू होती है तो 2027 में बीजेपी के टिकट वितरण में बड़े पैमाने पर बदलाव देखने को मिल सकता है।

‘गुजरात मॉडल’ की यूपी में झलक?

बीजेपी ने अतीत में कुछ राज्यों में बड़े पैमाने पर मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर सत्ता विरोधी माहौल को कमजोर करने की रणनीति अपनाई है। उत्तर प्रदेश में भी यदि 100 से अधिक सीटों पर उम्मीदवार बदलने का फैसला होता है, तो यह पार्टी के लिए एक बड़ा संगठनात्मक प्रयोग होगा। इसका सीधा संदेश मौजूदा विधायकों के लिए है—पार्टी में पद, कद या राजनीतिक पहुंच से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव जीतने की क्षमता होगी। यानी 2027 की तैयारी में बीजेपी का फोकस अब सिर्फ यह देखने पर नहीं होगा कि विधायक कितना बड़ा नेता है, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि उसके क्षेत्र में जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता कितनी है।

सहयोगी दलों के विधायकों पर भी नजर

सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि एनडीए के सहयोगी दलों के विधायकों को लेकर भी पार्टी के भीतर समीक्षा की चर्चा है। अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुभासपा के हिस्से वाली सीटों पर भी स्थानीय प्रदर्शन और जनस्वीकार्यता को लेकर पार्टी गंभीर बताई जा रही है। अगर किसी सहयोगी दल के विधायक की सीट को कमजोर माना जाता है तो गठबंधन के भीतर सीटों के पुनर्समायोजन से लेकर प्रत्याशी बदलने तक के विकल्पों पर चर्चा हो सकती है। हालांकि, यह पूरी तरह चुनाव से पहले होने वाली राजनीतिक और गठबंधन संबंधी बातचीत पर निर्भर करेगा।

सपा ने साधा निशाना

सर्वे से जुड़ी खबरों के सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी को बीजेपी पर हमला बोलने का मौका मिल गया है। सपा नेताओं का कहना है कि अगर बीजेपी को अपने ही विधायकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर नाराजगी का आकलन करना पड़ रहा है तो यह सरकार और संगठन के प्रति जनता के असंतोष का संकेत है। वहीं बीजेपी के लिए यह सर्वे सिर्फ खतरे की घंटी नहीं बल्कि समय रहते सुधार करने का मौका भी है। पार्टी अगर नाराजगी के कारणों को दूर करने में सफल रहती है तो टिकट बदलने की जरूरत कई सीटों पर कम भी हो सकती है।

2027 में टिकट का गणित बदलेगा?

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े चुनावी राज्य में 403 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों का चयन बेहद निर्णायक होता है। 2027 में बीजेपी के सामने सत्ता बचाने के साथ-साथ 2024 के बाद बदले सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों का जवाब देने की चुनौती भी होगी। ऐसे में कथित आंतरिक सर्वे का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि बीजेपी एंटी-इनकंबेंसी को नजरअंदाज करने के बजाय चुनाव से पहले ही उसका इलाज करने की रणनीति पर काम कर रही है।

अगर पार्टी बड़े पैमाने पर मौजूदा विधायकों को हटाकर नए चेहरों को मौका देती है, तो 2027 का चुनाव सिर्फ बीजेपी बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं रहेगा, बल्कि बीजेपी के भीतर भी पुराने चेहरों और नए विकल्पों के बीच बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल अंतिम टिकट सूची आने में समय है, लेकिन पार्टी के भीतर चल रही कथित समीक्षा ने मौजूदा विधायकों की बेचैनी जरूर बढ़ा दी है। 2027 के चुनाव में बीजेपी का संदेश साफ दिखाई देता है—‘काम, छवि और जीत की क्षमता नहीं तो टिकट पर संकट।’