साका और जौहर के पीछे बलिदान की सोच, राजपूत इतिहास को मजाक और तंज की नजर से देखने से पहले जरा उस दौर को समझिए
राजपूतों की साका, जौहर और सती जैसी परंपराओं को उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों और ऐतिहासिक संदर्भ में समझना जरूरी है। इन परंपराओं के पीछे वीरता, बलिदान और परिवार की भूमिका रही है। ऐसी ऐतिहासिक कुर्बानियों का उपहास या भद्दी टिप्पणी करने के बजाय उनके प्रति सम्मान का भाव रखना समाज और देश की जिम्मेदारी है।
-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
राजपूतों में ‘साका’ को बल देने के लिए ही ‘जौहर’ की प्रथा बनी। जब दुश्मन से भिड़ने का ठेका अकेले राजपूतों का नहीं था, तो फिर ‘साका’ ही क्यों और उसे प्रेरित करने वाला ‘जौहर’ क्यों? बात को उस समय की परिस्थितियों में समझना होगा। यदि दुश्मन दुर्बल होता, तो न ‘साका’ की जरूरत पड़ती और न ही जान की बाजी लगाने के लिए प्रेरित करने वाले ‘जौहर’ की।
राजपूतों में न किसी को ‘चादर ओढ़ाने’ की प्रथा थी और न ही विधवा विवाह की। यही परिस्थितियां ‘सती’ होने का भी एक कारण बनती थीं।
कहावत है कि जब कहीं जाने के रास्ते में पीछे लौटने के पुल ही उड़ा दिए जाएं, तो वापस लौटने का ख्याल आसानी से नहीं आता। बीते जमाने में राजपूतों में वीरता और दूसरों के लिए बलिदान देने की भावना पुरुषों और स्त्रियों, दोनों में कूट-कूटकर भरी हुई थी। इसी विशेषता को परखकर आबू पर्वत पर यज्ञ करके अनेक कबीलों को ऋषि-मुनियों ने राजपूत बनाया, जिसे इतिहास में अग्नि से उत्पन्न होने की कथा के रूप में बताया जाता रहा है।
परायों की सुरक्षा के लिए स्वयं भी मरते जाना और पीछे बचे परिवार का जौहर कर लेना—क्या संसार में इसका कोई दूसरा उदाहरण मिलता है? राजपूत आखिरी सांस तक देश और समाज के लिए लड़ते रहे और उनके परिवारों ने भी उन्हें उस संघर्ष के लिए जौहर जैसे कठोर निर्णय से प्रेरित किया। जिन लोगों को यज्ञ करके राजपूत बनाया गया, उनके बारे में इतिहास में वीरता और बलिदान की यही परंपरा बताई जाती रही है।
भगवान परशुराम जी और कर्ण की कथा भी इसी बात को समझने का एक उदाहरण है। भगवान परशुराम जी ने कर्ण को तब पहचान लिया था, जब एक कीड़ा उसकी जंघा को काटता रहा, लेकिन कर्ण उफ तक नहीं कर सका और न तनिक हिला। कीड़ा काटता रहा, लहू बहता रहा, लेकिन कर्ण सहता गया। उसकी चिंता सिर्फ इतनी थी कि उसकी जंघा पर शीश रखकर विश्राम कर रहे गुरु भगवान परशुराम की नींद में खलल न पड़े।
जब भगवान परशुराम जी का विश्राम पूरा हुआ और उन्होंने कर्ण की जंघा पर गहरा घाव तथा बहता हुआ लहू देखा, तो उन्हें संदेह हुआ। वे समझ गए कि कर्ण ने अपने बारे में जो बताया था, वह सही नहीं था। क्रोधित होकर उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि उनसे सीखा हुआ ज्ञान उसे आवश्यकता के समय याद नहीं रहेगा। यह कथा और इसके आगे की कहानी सभी जानते हैं, इसलिए यहां उसका विस्तार जरूरी नहीं।
इस पूरे प्रसंग को रखने का उद्देश्य केवल इतना है कि राजपूतों की कुर्बानियों को किसी भी तरह के तिरस्कार, उपहास या गलत मंशा से नहीं देखा जाना चाहिए। जाने-अनजाने में भी ऐसी ऐतिहासिक परंपराओं पर भद्दी टिप्पणी करना उचित नहीं है। यह केवल राजपूत समाज की नहीं, बल्कि पूरे समाज और देश की जिम्मेदारी है कि इतिहास में दर्ज ऐसी कुर्बानियों के प्रति सम्मान बना रहे।
जरा सोचिए, जिन्होंने लगातार देश और समाज के लिए इतनी बड़ी कुर्बानियां दीं, उनके बारे में कुछ लोग बिना सोचे-समझे और बिना सही आकलन किए उसी प्रथा पर अनर्गल टिप्पणी करने लगें, जिसने उस दौर में उनके पुरखों को संघर्ष के लिए तैयार किया था। राजपूतों ने दूसरों की सुरक्षा के लिए साका किया और उनके परिवारों ने उन्हें आखिरी दम तक लड़ने के लिए जौहर तक किया।
अगर उस समय साका और जौहर का मजाक बनाया जाता, ऐसे तंज कसे जाते और उनके बलिदान को अपमानित किया जाता, तो क्या वे साका करते? क्या कोई परिवार अपने पुरुषों को आखिरी सांस तक लड़-मरने के लिए प्रेरित करने के लिए जौहर करने का निर्णय लेता?
इतिहास को आज की दृष्टि से देखने से पहले उस समय की परिस्थितियों, सोच और बलिदान की भावना को समझना जरूरी है।